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कुरुक्षेत्र तीर्थ पर शोध, प्रशिक्षण की आवश्यकता : प्रो. भारद्वाज
Thu, 18 Jul 2024 06:27 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल
संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल
Updated Thu, 18 Jul 2024 06:27 AM IST
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संवाद न्यूज एजेंसी
कैथल। महर्षि वाल्मीकि संस्कृत विश्वविद्यालय की ओर से विवि परिसर में मंदिर एवं तीर्थ प्रबंधन विषय पर आयोजित तीन दिवसीय कार्यशाला का बुधवार को समापन हुआ। मुख्य अतिथि के रूप में हरियाणा उच्च शिक्षा परिषद के पूर्व अध्यक्ष प्रो. बृज किशोर कुठियाला ऑनलाइन माध्यम से जुड़े। इस मौके पर उन्होंने कहा कि मंदिरों और तीर्थों के प्रबंधन में प्रशिक्षण देना विश्वविद्यालय का कार्य है। कार्यशाला के सकारात्मक परिणाम आएंगे।
इस अवसर पर विश्वविद्यालय के शैक्षणिक अधिष्ठाता प्रो. सत्य प्रकाश दूबे व निदेशक प्रो. भाग सिंह बोदला, साहित्य संस्कृति संकाय के अधिष्ठाता डॉ. जगत नारायण, वेद-वेदांग संकाय के अधिष्ठाता डॉ. सुरेंद्र पाल वत्स सहित विश्वविद्यालय के सभी प्राध्यापक, शोध छात्र एवं प्रतिभागी उपस्थित रहे। कार्यशाला के संयोजक डॉ. गोविंद वल्लभ रहे व सत्र संचालन डॉ. कृष्ण चंद्र पांडे ने किया।
कार्यशाला के समापन समारोह में में प्रस्ताव रखा गया कि विश्वविद्यालय 48 कोस कुरुक्षेत्र तीर्थ शोध एवं प्रशिक्षण केंद्र की स्थापना की जाए। यह केंद्र विश्व भर से आने वाले तीर्थ यात्रियों को पुरातन भारतीय वैदिक संस्कृति से परिचित कराएगा। साथ ही यह केंद्र सक्षम मानव संसाधन को न केवल प्रशिक्षित करेगा, अपितु क्षेत्र के आर्थिक विकास में भी अपना सहयोग प्रदान करेगा। इस शोध केंद्र की स्थापना के साथ ही मंदिर एवं तीर्थ प्रबंधन विषय पर आयोजित कार्यशाला इस दैवीय कार्य के मंगलाचरण के रूप में प्रतिष्ठित होगी। इस प्रस्ताव को विद्वान परिषद की बैठक में प्रस्तुत किया जाएगा।
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कार्यशाला में विवि के कुलपति प्रो. डॉ. रमेश चंद्र भारद्वाज ने कहा कि कुरुक्षेत्र का 48 कोस तीर्थ क्षेत्र सांस्कृतिक और आध्यात्मिक रूप से महत्वपूर्ण है। इस पर शोध एवं अनुसंधान किए जाने चाहिए। इन स्थलों के समुचित प्रबंधन करने के लिए प्रशिक्षण भी दिया जाना आवश्यक है। संस्कृत विश्वविद्यालय इस दिशा में अपने विद्यार्थियों को स्वरोजगार की दृष्टि से सक्षम बनाने तथा उनको प्रशिक्षित करने के लिए कृतसंकल्प है।
कहा कि मंदिरों एवं तीर्थों के प्रबंधन विषय को अकादमिक जगत के विद्वानों के बीच चर्चा में लाने के लिए महर्षि वाल्मीकि संस्कृत विश्वविद्यालय ने तीन दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया। उन्होंने बताया कि तीर्थों के संरक्षण, संवर्धन एवं प्रबंधन क्षेत्र में रोजगार की अपार संभावनाएं हैं। इस पर प्रशिक्षण प्राप्त करके विद्यार्थी स्वरोजगार की ओर बढ़ सकेंगे।
