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किसान बोले, सवाल जीवन-मरण का है कोई हमारी भी तो सोचे

Sat, 02 Oct 2021 01:30 AM IST
Rohtak Bureau रोहतक ब्यूरो
Updated Sat, 02 Oct 2021 01:30 AM IST
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The farmer said, the question is of life and death, even if someone thinks of us
टीकरी बार्डर पर एसकेएम नेताओं के विचार सुनते किसान। - फोटो : Bahadurgarh
टीकरी बार्डर बंद होने से जनता को हो रही परेशानियों की वजह से सुप्रीम कोर्ट ने भले आंदोलनकारियों पर फटकार लगाई है, लेकिन कानून वापसी से पहले किसानों का फैसला बदलता हुआ नजर नहीं आ रहा। शुक्रवार को भी आंदोलन के टीकरी बार्डर पड़ाव में पहले की तरह ही गतिविधियां चलीं। दोनों बड़ी सभाएं भी हुईं। किसान कहते हैं कि सवाल जीवन-मरण का है। कानून वापस नहीं करवाए तो उनकी अगली पीढ़ियां बर्बाद हो जाएंगी।
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बहादुरगढ़ प्रदेश के प्रमुख औद्योगिक नगरों में है। यहां छोटी बड़ी मिलाकर करीब 9000 औद्योगिक इकाइयां हैं। इन उद्योगों में सात लाख से अधिक लोग काम करते हैं। तीन हजार से अधिक फैक्टरियां तो आधुनिक औद्योगिक क्षेत्र में हैं और इस क्षेत्र के बीचोंबीच गुजरते दिल्ली रोड पर ही किसानों का पड़ाव है। परिणाम स्वरूप उद्योगों का कार्य प्रभावित होता है। टीकरी बार्डर बंद है। दिल्ली जाना सुगम न होने के कारण उद्योगों को हर रोज करोड़ों रुपये का नुकसान होता है।
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बहादुरगढ़ के उद्योगों के सबसे बड़े संगठन बहादुरगढ़ चैंबर आफ कामर्स एंड इंडस्ट्रीज के वरिष्ठ उपाध्यक्ष नरिन्दर छिक्कारा का कहना है कि किराए के भवनों में चलने वाली अनेक फैक्टरियां रास्ता न मिलने के कारण बंद हो चुकी हैं। दिल्ली से श्रमिकों को हर रोज मेट्रो से आना बहुत महंगा पड़ने लगा है। इसलिए हजारों श्रमिकों ने काम छोड़ दिया है। औद्योगिक क्षेत्र की 300 से अधिक दुकानें भी नुकसान में हैं। कुल मिलाकर बहादुरगढ़ के उद्योगों की वार्षिक टर्नओवर करीब 80 हजार करोड़ रुपये होती है और 10 महीने से सुगम रास्ते न मिलने से लगभग 20 हजार करोड़ रुपये का नुकसान हो चुका है।
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दिल्ली रोड स्थित दो अस्पताल के संचालकों का कहना है कि सड़क पर किसानों के पड़ाव के कारण मरीजों को अस्पतालों तक लाने में कठिनाई होती है। तमाम मरीज नहीं आ पाते और करोड़ों रुपये का नुकसान होने के कारण उन्हें अस्पताल चलाना मुश्किल हो गया है। बहादुरगढ़ से हर रोज जो हजारों लोग बस से दिल्ली जाते थे उन्हें अब मेट्रो से जाना पड़ता है, जो महंगा पड़ता है। दिल्ली के सदर बाजार में नौकरी करने वाले अनिल ने कहा कि उनकी आधी पगार किराए में ही लग जाती है। एक तरफ के 60 रुपये लगते हैं। गुजारा नहीं हो पा रहा। बसें चल पड़ें तो आधार किराया भी खर्च नहीं होगा।
किसानों के इस पड़ाव में टीकरी बार्डर से पुराने बस स्टैंड तक और उधर जाखोदा गांव तक किसानों की ट्रालियां व झोंपड़ियां हैं। कुल मिलाकर करीब 20 किलोमीटर लंबी सड़कों पर आंदोलनकारी जमे बैठे हैं। सूत्रों के अनुसार, यहां आजकल हर रोज लगभग 10 हजार आंदोलनकारी रहते हैं। सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी का ध्यान दिलाने पर किसानों का कहना है कोर्ट को हमारा भी तो ध्यान रखना चाहिए। किसान नेता हरबीर सिंह ने कहा कि हम किसी को कष्ट नहीं देना चाहते। सरकार हमारे साथ इंसाफ कर दे हम सड़कों से तुरंत हट जाएंगे। परमजीत सिंह ने कहा कि हमारे बच्चों के लिए रोटी का सवाल है। ये कानून नहीं हटे तो भूखे मरेंगे। हम अदालत का सम्मान करते हैं लेकिन अदालत हम पर भी कृपा करे। संवाद

हम किसान तो तीन नए कृषि कानूनों का विरोध जताने के लिए दिल्ली जाना चाहते थे। सरकार ने टीकरी बार्डर को बंद किया। हमने नहीं किया। अब रास्ता खोलना न खोलना भी सरकार का काम है। - परगट सिंह, सचिव, भारतीय किसान यूनियन (राजेवाल)
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