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अभ्यास से दृष्टिहीन विद्यार्थियों के दिमाग की कार्यक्षमता बढ़ी, कर रहे रंगों की पहचान

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sat, 11 Sep 2021 12:41 AM IST
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With practice, the efficiency of the brain of blind students increased, identifying colors
संदीप बिश्नोई
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हिसार। आध्यात्म और दिमागी संतुलन का अभ्यास करके दृष्टिहीन भी अखबार पढ़ सकते हैं, रंगों की पहचान कर सकते हैं। यह एक सुपर ह्यूमन बनने जैसा है। गुरु जंभेश्वर विश्वविद्यालय के पंडित दिनदयाल उपाध्याय इन्क्यूबेशन सेंटर से मिले प्रोजेक्ट विजुअलाइजेशन ऑफ ब्लाइंड पिपल एंड ह्यूमन फिजियोलॉजी के माध्यम से सॉफ्टवेयर इंजीनियर जितेंद्र जांगड़ा ने यह साबित किया है।
उन्होंने 50 दृष्टिहीन विद्यार्थियों को लगातार अभ्यास कराकर सिर्फ छूकर रंगों की पहचान करना सिखाया। अब विद्यार्थी बिना ब्रेल लिपी के शब्द भी पढ़ लेते हैं। जितेंद्र जांगड़ा का कहना है कि ध्यान और लगातार मानसिक अभ्यास किए जाने पर साधारण व्यक्ति भी आंखें बंद करके पढ़ सकता है। उनका दावा है कि इस प्रोजेक्ट से पहले ही वे देश के करीब 500 दृष्टिहीनों को रंगों की पहचान करना सिखा चुके हैं।
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पिनियल ग्लैंड को उच्च स्तर तक करते हैं एक्टिवेट
जितेंद्र बताते हैं कि कई बार इंसानों में छठी इंद्री या तीसरा नेत्र खुलने की बात की जाती है। अंग्रेजी में इसे पिनियल ग्लैंड कहते हैं, जो दिमाग का एक हिस्सा होता है। यह मेलाटोनिन नाम का हार्मोन रिलीज करता है। यह मनुष्य की पांचों इंद्रियों को अपना-अपना कार्य करने के लिए सक्षम बनाती है। जितेंद्र कहते हैं कि उनकी पद्धति पिनियल ग्लैंड को उच्च स्तर तक एक्टिवेट करती है, जिसके कारण उसकी सभी इंद्रियां काम करना शुरू कर देती हैं और बिन आंखों के भी इंसान आस-पास की चीजें महसूस करता है। दिमाग की इस ताकत को बढ़ाने के लिए वे मस्तिष्क योग, गहन साधना और नाद योग क्रियाएं करवाते हैं।
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सामान्य विद्यार्थियों की दिमागी क्षमता 300 प्रतिशत बढ़ी
जितेंद्र बताते हैं उनके प्रोजेक्ट में 50 दृष्टिहीन और 50 सामान्य विद्यार्थियों को शामिल किया गया था। ये सभी विद्यार्थी अलग-अलग उम्र और अलग-अलग स्थानों के थे। उनके अभ्यास करवाने के बाद दृष्टिहीन 50 विद्यार्थियों में से 49 ने रंगों की पहचान करनी शुरू कर दी है। वहीं कुछ दृष्टिहीन विद्यार्थी ऐसे हैं, जो हाथ से छूकर स्वाद तक बता रहे हैं। वहीं अभ्यास करवाने के बाद सामान्य विद्यार्थियों की दिमागी क्षमता में 300 प्रतिशत तक इजाफा हुआ है। इससे विद्यार्थियों की याद्दाश्त, एकाग्रता, पढ़ने की गति और मुश्किल चीजों का आसानी से याद करने की क्षमताएं कई गुणा बढ़ गई हैं।
ऐसे शुरू हुआ सफर
जितेंद्र का कहना है कि बचपन से ही उनका रुझान आध्यात्मिक विद्याओं में था। ध्यान करते-करते पता चला कि इससे मानसिक शक्तियां जागृत हो जाती हैं। उन्हें कुछ प्राकृतिक सिग्नल मिलना शुरू हो गए। पहली बार ध्यान आया कि उन्हें कोई अष्टावक्र महागीता को पढ़ना चाहिए, उन्होंने इसे सामान्य तरीके से लिया, क्योंकि इस पुस्तक के बारे में उन्होंने न सुना था और न देखी थी, लेकिन अगले ही दिन संयोग से उनके दोस्त ने वो पुस्तक भेंट कर दी।

पहली बार नेपाल में करवाया दृष्टिहीनों को अभ्यास
दूसरी बार उन्हें आभास हुआ कि उन्हें नेपाल जाना चाहिए। अगले ही दिन एक मित्र ने काठमांडू का प्रस्ताव रखा और चले गए। वहां एक ऐसे स्कूल में पहुंचे जहां सामान्य और दृष्टिहीन विद्यार्थी पढ़ते थे। प्राचार्य के कहने पर उन्हें कुछ अभ्यास करवाया तो पाया कि दृष्टिहीन विद्यार्थियों ने अलग-अलग रंग की अपनी बैठने की टाट का रंग पहचान लिया। इसी घटना के बाद उन्होंने इस विषय का गहरा अध्ययन किया। आधुनिक विज्ञान में दुनिया में इस संबंध में हुए शोध व शिव पुराण और ऋग्वेद जैसे पौराणिक ग्रंथ पढ़े, जिनमें मानसिक शक्तियों का जिक्र था। इसके बाद अभ्यास करने से यह सत्य साबित हो गया।
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