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कैथल। महर्षि वाल्मीकि संस्कृत विश्वविद्यालय की ओर से विवि परिसर में मंदिर एवं तीर्थ प्रबंधन विषय पर आयोजित तीन दिवसीय कार्यशाला का बुधवार को समापन हुआ। मुख्य अतिथि के रूप में हरियाणा उच्च शिक्षा परिषद के पूर्व अध्यक्ष प्रो. बृज किशोर कुठियाला ऑनलाइन माध्यम से जुड़े। इस मौके पर उन्होंने कहा कि मंदिरों और तीर्थों के प्रबंधन में प्रशिक्षण देना विश्वविद्यालय का कार्य है। कार्यशाला के सकारात्मक परिणाम आएंगे।
इस अवसर पर विश्वविद्यालय के शैक्षणिक अधिष्ठाता प्रो. सत्य प्रकाश दूबे व निदेशक प्रो. भाग सिंह बोदला, साहित्य संस्कृति संकाय के अधिष्ठाता डॉ. जगत नारायण, वेद-वेदांग संकाय के अधिष्ठाता डॉ. सुरेंद्र पाल वत्स सहित विश्वविद्यालय के सभी प्राध्यापक, शोध छात्र एवं प्रतिभागी उपस्थित रहे। कार्यशाला के संयोजक डॉ. गोविंद वल्लभ रहे व सत्र संचालन डॉ. कृष्ण चंद्र पांडे ने किया।
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कार्यशाला के समापन समारोह में में प्रस्ताव रखा गया कि विश्वविद्यालय 48 कोस कुरुक्षेत्र तीर्थ शोध एवं प्रशिक्षण केंद्र की स्थापना की जाए। यह केंद्र विश्व भर से आने वाले तीर्थ यात्रियों को पुरातन भारतीय वैदिक संस्कृति से परिचित कराएगा। साथ ही यह केंद्र सक्षम मानव संसाधन को न केवल प्रशिक्षित करेगा, अपितु क्षेत्र के आर्थिक विकास में भी अपना सहयोग प्रदान करेगा। इस शोध केंद्र की स्थापना के साथ ही मंदिर एवं तीर्थ प्रबंधन विषय पर आयोजित कार्यशाला इस दैवीय कार्य के मंगलाचरण के रूप में प्रतिष्ठित होगी। इस प्रस्ताव को विद्वान परिषद की बैठक में प्रस्तुत किया जाएगा।
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कार्यशाला में विवि के कुलपति प्रो. डॉ. रमेश चंद्र भारद्वाज ने कहा कि कुरुक्षेत्र का 48 कोस तीर्थ क्षेत्र सांस्कृतिक और आध्यात्मिक रूप से महत्वपूर्ण है। इस पर शोध एवं अनुसंधान किए जाने चाहिए। इन स्थलों के समुचित प्रबंधन करने के लिए प्रशिक्षण भी दिया जाना आवश्यक है। संस्कृत विश्वविद्यालय इस दिशा में अपने विद्यार्थियों को स्वरोजगार की दृष्टि से सक्षम बनाने तथा उनको प्रशिक्षित करने के लिए कृतसंकल्प है।
कहा कि मंदिरों एवं तीर्थों के प्रबंधन विषय को अकादमिक जगत के विद्वानों के बीच चर्चा में लाने के लिए महर्षि वाल्मीकि संस्कृत विश्वविद्यालय ने तीन दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया। उन्होंने बताया कि तीर्थों के संरक्षण, संवर्धन एवं प्रबंधन क्षेत्र में रोजगार की अपार संभावनाएं हैं। इस पर प्रशिक्षण प्राप्त करके विद्यार्थी स्वरोजगार की ओर बढ़ सकेंगे।