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Hisar News: डिजिटल किताब का सपना अधूरा... बस्ते के बोझ तले दबा बचपन

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Mon, 05 May 2025 12:57 AM IST
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The dream of a digital book remains unfulfilled... Childhood is crushed under the burden of schoolbags.
भारी स्कूल बैग के साथ जाते बच्चे।  संवाद 
हिसार। विद्यार्थियों के कंधों पर बस्ते का बोझ कम करने के उद्देश्य से शिक्षा निदेशालय ने ज्वॉयफुल डे और डिजिटल किताबें अपलोड करने की योजनाएं केवल कागजों तक सिमट गईं। शिक्षकों पर अतिरिक्त बोझ और अधिकारियों की उदासीनता के कारण इन योजनाओं का कोई प्रभावी परिणाम नहीं निकला। अगर यही हाल रहा तो विद्यार्थियों पर बस्ते का बोझ बढ़ता जाएगा।
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योजना का उद्देश्य विद्यार्थियों को हर शनिवार बिना बैग के स्कूल भेजा जाए और पाठ्यक्रम की किताबों को डिजिटल प्लेटफार्मों पर अपलोड किया जाए, ताकि उनके बस्ते का बोझ हल्का किया जा सके, लेकिन शिक्षकों पर गैर-शैक्षणिक कार्यों का दबाव इस हद तक बढ़ा कि विद्यार्थी ज्वॉयफुल डे नहीं मना सके। हालांकि इन योजनाओं के क्रियान्वयन में शिक्षा निदेशालय के आला अधिकारियों की इच्छाशक्ति की भी कमी साफ दिखी। न तो उन्होंने समय पर जिला शिक्षा अधिकारी (डीईओ) और उप जिला शिक्षा अधिकारी (डीईईओ) से प्रतिक्रिया ली और न ही विद्यालयों का औचक निरीक्षण किया।
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पत्राचार तक ही सीमित रहा शिक्षा निदेशालय का प्रयास
शिक्षा निदेशालय ने ज्वॉयफुल डे और डिजिटल किताबें जैसी योजनाओं के लिए पत्राचार तो किया, लेकिन उच्च अधिकारियों ने न तो इन पर गंभीरता से विचार किया और न ही विद्यालयों में जाकर आकलन किया। योजनाओं को सही तरीके से लागू करने के लिए बीईओ, डीईओ और अन्य आला अधिकारियों को विद्यालयों का निरीक्षण कर प्रतिक्रियाएं लेनी चाहिए थीं, लेकिन उन्हाेंने अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई। अधिकारियों की लापरवाही के कारण इन योजनाओं का प्रभाव न के बराबर रहा और बस्ते के बोझ को कम करने का उद्देश्य अधूरा ही रह गया।
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शिक्षकों पर अनावश्यक रूप से गैर-शैक्षणिक कार्यों का बोझ हटा दिया जाए तो बस्ते का बोझ हट सकता है। इसके लिए सप्ताह को विषयानुसार बांटने की जरूरत है। अगर हर विषय को दिन के हिसाब से पढ़ाया जाएं तो काफी हद तक बस्ते का बोझ कम होगा। - जयभगवान वर्मा, प्राचार्य, पीएमश्री राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय, गांव गंगवा।


नए शैक्षणिक सत्र से ज्वॉयफुल डे बनाने पर जोर दिया जाएगा, ताकि बस्ते का बोझ कम किया जाएगा। किसी भी हाल में बच्चों के कंधों पर अनावश्यक बोझ डालना सहन नहीं किया जाएगा। - डॉ. निर्मल दहिया, जिला मौलिक शिक्षा अधिकारी, हिसार।
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