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मां कात्यायनी के नाम पर है कलायत का नामकरण
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39- कलायत। कलायत में स्थित मां कात्यायनी शक्ति पीठ
- फोटो : Kaithal
कलायत। नगर में स्थित मां कात्यायनी शक्ति पीठ आर्कषण का केंद्र हैं। ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार मां कात्यायनी के नाम पर ही ‘कलायत’ का नामकरण माना जाता है। कहा जाता है कि कपिल मुनि ने मां कात्यायनी के स्वरूप की पूजा-अर्चना करते थे। उनके द्वारा ही यह मंदिर स्थापित किया। नवरात्र पर्व में मां कात्यायनी शक्तिपीठ पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है। कलायत के कपिल मुनि मंदिर परिसर में मां कात्यायनी शक्ति पीठ श्रद्धालुओं के विशेष आकर्षण का केंद्र है। कलायत के पौराणिक मंदिर में भगवान कपिल व मां कात्यायनी शक्ति पीठ दोनों ही स्थापित हैं।
मंदिर के पुजारी श्याम लाल गौतम ने बताया कि किंवदंती के अनुसार, परकात्यायनी नवदुर्गा के नौ रूपों में छठा रूप है। यह अमरकोष में पार्वती के लिए दूसरा नाम है। यजुर्वेद के तैत्तिरीय आरण्यक में उनका उल्लेख प्रथम किया है। स्कंद पुराण में उल्लेख है कि वे परमेश्वर के नैसर्गिक क्रोध से उत्पन्न हुई थी। सिंह पर आरूढ़ होकर मां ने इसी रूप में महिषासुर का वध किया था। वे शक्ति की आदि रूपा है जिसका उल्लेख ग्रंथों में मिलता है। कालिका-पुराण में उल्लेख मिलता है जिसमें उड़ीसा में देवी कात्यायनी और भगवान जगन्नाथ का स्थान बताया गया है।
कात्यायन ऋषि कुल परंपरा में हुआ जन्म
पंडित विशाल शांडिल्य ने बताया कि कत नामक एक प्रसिद्ध महर्षि थे। उनके पुत्र ऋषि कात्य हुए। इन्हीं कात्य के गोत्र में विश्व प्रसिद्ध महर्षि कात्यायन उत्पन्न हुए थे। इन्होंने भगवती परांबा की उपासना करते हुए बहुत वर्षों तक बड़ी कठिन तपस्या की थी। उनकी इच्छा थी मां भगवती उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लें। मां भगवती ने उनकी यह प्रार्थना स्वीकार कर ली। कुछ समय पश्चात जब दानव महिषासुर का अत्याचार पृथ्वी पर बढ़ गया तब भगवान ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों ने अपने-अपने तेज का अंश देकर महिषासुर के विनाश के लिए एक देवी को उत्पन्न किया। महर्षि कात्यायन ने सर्वप्रथम इनकी पूजा की। इसी कारण से यह कात्यायनी कहलाईं।
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पीठ में स्थापित है दुर्लभ विग्रह
मां कात्यायनी शक्ति पीठ के मुख्य पुजारी श्याम लाल गौतम ने बताया कि शक्तिपीठ में स्थित मां का विग्रह अपने आप में दुर्लभ है। इस पीठ में मां का जो विग्रह है उस पर मां शेर की सवारी घोड़े की सवारी की तरह से कर रही है। ऐसा माना जाता है कि मां का ऐसा विग्रह शायद कलायत शक्ति पीठ में ही है। इसके अलावा मंदिर में मां दुर्गा, मां सरस्वती व काली की पाषाणकालीन दुर्लभ मूर्तियां भी स्थापित हैं। इनका बाकायदा रजिस्ट्रेशन करवाया हुआ है। पीठ में स्थित मां के विग्रह के अलावा मां का मंदिर भी हर दृष्टि से अपने आप में अद्वितीय है। दक्षिणोमुखी इस मंदिर में आठ कोण हैं जो हर देवी को समर्पित हैं व मां के दर्शनों के लिए आठ सीढिय़ां चढ़नी होती हैं।
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मंदिर के पुजारी श्याम लाल गौतम ने बताया कि किंवदंती के अनुसार, परकात्यायनी नवदुर्गा के नौ रूपों में छठा रूप है। यह अमरकोष में पार्वती के लिए दूसरा नाम है। यजुर्वेद के तैत्तिरीय आरण्यक में उनका उल्लेख प्रथम किया है। स्कंद पुराण में उल्लेख है कि वे परमेश्वर के नैसर्गिक क्रोध से उत्पन्न हुई थी। सिंह पर आरूढ़ होकर मां ने इसी रूप में महिषासुर का वध किया था। वे शक्ति की आदि रूपा है जिसका उल्लेख ग्रंथों में मिलता है। कालिका-पुराण में उल्लेख मिलता है जिसमें उड़ीसा में देवी कात्यायनी और भगवान जगन्नाथ का स्थान बताया गया है।
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कात्यायन ऋषि कुल परंपरा में हुआ जन्म
पंडित विशाल शांडिल्य ने बताया कि कत नामक एक प्रसिद्ध महर्षि थे। उनके पुत्र ऋषि कात्य हुए। इन्हीं कात्य के गोत्र में विश्व प्रसिद्ध महर्षि कात्यायन उत्पन्न हुए थे। इन्होंने भगवती परांबा की उपासना करते हुए बहुत वर्षों तक बड़ी कठिन तपस्या की थी। उनकी इच्छा थी मां भगवती उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लें। मां भगवती ने उनकी यह प्रार्थना स्वीकार कर ली। कुछ समय पश्चात जब दानव महिषासुर का अत्याचार पृथ्वी पर बढ़ गया तब भगवान ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों ने अपने-अपने तेज का अंश देकर महिषासुर के विनाश के लिए एक देवी को उत्पन्न किया। महर्षि कात्यायन ने सर्वप्रथम इनकी पूजा की। इसी कारण से यह कात्यायनी कहलाईं।
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पीठ में स्थापित है दुर्लभ विग्रह
मां कात्यायनी शक्ति पीठ के मुख्य पुजारी श्याम लाल गौतम ने बताया कि शक्तिपीठ में स्थित मां का विग्रह अपने आप में दुर्लभ है। इस पीठ में मां का जो विग्रह है उस पर मां शेर की सवारी घोड़े की सवारी की तरह से कर रही है। ऐसा माना जाता है कि मां का ऐसा विग्रह शायद कलायत शक्ति पीठ में ही है। इसके अलावा मंदिर में मां दुर्गा, मां सरस्वती व काली की पाषाणकालीन दुर्लभ मूर्तियां भी स्थापित हैं। इनका बाकायदा रजिस्ट्रेशन करवाया हुआ है। पीठ में स्थित मां के विग्रह के अलावा मां का मंदिर भी हर दृष्टि से अपने आप में अद्वितीय है। दक्षिणोमुखी इस मंदिर में आठ कोण हैं जो हर देवी को समर्पित हैं व मां के दर्शनों के लिए आठ सीढिय़ां चढ़नी होती हैं।