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सबकी अपनी रागनी, सबका अपना गीत, सब मतलब के यार सै, कोण किसे का मीत
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ऐंकर
फोटो नंबर 17
... सब मतलब के यार सै, कोण किसे का मीत
आरकेएसडी महाविद्यालय में साहित्य सभा की तरफ से रविवार को मासिक काव्य गोष्ठी आयोजित
संवाद न्यूज एजेंसी
कैथल। आरकेएसडी महाविद्यालय में साहित्य सभा की मासिक काव्य गोष्ठी आयोजित हुई। इसमें कवियों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज के मौजूदा हाल पर कटाक्ष किए। गोष्ठी की अध्यक्षता पानीपत से पहुंचे कमलेश पालीवाल कमल ने की। मंच संचालन रिसाल जांगड़ा ने किया।
गोष्ठी की शुरूआत करते हुए विश्वजीत ने अपनी रचना पढ़ी ‘मुहब्बत से, इनायत से, वफा से चोट लगती है, बिखरता फूल हूं, मुझको हवा से चोट लगती है’। श्याम सुंदर ने गजल पेश करते हुए कहा कि ‘हमारे सामने गैरों से मिलना हंस-हंस कर, यही तो हरदम कलेजे को खाये जाते हैं’। ईश्वर गर्ग ने कहा कि ‘कभी अंधा, कभी गूंगा, कभी बनना पड़ा बहरा, बड़ी मुश्किल तवाजुन साधने का काम जो ठहरा’। अशोक सम्राट ने अपनी रचना सबकी अपनी रागनी, सबका अपना गीत, सब मतलब के यार सै, कोण किसे का मीत सुनाया जिसे लोगों ने काफी सराहा।
बचपन को याद करते हुए सतीश शर्मा ने कहा कि जब हम छोटे बच्चे थे, तब हम कितने अच्छे थे। रविंद्र कुमार रवि ने कहा कि सहेगा जो नफरत का हर वार हंसकर, यकीनन मिलेगा इसे प्यार हंसकर। मेरी जेब खाली है और यार देखो, बुलाता है मुझको ये बाजार हंसकर। डा. रामफल गौड़ ने हरियाणवी कविता प्रस्तुत करते हुए कहा कि दिखे कै दुनियादारी, सबके भीतर सै मक्कारी। सुनील श्याम ने कहा कि पीपल के पेड़ के नीचे मिले थे, हम एक मंदिर के पीछे मिले थे। अनिल कौशिक ने पिता-पुत्र के मौजूदा रिश्तों पर कविता प्रस्तुत की।
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चुनावी माहौल में नेताओं के दोहरे चेहरे का वर्णन करते हुए अनिल गर्ग ने कविता प्रस्तुत करते हुए कहा, दुकान सजाए बैठे हैं, ईमानदार मेहनती समाजसेवी का लेबल लगाए बैठे हैं। अशोक बैरागी ने बेटी की व्यथा को कविता में पिरोते हुए कहा, मां अब मैं तुम्हारे सिवा किसी और के साथ नहीं रहना चाहती। रिसाल जांगड़ा ने कहा कि एक से एक नया देखिए रोज कमाल सियासत में, धोती फट कर बन जाता है एक कमाल सियासत में। रजनीश शर्मा ने रागनी प्रस्तुत करते हुए कहा कि सदी बीसवीं पाछै लोगों इसा जमाना आवेगा, इतनी किल्लत बढ़ जागी, माणस नै मानस खावैगा। लहणा सिंह ने भगवान शिव पार्वती के विवाह का गीत सुनाया। कमलेश शर्मा ने कहा कि साथी चेता यह वही है, तन का उजला मन का काला, साबुन के बुलबुलों में इंद्रधनुष दिखाने वाला, क्या हुआ तो इसने टोपी बदल ली है, पर आदमी तो वही है। इस मौके पर चतुर्भुज बंसल, विकास आनंद सहित अन्य कवि और साहित्यकार मौजूद थे।
