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Kaithal News: होली ः रिश्तों में दिखाई देती थी प्रेम की भावना
Wed, 12 Mar 2025 12:42 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल
संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल
Updated Wed, 12 Mar 2025 12:42 AM IST
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गुरमीत सीड़ा
गुहला-चीका। बहणा आया है फागुण मास सखी, सब हिलमिल खेलें होली... जैसे गीतों के बोल अब गांव, गलियों, चौक चौराहों पर सुनाई नहीं देते। पहले रिश्तों में दिखाई देती थी प्रेम की भावना लेकिन बदलते समय के साथ अब बहुत कुछ बदल चुका है।
बुजुर्गों ने होली के पर्व पर अनुभव साझा किए तो उनकी आंखें चमक उठीं। वे बोले
आधुनिकता की दौड़ में होली अब एक दिन ही नहीं, बल्कि कुछ घंटों की रह गई है। सांग, गीत और धमाल गायब हो चुके हैं। पुराने समय में होली का त्योहार ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से मनाया जाता था। महिलाएं होली से एक माह पहले लोकगीतों का गायन शुरू करतीं थीं लेकिन अब शराब का सेवन बढ़ने से झगड़े की आशंका रहती है। इस कारण अब उत्साह कम हो गया है।
प्रबुद्ध और बुजुर्ग लोगों का कहना है कि पहले की होली संसाधन कम होने के बावजूद काफी खुशहाल होती थी, क्योंकि 15 दिन पहले से ही रिश्तों में होली की ठिठोली शुरू हो जाती थी, लेकिन अब ऐसा देखने को नहीं मिलता है।
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उन्होंने बताया कि पहले होलिका दहन के लिए भी कांटेदार झाड़ियां एकत्रित करने में हर व्यक्ति अपना योगदान देना शुभ मानता था। खेतों से कांटेदार झाड़ियां व अन्य सामग्री लेकर और इसके बीच में एक पेड़ को काट कर उसे प्रह्लाद का नाम देकर बनाई गई होली के बीच में छोड़ा जाता था तथा रात्रि को उसकी पूजा पाठ करने के बाद होलिका को अग्नि दी जाती थी। युवा और बुजुर्ग ग्रामीण अपने लाठी डंडों से जलती हुई होलिका से प्रह्लाद को सुरक्षित निकालकर तालाब में डालते थे और होलिका दहन करने के बाद घर जाकर मिठाई आदि बांटते थे। संवाद
मनमुटाव होने पर मनाया जाता था
पहले किसी के साथ मनमुटाव हो जाता था उसे इन त्योहारों पर ही मनाया जाता था। सभी होली के दिन इकट्ठे हो जाते थे। वहीं एक-दूसरे के साथ बैठकर घर में बने पकवान जैसे पकोड़े, मालपुआ, खीर, चूरमा, हलवा और सुवाली आदि का रात्रि को होलिका को भोग लगाकर बाद में सभी इकट्ठे बैठकर भोजन करते थे। उसे समय कितना आनंद आता था। यह हम सब बयां नहीं कर सकते लेकिन आज के बच्चे मोबाइल तक ही सीमित रह गए।
- यशपाल गर्ग उर्फ पप्पू, निवासी, चीका।
शराब के नशे में नजर आते हैं लोग
करीब 25 वर्षों से होली का रंग फीका लगता है। होली से सिर्फ एक सप्ताह पहले ही त्योहार का अहसास होता है जबकि पहले कई दिनों तक बाजार में की खरीद के लिए रौनक रहती थी लेकिन अब होली के दिन लोग शराब के नशे में घूमते नजर आते हैं। इनमें से कई लोग अभद्रता भी करते हैं। इस कारण आम आदमी होली के दिन घर से बाहर आने से डरता है। आज लोगों को यह तक नहीं पता कि उनके पड़ोस में कौन लोग रहते हैं। उनका नाम क्या है त्योहारों की तो बात ही नहीं जानते।
- हुसन जिंदल, दुकानदार।
रात मंे महिलाएं गीत गाया करती थीं
करीब 45 वर्ष पहले तक सूखे गुलाल से होली मनाई जाती थी। महिलाएं रात के समय होली के लोक गीतों का गायन करतीं थीं। पहले रसायन रहित सामग्री पदार्थों के प्रयोग करके रंग बनाए जाते थे। इससे त्वचा प्रभावित नहीं होती थी, लेकिन अब बाजारों में रासायनिक रंगों को बेचा जा रहा है। इससे चमड़ी के रोग बढ़ रहे हैं। बाजारी करण के कारण भी दुकानदारों में मुनाफा कमाने की होड़ रहती है। अब औपचारिकता निभाकर लोग त्योहार मनाते दिखते हैं। - मदनलाल निबरानिया, वार्ड पांच निवासी चीका।
रात मंे महिलाएं गीत गाया करती थीं
पहले कई दिन पहले पर्व मनाने के लिए तैयारी शुरू हो जाती थी। हर परिवार से एक सदस्य को साथ लेकर होलिका बनाने के लिए खेतों से लकड़ी आदि लेकर आते थे, फिर तालाब के किनारे होलिका को बनाया जाता था। बीच में पेड़ का एक मोटा लकड़ी का एक गुटखा आदि जिनको प्रहलाद का नाम दिया जाता था। बच्चे पशुओं के गोबर से बने डाल कई दिन पहले ही बना लेते थे। अब लोगों में ऐसी सामूहिक भावना नहीं देखने को मिलती है। - पंडित नंदकिशोर शास्त्री, वार्ड चार, निवासी, चीका।
