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Kaithal News: अनहोनी के डर से 300 साल से होली नहीं मनाता दूसरेपुर गांव
Tue, 24 Feb 2026 03:00 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल
संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल
Updated Tue, 24 Feb 2026 03:00 AM IST
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गांव दूसरेपुर में बाबा का मंदिर
कैथल।
होली के पर्व में अब कुछ ही दिन शेष हैं और देशभर में उत्सव की तैयारियां जोर-शोर से चल रही हैं। वहीं जिले के गुहला के गांव दूसरेपुर में पिछले करीब 300 वर्षों से होली नहीं मनाई जाती। ग्रामीणों का मानना है कि यदि गांव में होली खेली गई तो कोई अनहोनी हो सकती है। सैंकड़ों वर्षों पहले कुछ शरारती तत्वों ने पर्व के दिन शरारत कर दी थी। इसके बाद एक बाबा ने जलती होलिका में छलांग लगाकर अपने प्राण त्याग दिए थे। वह गांव में कभी भी होली न मनाने का श्राप देकर गए थे।
ग्रामीणों राम, नरेश, संजीव ने बताया कि करीब तीन सौ साल पहले होली के दिन गांव में होलिका दहन की तैयारियां की गई थीं। सूखी लकड़ियां और उपले इकट्ठा कर विधि-विधान से आयोजन होना था। तय समय से पहले कुछ युवकों ने शरारत करते हुए होलिका दहन कर दिया। वहां मौजूद बाबा रामस्नेही ने उन्हें रोकने का प्रयास किया, लेकिन युवकों ने उनकी बात अनसुनी कर दी। बताया जाता है कि इससे आहत होकर बाबा ने जलती होली में छलांग लगा दी और प्राण त्यागते समय गांव को श्राप दे दिया कि भविष्य में यहां होली नहीं मनाई जाएगी। यदि किसी ने प्रयास किया तो उसके साथ अनिष्ट होगा। ग्रामीणों का विश्वास है कि श्राप से मुक्ति तभी मिलेगी जब होली के दिन किसी गाय का बछड़ा जन्म ले या किसी परिवार में पुत्र का जन्म हो। अब तक ऐसा संयोग नहीं बना इसलिए गांव में आज भी होली का त्योहार नहीं मनाया जाता। संवाद
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होली के पर्व में अब कुछ ही दिन शेष हैं और देशभर में उत्सव की तैयारियां जोर-शोर से चल रही हैं। वहीं जिले के गुहला के गांव दूसरेपुर में पिछले करीब 300 वर्षों से होली नहीं मनाई जाती। ग्रामीणों का मानना है कि यदि गांव में होली खेली गई तो कोई अनहोनी हो सकती है। सैंकड़ों वर्षों पहले कुछ शरारती तत्वों ने पर्व के दिन शरारत कर दी थी। इसके बाद एक बाबा ने जलती होलिका में छलांग लगाकर अपने प्राण त्याग दिए थे। वह गांव में कभी भी होली न मनाने का श्राप देकर गए थे।
ग्रामीणों राम, नरेश, संजीव ने बताया कि करीब तीन सौ साल पहले होली के दिन गांव में होलिका दहन की तैयारियां की गई थीं। सूखी लकड़ियां और उपले इकट्ठा कर विधि-विधान से आयोजन होना था। तय समय से पहले कुछ युवकों ने शरारत करते हुए होलिका दहन कर दिया। वहां मौजूद बाबा रामस्नेही ने उन्हें रोकने का प्रयास किया, लेकिन युवकों ने उनकी बात अनसुनी कर दी। बताया जाता है कि इससे आहत होकर बाबा ने जलती होली में छलांग लगा दी और प्राण त्यागते समय गांव को श्राप दे दिया कि भविष्य में यहां होली नहीं मनाई जाएगी। यदि किसी ने प्रयास किया तो उसके साथ अनिष्ट होगा। ग्रामीणों का विश्वास है कि श्राप से मुक्ति तभी मिलेगी जब होली के दिन किसी गाय का बछड़ा जन्म ले या किसी परिवार में पुत्र का जन्म हो। अब तक ऐसा संयोग नहीं बना इसलिए गांव में आज भी होली का त्योहार नहीं मनाया जाता। संवाद
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