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... सब मतलब के यार सै, कोण किसे का मीत
आरकेएसडी महाविद्यालय में साहित्य सभा की तरफ से रविवार को मासिक काव्य गोष्ठी आयोजित
संवाद न्यूज एजेंसी
कैथल। आरकेएसडी महाविद्यालय में साहित्य सभा की मासिक काव्य गोष्ठी आयोजित हुई। इसमें कवियों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज के मौजूदा हाल पर कटाक्ष किए। गोष्ठी की अध्यक्षता पानीपत से पहुंचे कमलेश पालीवाल कमल ने की। मंच संचालन रिसाल जांगड़ा ने किया।
गोष्ठी की शुरूआत करते हुए विश्वजीत ने अपनी रचना पढ़ी ‘मुहब्बत से, इनायत से, वफा से चोट लगती है, बिखरता फूल हूं, मुझको हवा से चोट लगती है’। श्याम सुंदर ने गजल पेश करते हुए कहा कि ‘हमारे सामने गैरों से मिलना हंस-हंस कर, यही तो हरदम कलेजे को खाये जाते हैं’। ईश्वर गर्ग ने कहा कि ‘कभी अंधा, कभी गूंगा, कभी बनना पड़ा बहरा, बड़ी मुश्किल तवाजुन साधने का काम जो ठहरा’। अशोक सम्राट ने अपनी रचना सबकी अपनी रागनी, सबका अपना गीत, सब मतलब के यार सै, कोण किसे का मीत सुनाया जिसे लोगों ने काफी सराहा।
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बचपन को याद करते हुए सतीश शर्मा ने कहा कि जब हम छोटे बच्चे थे, तब हम कितने अच्छे थे। रविंद्र कुमार रवि ने कहा कि सहेगा जो नफरत का हर वार हंसकर, यकीनन मिलेगा इसे प्यार हंसकर। मेरी जेब खाली है और यार देखो, बुलाता है मुझको ये बाजार हंसकर। डा. रामफल गौड़ ने हरियाणवी कविता प्रस्तुत करते हुए कहा कि दिखे कै दुनियादारी, सबके भीतर सै मक्कारी। सुनील श्याम ने कहा कि पीपल के पेड़ के नीचे मिले थे, हम एक मंदिर के पीछे मिले थे। अनिल कौशिक ने पिता-पुत्र के मौजूदा रिश्तों पर कविता प्रस्तुत की।
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चुनावी माहौल में नेताओं के दोहरे चेहरे का वर्णन करते हुए अनिल गर्ग ने कविता प्रस्तुत करते हुए कहा, दुकान सजाए बैठे हैं, ईमानदार मेहनती समाजसेवी का लेबल लगाए बैठे हैं। अशोक बैरागी ने बेटी की व्यथा को कविता में पिरोते हुए कहा, मां अब मैं तुम्हारे सिवा किसी और के साथ नहीं रहना चाहती। रिसाल जांगड़ा ने कहा कि एक से एक नया देखिए रोज कमाल सियासत में, धोती फट कर बन जाता है एक कमाल सियासत में। रजनीश शर्मा ने रागनी प्रस्तुत करते हुए कहा कि सदी बीसवीं पाछै लोगों इसा जमाना आवेगा, इतनी किल्लत बढ़ जागी, माणस नै मानस खावैगा। लहणा सिंह ने भगवान शिव पार्वती के विवाह का गीत सुनाया। कमलेश शर्मा ने कहा कि साथी चेता यह वही है, तन का उजला मन का काला, साबुन के बुलबुलों में इंद्रधनुष दिखाने वाला, क्या हुआ तो इसने टोपी बदल ली है, पर आदमी तो वही है। इस मौके पर चतुर्भुज बंसल, विकास आनंद सहित अन्य कवि और साहित्यकार मौजूद थे।