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गुहला-चीका। बहणा आया है फागुण मास सखी, सब हिलमिल खेलें होली... जैसे गीतों के बोल अब गांव, गलियों, चौक चौराहों पर सुनाई नहीं देते। पहले रिश्तों में दिखाई देती थी प्रेम की भावना लेकिन बदलते समय के साथ अब बहुत कुछ बदल चुका है।
बुजुर्गों ने होली के पर्व पर अनुभव साझा किए तो उनकी आंखें चमक उठीं। वे बोले
आधुनिकता की दौड़ में होली अब एक दिन ही नहीं, बल्कि कुछ घंटों की रह गई है। सांग, गीत और धमाल गायब हो चुके हैं। पुराने समय में होली का त्योहार ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से मनाया जाता था। महिलाएं होली से एक माह पहले लोकगीतों का गायन शुरू करतीं थीं लेकिन अब शराब का सेवन बढ़ने से झगड़े की आशंका रहती है। इस कारण अब उत्साह कम हो गया है।
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प्रबुद्ध और बुजुर्ग लोगों का कहना है कि पहले की होली संसाधन कम होने के बावजूद काफी खुशहाल होती थी, क्योंकि 15 दिन पहले से ही रिश्तों में होली की ठिठोली शुरू हो जाती थी, लेकिन अब ऐसा देखने को नहीं मिलता है।
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उन्होंने बताया कि पहले होलिका दहन के लिए भी कांटेदार झाड़ियां एकत्रित करने में हर व्यक्ति अपना योगदान देना शुभ मानता था। खेतों से कांटेदार झाड़ियां व अन्य सामग्री लेकर और इसके बीच में एक पेड़ को काट कर उसे प्रह्लाद का नाम देकर बनाई गई होली के बीच में छोड़ा जाता था तथा रात्रि को उसकी पूजा पाठ करने के बाद होलिका को अग्नि दी जाती थी। युवा और बुजुर्ग ग्रामीण अपने लाठी डंडों से जलती हुई होलिका से प्रह्लाद को सुरक्षित निकालकर तालाब में डालते थे और होलिका दहन करने के बाद घर जाकर मिठाई आदि बांटते थे। संवाद
मनमुटाव होने पर मनाया जाता था
पहले किसी के साथ मनमुटाव हो जाता था उसे इन त्योहारों पर ही मनाया जाता था। सभी होली के दिन इकट्ठे हो जाते थे। वहीं एक-दूसरे के साथ बैठकर घर में बने पकवान जैसे पकोड़े, मालपुआ, खीर, चूरमा, हलवा और सुवाली आदि का रात्रि को होलिका को भोग लगाकर बाद में सभी इकट्ठे बैठकर भोजन करते थे। उसे समय कितना आनंद आता था। यह हम सब बयां नहीं कर सकते लेकिन आज के बच्चे मोबाइल तक ही सीमित रह गए।
- यशपाल गर्ग उर्फ पप्पू, निवासी, चीका।
शराब के नशे में नजर आते हैं लोग
करीब 25 वर्षों से होली का रंग फीका लगता है। होली से सिर्फ एक सप्ताह पहले ही त्योहार का अहसास होता है जबकि पहले कई दिनों तक बाजार में की खरीद के लिए रौनक रहती थी लेकिन अब होली के दिन लोग शराब के नशे में घूमते नजर आते हैं। इनमें से कई लोग अभद्रता भी करते हैं। इस कारण आम आदमी होली के दिन घर से बाहर आने से डरता है। आज लोगों को यह तक नहीं पता कि उनके पड़ोस में कौन लोग रहते हैं। उनका नाम क्या है त्योहारों की तो बात ही नहीं जानते।
- हुसन जिंदल, दुकानदार।
रात मंे महिलाएं गीत गाया करती थीं
करीब 45 वर्ष पहले तक सूखे गुलाल से होली मनाई जाती थी। महिलाएं रात के समय होली के लोक गीतों का गायन करतीं थीं। पहले रसायन रहित सामग्री पदार्थों के प्रयोग करके रंग बनाए जाते थे। इससे त्वचा प्रभावित नहीं होती थी, लेकिन अब बाजारों में रासायनिक रंगों को बेचा जा रहा है। इससे चमड़ी के रोग बढ़ रहे हैं। बाजारी करण के कारण भी दुकानदारों में मुनाफा कमाने की होड़ रहती है। अब औपचारिकता निभाकर लोग त्योहार मनाते दिखते हैं। - मदनलाल निबरानिया, वार्ड पांच निवासी चीका।
रात मंे महिलाएं गीत गाया करती थीं
पहले कई दिन पहले पर्व मनाने के लिए तैयारी शुरू हो जाती थी। हर परिवार से एक सदस्य को साथ लेकर होलिका बनाने के लिए खेतों से लकड़ी आदि लेकर आते थे, फिर तालाब के किनारे होलिका को बनाया जाता था। बीच में पेड़ का एक मोटा लकड़ी का एक गुटखा आदि जिनको प्रहलाद का नाम दिया जाता था। बच्चे पशुओं के गोबर से बने डाल कई दिन पहले ही बना लेते थे। अब लोगों में ऐसी सामूहिक भावना नहीं देखने को मिलती है। - पंडित नंदकिशोर शास्त्री, वार्ड चार, निवासी, चीका।