{"_id":"69581e8b3e576fcd6f0f60b7","slug":"fear-of-society-fear-of-daughters-futureparents-snatch-away-childhood-due-to-fear-of-live-in-and-unconsensual-marriage-hisar-news-c-21-hsr1020-782617-2026-01-03","type":"story","status":"publish","title_hn":"Hisar News: समाज का भय, बेटियों का भविष्य....लिव-इन और बिना रजामंदी के शादी के डर में बचपन छीनते मां-बाप","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Hisar News: समाज का भय, बेटियों का भविष्य....लिव-इन और बिना रजामंदी के शादी के डर में बचपन छीनते मां-बाप
विज्ञापन
सातरोड सीनियर सेकेंडरी स्कूल में छात्राओं को जागरूक करती अधिकरी बबीता चौधरी
हिसार। जिले में बाल विवाह के मामलों के पीछे अब एक नया सामाजिक डर सामने आ रहा है। कई माता-पिता इस आशंका में अपनी बेटियों की कम उम्र में शादी कर देना चाहते हैं कि कहीं वे बिना बताए किसी से शादी न कर लें या लिव-इन रिलेशनशिप में न रहने लगें। इसी सोच के चलते बाल विवाह के प्रयास हो रहे हैं, जिन्हें महिला एवं बाल विकास विभाग ने समय रहते रोका है। वर्ष 2025 में विभाग की सक्रियता से 12 नाबालिग लड़कियों के बाल विवाह रुकवाए गए।
महिला एवं बाल विकास विभाग की ओर से जिलेभर में लगातार जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है। इसके तहत स्कूलों, मंदिरों, मस्जिदों, गुरुद्वारों और गांवों में जाकर लोगों को बाल विवाह के दुष्परिणामों और कानून की जानकारी दी जा रही है, ताकि अभिभावक और समाज इस सामाजिक अभिशाप से बेटियों को बचा सकें।
जिला संरक्षण एवं बाल विवाह निषेध अधिकारी बबीता चौधरी ने बताया कि सरकार का उद्देश्य देश, प्रदेश और जिले को बाल विवाह मुक्त बनाना है। इसके लिए जमीनी स्तर पर जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं, ताकि लोग खुद सतर्क हों और कहीं भी बाल विवाह की जानकारी मिलने पर तुरंत शिकायत करें। उन्होंने बताया कि अब तक जिले के 200 से अधिक गांवों के स्कूलों में यह अभियान चलाया जा चुका है।
विज्ञापन
जहां से शिकायत मिलती है, वहां तुरंत होता है एक्शन
बबीता चौधरी ने बताया कि वर्ष 2025 में बाल विवाह से संबंधित कुल 15 शिकायतें प्राप्त हुईं। इनमें से 11 मामलों में लड़कियां नाबालिग पाई गईं, जबकि एक मामले में लड़की की उम्र लड़के से अधिक थी और लड़के की उम्र 18 वर्ष थी। इन सभी मामलों में शादियां रुकवा दी गईं। वहीं तीन मामलों में वर-वधु दोनों बालिग पाए गए, इसलिए कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की गई।
इस डर से उठाते हैं गलत कदम
बबीता चौधरी ने बताया कि कई अभिभावकों को यह डर सताने लगा है कि उनकी बेटी कहीं घर से भागकर शादी न कर ले या लिव-इन रिलेशनशिप में न रहने लगे। इसी भय के चलते वे समय से पहले शादी कराने का प्रयास करते हैं। हालांकि, जब ऐसे माता-पिता को कानून और इसके दुष्परिणामों के बारे में समझाया गया, तो उन्होंने अपनी गलती स्वीकार की और लिखित में दिया कि वे बेटियों की शादी बालिग होने के बाद ही करेंगे।
पंचायतों के साथ मिलकर चलेगा अभियान
उन्होंने बताया कि इस माह मंदिरों, मस्जिदों और गुरुद्वारों में जाकर विशेष जागरूकता अभियान चलाया जाएगा। फरवरी से ग्राम पंचायतों के सहयोग से गांव-गांव में अभियान तेज किया जाएगा, ताकि अधिक से अधिक लोग जागरूक होकर बाल विवाह रोकने में भागीदार बनें।
