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Hisar: रंग लाई एनआरसीई की मेहनत, अश्व की आठवीं नस्ल भीमथड़ी की लगी प्रदर्शनी
Mon, 19 Feb 2024 10:01 AM IST
नवीन दलाल
श्याम नंदन कुमार, हिसार (हरियाणा)
श्याम नंदन कुमार, हिसार (हरियाणा)
Published by: नवीन दलाल
Updated Mon, 19 Feb 2024 10:01 AM IST
सार
राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान केंद्र हिसार के क्षेत्रीय केंद्र अश्व उत्पादन परिसर बीकानेर के प्रभागाध्यक्ष डाॅ. शरत चंद्र मेहता ने बताया कि भीमथड़ी नस्ल के अश्व महाराष्ट्र के पुणे, अहमदाबाद, सतारा, सोलापुर, सांगली और कोल्हापुर में तीन सौ साल पहले काफी चर्चित थे। पिछले तीस-चालीस साल से भारत सरकार की नजर में यह नस्ल विलुप्त प्राय हो गई थी।
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राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान केंद्र
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिकों की मेहनत रंग लाने लगी है। आठवीं नस्ल के रूप में मान्यता मिलने के दो माह के भीतर ही भीमथड़ी अश्वों ने पुणे में शो के दौरान ऐसा रंग जमाया कि शिवाजी के इस प्यारे अश्व की कहानी फिर से जीवंत हो गई। पहले शो में 70 से अधिक अश्वों के करतब दिखाने से उत्साहित राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिकों को अब इस घोड़े को खोई हुई प्रतिष्ठा दोबारा मिलने और इसके संरक्षण की उम्मीद बलवती हो गई है।
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राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान केंद्र हिसार के क्षेत्रीय केंद्र अश्व उत्पादन परिसर बीकानेर के प्रभागाध्यक्ष डाॅ. शरत चंद्र मेहता ने बताया कि भीमथड़ी नस्ल के अश्व महाराष्ट्र के पुणे, अहमदाबाद, सतारा, सोलापुर, सांगली और कोल्हापुर में तीन सौ साल पहले काफी चर्चित थे। तेज रफ्तार से दौड़ने और पठारों पर चढ़ने में सक्षम ये घोड़े क्षत्रपति शिवाजी महाराज की सेना के प्रमुख अंग थे। बाद में कद्रदानों की संख्या कम होने के साथ ही धीरे-धीरे इनकी संख्या कम होने लगी।
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पिछले तीस-चालीस साल से भारत सरकार की नजर में यह नस्ल विलुप्त प्राय हो गई थी। एफएओ की रिपोर्ट में इनकी संख्या करीब 100 बताई गई थी। ऐसे में इस बात की उम्मीद लगभग नहीं के बराबर थी कि इस नस्ल को दोबारा मान्यता मिल सकती है। तभी अश्व अनुसंधान संस्थान को यह पता चला कि भीमथड़ी नस्ल के घोड़े महाराष्ट्र के इस हिस्से में रह रहीं कुछ घुमंतू जनजातियों के पास हैं, जो इनको बोझ ढोने के काम में लाते हैं। यहीं से उम्मीद की किरण जगी और डाॅ. एससी मेहता, डॉ रणजीत पंवार और उनकी टीम ने इसके संरक्षण की दिशा में काम शुरू कर दिया। उन्होंने क्षेत्र में मिलने वाले अश्वों का डीएनए जांच और दूसरे माध्यमों से यह इस नस्ल के अश्वों की तलाश शुरू की।
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टीम ने पूरी रिपोर्ट के साथ राष्ट्रीय पशु आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो करनाल के पास इस नस्ल की मान्यता हेतु आवेदन दिया। इसके बाद डॉ. राजेंद्र गोयल और डॉ. एस निरंजन की टीम ने दावे का सत्यापन किया। इंस्पेक्शन और दूसरी अन्य प्रक्रियाओं को पूरा करने के बाद 5 दिसंबर 2023 को दिल्ली में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के डिप्टी डायरेक्टर जनरल की अध्यक्षता में नस्ल पंजीकरण समिति ने भीमथड़ी को आठवीं नस्ल के रूप में मान्यता प्रदान की।
आगे क्या : पोलो, घुड़दौड़ और रेस शो में जलवा दिखाएंगे भीमथड़ी अश्व
नस्ल को मान्यता मिलते ही इस नस्ल के उत्थान की दिशा में भी प्रयास शुरू हो गए हैं। ऑल इंडिया भीमथड़ी हॉर्स एसोसिएशन के संस्थापक रणजीत पवार बनाए गए हैं। एनआरसीई बीकानेर के प्रभागाध्यक्ष डा. शरद मेहता ने बताया कि इस घोड़े की क्षमता कमाल की है। पोलो, घुड़दौड़ और हार्स शो जैसे कार्यक्रमों के आयोजन के साथ ही दोबारा से इसे महाराष्ट्र और पूरे देश में प्रतिष्ठा दिलाने का काम किया जाएगा। पुणे के बारामती में हुए पहले शो को लेकर हमलोगों को उम्मीद थी कि इस नस्ल के करीब 30 अश्व शो में आएंगे लेकिन 70 अश्व आए। यह आंकड़ा उम्मीद जगाने वाली है।
प्रतिक्रिया
फिलहाल देश में इस नस्ल के अश्व की संख्या 5134 है लेकिन इनमें से महज 30 फीसद ही मादाएं हैं। जो अश्व हैं, उनका पोषण स्तर भी उम्दा स्तर का नहीं है। ऐसे में इस नस्ल को पुरानी प्रतिष्ठा दिलाना चुनौतीपूर्ण है। - डॉ. एससी मेहता, प्रभागाध्यक्ष, अश्व अनुसंधान केंद्र बीकानेर।
इस अश्व को मान्यता दिलाने में डा. एससी मेहता की भूमिका प्रशंसनीय है। वे पिछले चार साल से इस कार्य में जुटे हुए थे। भीमथड़ी का आठवें नस्ल के रूप में मान्यता मिलना संस्थान के लिए गौरव का विषय है। - डॉ. टीके भट्टाचार्य, निदेशक, राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान केंद्र हिसार।