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पशुओं में आने वाली लंपी स्किन वायरल बीमारी की जांच के लिए 10 सैंपल भेज भोपाल लैब
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09-कैथल। गोवंश।
- फोटो : Kaithal
कैथल। पशुओं में होने वाली लंपी स्किन वायरल बीमारी के लक्षण दिखने पर पशुपालन विभाग सक्रिय हो गया है। विभाग की टीम ने बुधवार को गांव रसूलपुर व दयोहरा से 10 सैंपल लेकर नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हाई सिक्योरिटी एनीमल डिजीज लैब भोपाल जांच के लिए भेज दिए हैं। इनमें नौ गायों व एक भैंस का सैंपल लिया है। रिपोर्ट आने के बाद ही बीमारी का पता चल पाएगा।
गौरतलब रहे कि इस बीमारी के लगने के बाद से जहां पशु चारा खाना बंद कर देते है। वहीं पशुओं को उठने बैठने में भी काफी दिक्कतें आने लगती हैं। पशुपालक पशु वैज्ञानिक के कुछ महत्वपूर्ण सुझाव व वेटनरी दवाओं का प्रयोग कर इस बीमारी से अपने पशुओं को बचा सकते हैं। इस रोग में पशुओं की त्वचा पर गांठें बनती हैं और जोड़ों में सूजन आ जाती है। त्वचा पर बनी गांठ घाव का रूप ले लेती हैं। पशु चिकित्सकों के अनुसार, संक्रमित पशुओं में तेज बुखार, शरीर में गांठे (खासकर सिर, गर्दन, अंडकोष और योनीमुख) में हो जाती हैं। मक्खियों से संक्रमण फैलने का खतरा अधिक होता है। पशुओं में दूध की कमी हो जाती है, भूख नहीं लगती, आंख व नाक से पानी बहने लगता है और सांस लेने में कठिनाई होती है। पशु की मौत होने का भी खतरा रहता है।
पशुपालन विभाग के एसडीओ कुलदीप श्योकंद ने बताया कि दो गांवों से संदिग्ध तौर पर लंपी स्किन वायरल डिजीज बीमारी की जानकारी मिली थी। दोनों गांव में पशुओं के वैटनरी डॉक्टरों ने सैंपल लेकर रिपोर्ट को भोपाल लैब में भेज दिया है। बीमारी की रोकथाम के लिए पशुपालक प्रतिदिन अपने पशुओं की निगरानी करते रहें। साथ ही इस बीमारी के फैलने की आशंका होने के बाद पशु को वेटनरी डॉक्टर से दिखाएं तथा पशुओं को तत्काल दूसरे पशुओं से दूर करते हुए उसे आइसोलेट कर दें। उन्होंने बताया कि संक्रमण वाली यह बीमारी कोरोना जैसी ही है। पहले बुखार उतारने की दंवा दें। इसके बाद पानी ज्यादा से ज्यादा पिलाएं। ब्रोड स्पेक्ट्रम एंटीबायोटिक व एक कैल्शियम का इंजेक्शन दिलाना अत्यंत लाभकारी होता है।
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गौरतलब रहे कि इस बीमारी के लगने के बाद से जहां पशु चारा खाना बंद कर देते है। वहीं पशुओं को उठने बैठने में भी काफी दिक्कतें आने लगती हैं। पशुपालक पशु वैज्ञानिक के कुछ महत्वपूर्ण सुझाव व वेटनरी दवाओं का प्रयोग कर इस बीमारी से अपने पशुओं को बचा सकते हैं। इस रोग में पशुओं की त्वचा पर गांठें बनती हैं और जोड़ों में सूजन आ जाती है। त्वचा पर बनी गांठ घाव का रूप ले लेती हैं। पशु चिकित्सकों के अनुसार, संक्रमित पशुओं में तेज बुखार, शरीर में गांठे (खासकर सिर, गर्दन, अंडकोष और योनीमुख) में हो जाती हैं। मक्खियों से संक्रमण फैलने का खतरा अधिक होता है। पशुओं में दूध की कमी हो जाती है, भूख नहीं लगती, आंख व नाक से पानी बहने लगता है और सांस लेने में कठिनाई होती है। पशु की मौत होने का भी खतरा रहता है।
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पशुपालन विभाग के एसडीओ कुलदीप श्योकंद ने बताया कि दो गांवों से संदिग्ध तौर पर लंपी स्किन वायरल डिजीज बीमारी की जानकारी मिली थी। दोनों गांव में पशुओं के वैटनरी डॉक्टरों ने सैंपल लेकर रिपोर्ट को भोपाल लैब में भेज दिया है। बीमारी की रोकथाम के लिए पशुपालक प्रतिदिन अपने पशुओं की निगरानी करते रहें। साथ ही इस बीमारी के फैलने की आशंका होने के बाद पशु को वेटनरी डॉक्टर से दिखाएं तथा पशुओं को तत्काल दूसरे पशुओं से दूर करते हुए उसे आइसोलेट कर दें। उन्होंने बताया कि संक्रमण वाली यह बीमारी कोरोना जैसी ही है। पहले बुखार उतारने की दंवा दें। इसके बाद पानी ज्यादा से ज्यादा पिलाएं। ब्रोड स्पेक्ट्रम एंटीबायोटिक व एक कैल्शियम का इंजेक्शन दिलाना अत्यंत लाभकारी होता है।
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