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दो दशक में भी सरकार को नहीं दिखा संजय का शौर्य
डबवाली (सिरसा)/ब्यूरो
Updated Mon, 30 Dec 2013 08:01 PM IST
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डबवाली अग्निकांड में अपनी जिंदगी की परवाह न करते हुए भीषण आग में कूदकर 25 मासूम बच्चाें की जिंदगी बचाने वाले संजय ग्रोवर की शहादत को सरकार भूलने लगी है।
18 साल बाद भी पूर्व प्रधानमंत्री की सिफारिश फाइलों में धूल फांक रही है। आज भी परिजनों और मित्राें को इस बात का इंतजार है कि सरकार को एक न दिन संजय की शहादत याद जरूर आएगी।
तीस वर्षीय संजय ग्रोवर 23 दिसंबर 1995 को डीएवी स्कूल का वार्षिक कार्यक्रम देखने के लिए राजीव मैरिज पैलेस में गए थे। कार्यक्रम में आग लगने के बाद वह बाहर आ गए लेकिन भीषण आग में चारों ओर से घिरे बच्चों की चीखों ने उन्हें रोक लिया।
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वह पैलेस के नजदीक रहने वाले तेजपाल पुत्र करतार सिंह के घर चले गए। घर की महिला को अपने स्कूटर की चाबी, पर्स और ड्राइविंग लाइसेंस सौंपकर बुरी तरह से जले संजय ने शरीर पर कंबल लपेटा और आग की लपटों के बीच कूद गया। एक-एक कर संजय ने 25 मासूम बच्चों को बाहर निकाला।
आग की सूचना पाकर उनके पिता प्यारे लाल ग्रोवर अपने बड़े बेटे सतभूषण ग्रोवर और मंझले बेटे प्रवीण के साथ घटना स्थल पर पहुंचे, लेकिन संजय उन्हें नहीं मिला। प्रवीण भाई को ढूंढता हुआ सरकारी अस्पताल में पहुंचा। घायलों को देखते हुए आगे बढ़ रहा था। आग से बुरी तरह से झुलसे अपने भाई संजय को वह पहचान नहीं पाया। पर संजय ने उसे पहचान लिया। प्रवीण को देखकर वह बोला कि मैं तेरा भाई, संजय हूं....।
उपचार के लिए संजय को डीएमसी लुधियाना में ले जाया गया। नौ दिन तक वह वहां उपचाराधीन रहा। जब भी पारिवारिक सदस्य संजय से हादसे के बारे में जानकारी लेना चाहते तो वह उन्हें चुप करवा देता। बस इतना कहता कि अगर मौका मिल जाता तो वह और बच्चों की जिंदगी बचा लेता...।
मरने के बाद उसकी आंखें और शरीर दान कर देना। एक जनवरी 1996 सुबह ढाई बजे उसकी मौत हो गई। उस समय संजय के बड़े बेटे पारूल की उम्र महज सवा छह साल और छोटे बेटे नवनीत की उम्र सवा साल थी। संजय का परिवार मुआवजा राशि से समाजसेवा कार्यों को आगे बढ़ाने के लिए शहीद संजय ग्रोवर चेरिटेबल सोसायटी बनाकर मुआवजा राशि को जरूरतमंदों में बांट रहा है।
संजय ग्रोवर का जीवन
संजय ग्रोवर का जन्म छह दिसंबर 1965 को डबवाली निवासी प्यारे लाल ग्रोवर के घर हुआ था। 1981 में हरियाणा के बहादुरगढ़ में हरियाणा राज्य विज्ञान प्रदर्शनी में भाग लेकर उन्होंने दूसरा स्थान प्राप्त किया। 1985 में श्री गुरुनानक कॉलेज किलियांवाली की ओर से डलहौजी में यूथ लीडरशिप ट्रेनिंग कैंप में बेस्ट कैंपर का सम्मान पाया। साल 1984-85 में गुरुनानक कॉलेज का बेस्ट एक्टर घोषित किया गया।
उन्होंने जंगी राम की हवेली, स्योंक, शरीफजादे, बुड्ढा विआहिया गया आदि नाटकों में भूमिका अदा की। पंजाब के अबोहर, जीरा, मुक्तसर में हुए यूथ फेस्टिवल और अन्य कार्यक्रमों में मंच संचालन किया। संजय की मृत्यु के बाद उसकी बहादुरी को सलाम करते हुए 1995 में मानव संसाधन विकास मंत्रालय भारत सरकार ने राष्ट्रीय युवा पुरस्कार, 1997 में रेड एंड व्हाइट कंपनी ने उन्हें बहादुरी पुरस्कार से सम्मानित किया। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने संजय ग्रोवर को शौर्य पुरस्कार से सम्मानित करने के लिए भारत सरकार को सिफारिश की थी। संजय ने 30 साल की आयु में 19 बार रक्तदान किया।