बाल विवाह को लेकर यह है कानून
अधिवक्ता सुरेश कुमार ने बताया कि बाल विवाह निषेध अधिनियम-2006 के तहत लड़के की न्यूनतम उम्र 21 वर्ष और लड़की की 18 वर्ष तय है। कानून का उल्लंघन करने पर दो साल तक की कैद और एक लाख रुपये तक जुर्माने का प्रावधान है। इसमें माता-पिता के साथ विवाह कराने वाले पंडित या मौलवी भी दोषी माने जाते हैं। बाल विवाह रोकने के लिए 1098 हेल्पलाइन और बाल विवाह निषेध अधिकारी तैनात हैं।
विज्ञापन
महिला एवं बाल विकास विभाग की ओर से जिलेभर में लगातार जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है। इसके तहत स्कूलों, मंदिरों, मस्जिदों, गुरुद्वारों और गांवों में जाकर लोगों को बाल विवाह के दुष्परिणामों और कानून की जानकारी दी जा रही है, ताकि अभिभावक और समाज इस सामाजिक अभिशाप से बेटियों को बचा सकें।
विज्ञापन
जिला संरक्षण एवं बाल विवाह निषेध अधिकारी बबीता चौधरी ने बताया कि सरकार का उद्देश्य देश, प्रदेश और जिले को बाल विवाह मुक्त बनाना है। इसके लिए जमीनी स्तर पर जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं, ताकि लोग खुद सतर्क हों और कहीं भी बाल विवाह की जानकारी मिलने पर तुरंत शिकायत करें। उन्होंने बताया कि अब तक जिले के 200 से अधिक गांवों के स्कूलों में यह अभियान चलाया जा चुका है।
विज्ञापन
जहां से शिकायत मिलती है, वहां तुरंत होता है एक्शन
बबीता चौधरी ने बताया कि वर्ष 2025 में बाल विवाह से संबंधित कुल 15 शिकायतें प्राप्त हुईं। इनमें से 11 मामलों में लड़कियां नाबालिग पाई गईं, जबकि एक मामले में लड़की की उम्र लड़के से अधिक थी और लड़के की उम्र 18 वर्ष थी। इन सभी मामलों में शादियां रुकवा दी गईं। वहीं तीन मामलों में वर-वधु दोनों बालिग पाए गए, इसलिए कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की गई।
इस डर से उठाते हैं गलत कदम
बबीता चौधरी ने बताया कि कई अभिभावकों को यह डर सताने लगा है कि उनकी बेटी कहीं घर से भागकर शादी न कर ले या लिव-इन रिलेशनशिप में न रहने लगे। इसी भय के चलते वे समय से पहले शादी कराने का प्रयास करते हैं। हालांकि, जब ऐसे माता-पिता को कानून और इसके दुष्परिणामों के बारे में समझाया गया, तो उन्होंने अपनी गलती स्वीकार की और लिखित में दिया कि वे बेटियों की शादी बालिग होने के बाद ही करेंगे।
पंचायतों के साथ मिलकर चलेगा अभियान
उन्होंने बताया कि इस माह मंदिरों, मस्जिदों और गुरुद्वारों में जाकर विशेष जागरूकता अभियान चलाया जाएगा। फरवरी से ग्राम पंचायतों के सहयोग से गांव-गांव में अभियान तेज किया जाएगा, ताकि अधिक से अधिक लोग जागरूक होकर बाल विवाह रोकने में भागीदार बनें।
बाल विवाह को लेकर यह है कानून
अधिवक्ता सुरेश कुमार ने बताया कि बाल विवाह निषेध अधिनियम-2006 के तहत लड़के की न्यूनतम उम्र 21 वर्ष और लड़की की 18 वर्ष तय है। कानून का उल्लंघन करने पर दो साल तक की कैद और एक लाख रुपये तक जुर्माने का प्रावधान है। इसमें माता-पिता के साथ विवाह कराने वाले पंडित या मौलवी भी दोषी माने जाते हैं। बाल विवाह रोकने के लिए 1098 हेल्पलाइन और बाल विवाह निषेध अधिकारी तैनात हैं।