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Kaithal News: चीन की बनी लाइटों ने छीनी कुम्हारों की मुस्कान

Mon, 13 Oct 2025 01:35 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल
संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल Updated Mon, 13 Oct 2025 01:35 AM IST
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Chinese-made lights took away the smile of potters
12kht_27_कैथल के रेलवे गेट पर एक दुकान में मटकियां खरीदतीं महिलाएं।
संवाद न्यूज एजेंसी
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कैथल। दिवाली पर सजावट के लिए चीन की बनी लाइटों की मांग बढ़ जाती है। वहीं दूसरी ओर इससे कुम्हारों के चेहरे की मुस्कान चली गई है। उनकी दुकानों पर ग्राहक बहुत कम आ रहे हैं और दीये व मटके बेचकर परिवार का पेट पालने की चिंता उन्हें सताने लगी है।

दिवाली पर मिट्टी के दीये ंकभी हर घर की शान हुआ करते थे, लेकिन अब ऑनलाइन शॉपिंग और चाइनीज एलईडी लाइट्स ने उनके पारंपरिक कारोबार पर गहरी चोट की है। काम सिमट-सा गया है। लोग तवज्जो भी कम देते हैं।
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अग्रवाल धर्मशाला स्थित मार्केट में दिये और मटके बेचने वाले 58 वर्षीय कुम्हार रामदीन ने बताया कि पहले दिवाली से एक महीना पहले ही ऑर्डर मिल जाते थे। 100 से 200 दीये एक बार में बिक जाते थे, लेकिन अब लोग ऑनलाइन रंगीन लाइट्स और झूमर खरीद लेते हैं और रस्म निभाने के लिए महज चार-पांच दीये ही खरीदे जाते हैं।
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10 मीटर की एलईडी लड़ी 50-100 रुपये में

प्रमुख तलाई बाजार, नई अनाज मंडी रोड, माता गेट, रेलवे गेट और सद्भावना चौक पर जहां पहले दीयों की थालियां दिखती थीं, अब उनकी जगह चाइनीज लाइट बिकती नजर आती हैं। 10 मीटर की एलईडी लड़ी मात्र 50 से 100 रुपये में मिल जाती है, जबकि एक दीया बनाने में कुम्हार को केवल एक रुपये की लागत और मेहनत करनी पड़ती है।
लोग बोले
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छात्रा अंजली ने बताया कि उनका परिवार पिछले पांच साल से दीयों का काम कर रहा है। पिछली दिवाली में भी केवल नाम मात्र के दीये ही बिके। ऑनलाइन शॉपिंग के कारण कारोबार पर बुरा असर पड़ा है।

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दुकान में चाइनीज लाइट्स खरीदने आए युवक सोनू ने कहा कि दीये अच्छे लगते हैं, लेकिन बार-बार तेल डालना और बत्ती जलाना झंझट भरा है। एलईडी लाइट लगाने पर वह पूरी रात जलती रहती है।


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माता गेट पर दीये खरीदने आए बुजुर्ग सुरेंद्र ने कहा कि लोग अपनी संस्कृति और परंपराओं को भूलते जा रहे हैं। दीया जलाने से वातावरण शुद्ध होता है और मिट्टी से जुड़ाव का अहसास होता है।
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