{"_id":"687948d611eeff7e5d0a9597","slug":"dadhichi-had-sacrificed-his-body-pt-vishal-kaithal-news-c-18-1-knl1004-694592-2025-07-18","type":"story","status":"publish","title_hn":"दधिची ने दिया था शरीर का बलिदान : पं. विशाल","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
दधिची ने दिया था शरीर का बलिदान : पं. विशाल
Fri, 18 Jul 2025 12:32 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल
संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल
Updated Fri, 18 Jul 2025 12:32 AM IST
विज्ञापन
संवाद न्यूज एजेंसी
कैथल। हनुमान वाटिका स्थित शिव मंदिर में सावन मास पर चल रही शिव महापुराण कथा का छठा दिन गुरुवार को श्रद्धा और भक्ति से परिपूर्ण रहा। कथा में बड़ी संख्या में महिला श्रद्धालु शामिल हुईं। इस अवसर पर मंदिर के मुख्य पुजारी पंडित विशाल शर्मा ने महर्षि दधिची का प्रेरणादायक प्रसंग सुनाया।
पंडित शर्मा ने बताया कि महर्षि दधिची एक महान ऋषि थे, जिन्हें अत्यंत तपस्वी और ब्रह्मविद् कहा गया है। देवताओं और असुरों के युद्ध में जब देवता संकट में पड़े, तो उन्होंने दधिची से सहायता मांगी। दधिची ने देवताओं की रक्षा हेतु अपने शरीर का बलिदान देने का निर्णय लिया, ताकि उनकी हड्डियों से इंद्र के लिए वज्र अस्त्र बनाया जा सके।
उन्होंने पहले गंगाजल में स्नान कर शरीर में समाहित सभी दिव्य अस्त्रों का विसर्जन किया और फिर योगबल से देह त्याग दी। उनकी पसलियों और मेरुदंड से ब्रह्मा और विश्वकर्मा ने वज्र बनाया, जिससे इंद्र ने असुरों का संहार किया।
विज्ञापन
पंडित शर्मा ने यह भी बताया कि दधिची ने ज्ञान देने के लिए अश्विनी कुमारों के समक्ष घोड़े का मुख धारण किया था। उन्होंने ज्ञान और बल की बहस में वैज्ञानिक दृष्टिकोण से विजय प्राप्त की। एक यज्ञ में शिव और शक्ति को आमंत्रित न किए जाने पर उन्होंने उसका विरोध कर यज्ञ स्थल छोड़ दिया था। कथा में नरेश, बलवंत, रिंकू, लक्की, प्रवीण, बोती, धन्नो देवी, योगेश, कमला, सुरेश, रमेश, अनिल, धर्मेंद्र उपस्थित रहे।
विज्ञापन
कैथल। हनुमान वाटिका स्थित शिव मंदिर में सावन मास पर चल रही शिव महापुराण कथा का छठा दिन गुरुवार को श्रद्धा और भक्ति से परिपूर्ण रहा। कथा में बड़ी संख्या में महिला श्रद्धालु शामिल हुईं। इस अवसर पर मंदिर के मुख्य पुजारी पंडित विशाल शर्मा ने महर्षि दधिची का प्रेरणादायक प्रसंग सुनाया।
पंडित शर्मा ने बताया कि महर्षि दधिची एक महान ऋषि थे, जिन्हें अत्यंत तपस्वी और ब्रह्मविद् कहा गया है। देवताओं और असुरों के युद्ध में जब देवता संकट में पड़े, तो उन्होंने दधिची से सहायता मांगी। दधिची ने देवताओं की रक्षा हेतु अपने शरीर का बलिदान देने का निर्णय लिया, ताकि उनकी हड्डियों से इंद्र के लिए वज्र अस्त्र बनाया जा सके।
विज्ञापन
उन्होंने पहले गंगाजल में स्नान कर शरीर में समाहित सभी दिव्य अस्त्रों का विसर्जन किया और फिर योगबल से देह त्याग दी। उनकी पसलियों और मेरुदंड से ब्रह्मा और विश्वकर्मा ने वज्र बनाया, जिससे इंद्र ने असुरों का संहार किया।
विज्ञापन
पंडित शर्मा ने यह भी बताया कि दधिची ने ज्ञान देने के लिए अश्विनी कुमारों के समक्ष घोड़े का मुख धारण किया था। उन्होंने ज्ञान और बल की बहस में वैज्ञानिक दृष्टिकोण से विजय प्राप्त की। एक यज्ञ में शिव और शक्ति को आमंत्रित न किए जाने पर उन्होंने उसका विरोध कर यज्ञ स्थल छोड़ दिया था। कथा में नरेश, बलवंत, रिंकू, लक्की, प्रवीण, बोती, धन्नो देवी, योगेश, कमला, सुरेश, रमेश, अनिल, धर्मेंद्र उपस्थित रहे।