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पितृपक्ष में सात्त्विक आहार, उपवास और संयम का विशेष महत्व : पंडित रोेहित
Sun, 07 Sep 2025 12:10 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल
संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल
Updated Sun, 07 Sep 2025 12:10 AM IST
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12 कैथल। रोहित शर्मा। स्वयं
संवाद न्यूज एजेंसी
सीवन। पंडित रोहित शर्मा ने भेंटवार्ता में कहा कि इस वर्ष पितृपक्ष श्राद्ध 7 सितंबर से शुरू होकर 21 सितंबर तक रहेंगे। इन 15 दिनों को हिंदू धर्म में महालय पक्ष कहा जाता है और इन्हें पितरों की स्मृति का सबसे पवित्र समय माना गया है। पंडित रोहित शर्मा ने बताया कि शास्त्रों के अनुसार जो व्यक्ति अपने पूर्वजों का विधिपूर्वक श्राद्ध करता है, उसे पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है और उसके जीवन में सुख-समृद्धि बनी रहती है।
उन्होंने कहा कि श्राद्ध में तर्पण, पिंडदान और मंत्रोच्चारण से पूर्वजों की आत्मा तृप्त होती है। इस अवधि में सात्त्विक आहार का सेवन, उपवास और संयम विशेष महत्व रखते हैं। संत-विद्वानों का सत्कार और जरूरतमंदों की सेवा करना, गो-सेवा व पीपल वृक्ष की देखभाल करना भी श्राद्ध की आवश्यक परंपरा मानी गई है। समाज में दया और करुणा के भाव को जाग्रत करना ही पितरों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है। उन्होंने यह भी कहा कि श्राद्ध के दिनों में दिखावे से परहेज रखना चाहिए। साधारण और श्रद्धा भाव से किया गया कार्य ही फलदायी सिद्ध होता है। उन्होंने लोगों से आह्वान किया कि इन दिनों को केवल कर्मकांड तक सीमित न रखें, बल्कि सामाजिक और मानवीय मूल्यों को जीवन में उतारे। पंडित रोहित शर्मा ने कहा कि पितृपक्ष आत्मा और परिवार दोनों को जोड़ने का माध्यम है। पूर्वजों की स्मृति को सच्चे दिल से सम्मान देना ही हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।
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सीवन। पंडित रोहित शर्मा ने भेंटवार्ता में कहा कि इस वर्ष पितृपक्ष श्राद्ध 7 सितंबर से शुरू होकर 21 सितंबर तक रहेंगे। इन 15 दिनों को हिंदू धर्म में महालय पक्ष कहा जाता है और इन्हें पितरों की स्मृति का सबसे पवित्र समय माना गया है। पंडित रोहित शर्मा ने बताया कि शास्त्रों के अनुसार जो व्यक्ति अपने पूर्वजों का विधिपूर्वक श्राद्ध करता है, उसे पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है और उसके जीवन में सुख-समृद्धि बनी रहती है।
उन्होंने कहा कि श्राद्ध में तर्पण, पिंडदान और मंत्रोच्चारण से पूर्वजों की आत्मा तृप्त होती है। इस अवधि में सात्त्विक आहार का सेवन, उपवास और संयम विशेष महत्व रखते हैं। संत-विद्वानों का सत्कार और जरूरतमंदों की सेवा करना, गो-सेवा व पीपल वृक्ष की देखभाल करना भी श्राद्ध की आवश्यक परंपरा मानी गई है। समाज में दया और करुणा के भाव को जाग्रत करना ही पितरों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है। उन्होंने यह भी कहा कि श्राद्ध के दिनों में दिखावे से परहेज रखना चाहिए। साधारण और श्रद्धा भाव से किया गया कार्य ही फलदायी सिद्ध होता है। उन्होंने लोगों से आह्वान किया कि इन दिनों को केवल कर्मकांड तक सीमित न रखें, बल्कि सामाजिक और मानवीय मूल्यों को जीवन में उतारे। पंडित रोहित शर्मा ने कहा कि पितृपक्ष आत्मा और परिवार दोनों को जोड़ने का माध्यम है। पूर्वजों की स्मृति को सच्चे दिल से सम्मान देना ही हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।
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