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Kaithal News: श्रद्धा, आस्था, हर्षोल्लास एवं उमंग के साथ मनाया जाता है बैसाखी पर्व
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पूंडरी। भारत में हर पर्व श्रद्धा, आस्था, हर्षोल्लास एवं उमंग के साथ मनाया जाता है। पर्व एवं त्योहार प्रत्येक देश की संस्कृति तथा सभ्यता को उजागर करते हैं। भारतीय संस्कृति पर्व और उल्लास की संस्कृति हैं ,यहां प्रत्येक क्षण एक उत्सव है। यह जानकारी पंडित रविदत्त शास्त्री ने दी है।
बताया कि बैसाखी से कई घटनाएं जुड़ी हुई हैं। हमारे पूर्वजों ने पहली बार भूमि से अन प्राप्त किया इस कारण यह पर्व बन गया। गुरु गोविंद सिंह ने हिंदू धर्म की रक्षा के लिए इसी दिन ही खालसा ग्रंथ की स्थापना की थी। इसी दिन ही सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है, ऐसे में इसे मेष संक्रांति भी कहते हैं।
वैशाख का महीना भगवान को बहुत प्यारा है, पदम पुराण में आया है। इसीलिए इसका नाम माधव मास भी है। सूर्य की गति के अनुसार साल का पहला दिन बैसाखी ही है। वैशाखी हमें इस बात का संदेश देती है कि धर्म एवं हतोहंति धर्मो रक्षति रक्षित:अर्थात जो धर्म को नष्ट करता धर्म उसे नष्ट कर देता है और जो धर्म की रक्षा करता धर्म उसकी रक्षा करता है। फसल पककर किसान की मेहनत का फल मिलने का भी यही समय होता है।
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नक्षत्र शुभ स्थिति में होते हैं अर्थात् किसी भी कार्य को प्रारंभ करने के लिए यह शुभ मुहूर्त होता है।
यह जीवन के अमृत पक्ष को बढ़ाने के लिए हमारे ऋषि-मुनियों ने शास्त्रों में ऐसी व्यवस्था की है कि जन्म से मरण तक उत्सव होते रहे। क्षण प्रति क्षण जीवन सरसता में प्रवाह मान होता रहे|
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बताया कि बैसाखी से कई घटनाएं जुड़ी हुई हैं। हमारे पूर्वजों ने पहली बार भूमि से अन प्राप्त किया इस कारण यह पर्व बन गया। गुरु गोविंद सिंह ने हिंदू धर्म की रक्षा के लिए इसी दिन ही खालसा ग्रंथ की स्थापना की थी। इसी दिन ही सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है, ऐसे में इसे मेष संक्रांति भी कहते हैं।
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वैशाख का महीना भगवान को बहुत प्यारा है, पदम पुराण में आया है। इसीलिए इसका नाम माधव मास भी है। सूर्य की गति के अनुसार साल का पहला दिन बैसाखी ही है। वैशाखी हमें इस बात का संदेश देती है कि धर्म एवं हतोहंति धर्मो रक्षति रक्षित:अर्थात जो धर्म को नष्ट करता धर्म उसे नष्ट कर देता है और जो धर्म की रक्षा करता धर्म उसकी रक्षा करता है। फसल पककर किसान की मेहनत का फल मिलने का भी यही समय होता है।
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नक्षत्र शुभ स्थिति में होते हैं अर्थात् किसी भी कार्य को प्रारंभ करने के लिए यह शुभ मुहूर्त होता है।
यह जीवन के अमृत पक्ष को बढ़ाने के लिए हमारे ऋषि-मुनियों ने शास्त्रों में ऐसी व्यवस्था की है कि जन्म से मरण तक उत्सव होते रहे। क्षण प्रति क्षण जीवन सरसता में प्रवाह मान होता रहे|