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सोशल मीडिया ने लील लिया झंडे, बैनर, पोस्टर्स वालों का रोजगार
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कैथल। लोकसभा चुनावी घमासान इस समय चरम पर है। हर आदमी चुनावी गर्मी महसूस कर रहा है। लेकिन ठंडा है तो बस झंडे, बैनर, पोस्टर व होर्डिंग्स बनाने वालों का धंधा। चुनाव में जहां घरों पर लहराते झंडे विभिन्न राजनीतिक दलों का माहौल बनाते थे। लोग आपसी विचार-विमर्श से चुनावी नतीजों का आंकलन करते थे। लेकिन इस बार कोई ज्यादा झंडे और बेनर नजर नहीं आ रहे हैं। लोगों के विचार-विमर्श मोबाइल में सिमट कर रह गए हैं। सोशल मीडिया ने चुनाव प्रचार का पूरी तरह से रंग-ढंग बदल दिया है। सियासत केवल मोबाइल पर हो रही है। जिसका खामियाजा उन हजारों लोगों को भुगतना पड़ रहा है। जो प्रचार के इस काम के लिए पांच साल का इंतजार करते थे।
कैथल में इंडियन प्रचार एजेंसी के संचालक सतीश कुमार बताते हैं कि धंधा पूरी तरह से चौपट हो गया है। 10 प्रतिशत भी ऑर्डर नहीं हैं। चुनाव में पर्चे, स्टिकर, बिल्ले, झंडे व बैनर छपवाने के लिए ऑर्डर इतने आते थे कि 24 घंटे काम करके भी ऑर्डर पूरे नहीं हो पाते थे। लेकिन अब जो पार्टी 100 झंडे छपवाती थी, वह आज मुश्किल से 10 झंडे छपवा रही है।
चुनाव आयोग के डंडे के कारण नहीं छपवा रहे पोस्टर, बैनर व झंडे:
संगमेश्वर फ्लैक्स संचालक कपिल कुमार का कहना है कि अब की बार उनके काम के हिसाब से देखा जाए तो पता ही नहीं चल रहा कि चुनाव है भी या नहीं। चुनाव आयोग की इतनी सख्त हिदायतें हैं कि उम्मीदवार खुद न के बराबर खर्च कर रहे हैं। पार्टियां बड़े स्तर पर चुनाव से पहले ही चुनाव सामग्री प्रकाशित करवा रही हैं। जिन्हें उम्मीदवार को स्पॉंसर कर देती हैं। जो उसके खर्च में नहीं जुड़ता। जिस कारण इस बार उम्मीदवार न के बराबर ही सामग्री प्रकाशित करवा रहे हैं।
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स्टॉक हो रहा है खराब, नफे की बजाए हो रहा है नुकसान
विक्रेता कपिल कुमार का कहना है कि उन्होंने दो माह पहले ही ऑर्डर देकर माल खरीद लिया था। जो इस समय गोदामों में बारिश में खराब हो रहा है। ना तो झंडों को लेकर ही ऑर्डर मिल रहे, ना ही पोस्टर, बैनरर्स व होर्डिंग्स के ऑर्डर मिल रहे।
सोशल मीडिया का है बड़ा इफेक्ट
राजनीतिक विशेषज्ञ प्रो. सीबी सैनी का कहना है कि समय के साथ-साथ प्रचार के तौर-तरीकों में बड़ा बदलाव आया है। गांव-शहर में चौक-चौराहों पर होने वाली चर्चाओं ने सोशल मीडिया के तौर पर मोबाइल में जगह बना ली है। अब सभी लोग मोबाइल में व्हाट्सएप फेसबुक पर ही अपने विचारों का आदान-प्रदान कर रहे हैं। उसी को असली सच्चाई समझ रहे हैं। जबकि सोशल मीडिया पर बहुत सी सूचनाएं भ्रामक होती हैं। लेकिन इसी का फर्क है कि इस बार झंडे, बैनर्स व पोस्टरों के बिना चुनाव नजर आ रहा है। हकीकत में कोई लड़ाई नहीं, सोशल मीडिया पर जमकर चुनावी जंग चल रही है।
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कैथल में इंडियन प्रचार एजेंसी के संचालक सतीश कुमार बताते हैं कि धंधा पूरी तरह से चौपट हो गया है। 10 प्रतिशत भी ऑर्डर नहीं हैं। चुनाव में पर्चे, स्टिकर, बिल्ले, झंडे व बैनर छपवाने के लिए ऑर्डर इतने आते थे कि 24 घंटे काम करके भी ऑर्डर पूरे नहीं हो पाते थे। लेकिन अब जो पार्टी 100 झंडे छपवाती थी, वह आज मुश्किल से 10 झंडे छपवा रही है।
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चुनाव आयोग के डंडे के कारण नहीं छपवा रहे पोस्टर, बैनर व झंडे:
संगमेश्वर फ्लैक्स संचालक कपिल कुमार का कहना है कि अब की बार उनके काम के हिसाब से देखा जाए तो पता ही नहीं चल रहा कि चुनाव है भी या नहीं। चुनाव आयोग की इतनी सख्त हिदायतें हैं कि उम्मीदवार खुद न के बराबर खर्च कर रहे हैं। पार्टियां बड़े स्तर पर चुनाव से पहले ही चुनाव सामग्री प्रकाशित करवा रही हैं। जिन्हें उम्मीदवार को स्पॉंसर कर देती हैं। जो उसके खर्च में नहीं जुड़ता। जिस कारण इस बार उम्मीदवार न के बराबर ही सामग्री प्रकाशित करवा रहे हैं।
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विक्रेता कपिल कुमार का कहना है कि उन्होंने दो माह पहले ही ऑर्डर देकर माल खरीद लिया था। जो इस समय गोदामों में बारिश में खराब हो रहा है। ना तो झंडों को लेकर ही ऑर्डर मिल रहे, ना ही पोस्टर, बैनरर्स व होर्डिंग्स के ऑर्डर मिल रहे।
सोशल मीडिया का है बड़ा इफेक्ट
राजनीतिक विशेषज्ञ प्रो. सीबी सैनी का कहना है कि समय के साथ-साथ प्रचार के तौर-तरीकों में बड़ा बदलाव आया है। गांव-शहर में चौक-चौराहों पर होने वाली चर्चाओं ने सोशल मीडिया के तौर पर मोबाइल में जगह बना ली है। अब सभी लोग मोबाइल में व्हाट्सएप फेसबुक पर ही अपने विचारों का आदान-प्रदान कर रहे हैं। उसी को असली सच्चाई समझ रहे हैं। जबकि सोशल मीडिया पर बहुत सी सूचनाएं भ्रामक होती हैं। लेकिन इसी का फर्क है कि इस बार झंडे, बैनर्स व पोस्टरों के बिना चुनाव नजर आ रहा है। हकीकत में कोई लड़ाई नहीं, सोशल मीडिया पर जमकर चुनावी जंग चल रही है।