संजय ग्रोवर ने साहस का परिचय देते हुए 25 बच्चों की जिंदगी बचाई थी। अगर पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने ग्रोवर को शौर्य पुरस्कार देने की सिफारिश की थी, तो मैं मानता हूं कि यह सरकार और प्रशासन की नालायकी है जो अभी तक ग्रोवर को शौर्य पुरस्कार नहीं दिया गया है।
-विनोद बंसल, प्रवक्ता, डबवाली फायर विक्टम एसोसिएशन
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18 साल बाद भी पूर्व प्रधानमंत्री की सिफारिश फाइलों में धूल फांक रही है। आज भी परिजनों और मित्राें को इस बात का इंतजार है कि सरकार को एक न दिन संजय की शहादत याद जरूर आएगी।
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तीस वर्षीय संजय ग्रोवर 23 दिसंबर 1995 को डीएवी स्कूल का वार्षिक कार्यक्रम देखने के लिए राजीव मैरिज पैलेस में गए थे। कार्यक्रम में आग लगने के बाद वह बाहर आ गए लेकिन भीषण आग में चारों ओर से घिरे बच्चों की चीखों ने उन्हें रोक लिया।
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वह पैलेस के नजदीक रहने वाले तेजपाल पुत्र करतार सिंह के घर चले गए। घर की महिला को अपने स्कूटर की चाबी, पर्स और ड्राइविंग लाइसेंस सौंपकर बुरी तरह से जले संजय ने शरीर पर कंबल लपेटा और आग की लपटों के बीच कूद गया। एक-एक कर संजय ने 25 मासूम बच्चों को बाहर निकाला।
आग की सूचना पाकर उनके पिता प्यारे लाल ग्रोवर अपने बड़े बेटे सतभूषण ग्रोवर और मंझले बेटे प्रवीण के साथ घटना स्थल पर पहुंचे, लेकिन संजय उन्हें नहीं मिला। प्रवीण भाई को ढूंढता हुआ सरकारी अस्पताल में पहुंचा। घायलों को देखते हुए आगे बढ़ रहा था। आग से बुरी तरह से झुलसे अपने भाई संजय को वह पहचान नहीं पाया। पर संजय ने उसे पहचान लिया। प्रवीण को देखकर वह बोला कि मैं तेरा भाई, संजय हूं....।
उपचार के लिए संजय को डीएमसी लुधियाना में ले जाया गया। नौ दिन तक वह वहां उपचाराधीन रहा। जब भी पारिवारिक सदस्य संजय से हादसे के बारे में जानकारी लेना चाहते तो वह उन्हें चुप करवा देता। बस इतना कहता कि अगर मौका मिल जाता तो वह और बच्चों की जिंदगी बचा लेता...।
मरने के बाद उसकी आंखें और शरीर दान कर देना। एक जनवरी 1996 सुबह ढाई बजे उसकी मौत हो गई। उस समय संजय के बड़े बेटे पारूल की उम्र महज सवा छह साल और छोटे बेटे नवनीत की उम्र सवा साल थी। संजय का परिवार मुआवजा राशि से समाजसेवा कार्यों को आगे बढ़ाने के लिए शहीद संजय ग्रोवर चेरिटेबल सोसायटी बनाकर मुआवजा राशि को जरूरतमंदों में बांट रहा है।
संजय ग्रोवर का जीवन
संजय ग्रोवर का जन्म छह दिसंबर 1965 को डबवाली निवासी प्यारे लाल ग्रोवर के घर हुआ था। 1981 में हरियाणा के बहादुरगढ़ में हरियाणा राज्य विज्ञान प्रदर्शनी में भाग लेकर उन्होंने दूसरा स्थान प्राप्त किया। 1985 में श्री गुरुनानक कॉलेज किलियांवाली की ओर से डलहौजी में यूथ लीडरशिप ट्रेनिंग कैंप में बेस्ट कैंपर का सम्मान पाया। साल 1984-85 में गुरुनानक कॉलेज का बेस्ट एक्टर घोषित किया गया।
उन्होंने जंगी राम की हवेली, स्योंक, शरीफजादे, बुड्ढा विआहिया गया आदि नाटकों में भूमिका अदा की। पंजाब के अबोहर, जीरा, मुक्तसर में हुए यूथ फेस्टिवल और अन्य कार्यक्रमों में मंच संचालन किया। संजय की मृत्यु के बाद उसकी बहादुरी को सलाम करते हुए 1995 में मानव संसाधन विकास मंत्रालय भारत सरकार ने राष्ट्रीय युवा पुरस्कार, 1997 में रेड एंड व्हाइट कंपनी ने उन्हें बहादुरी पुरस्कार से सम्मानित किया। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने संजय ग्रोवर को शौर्य पुरस्कार से सम्मानित करने के लिए भारत सरकार को सिफारिश की थी। संजय ने 30 साल की आयु में 19 बार रक्तदान किया।
संजय ग्रोवर ने साहस का परिचय देते हुए 25 बच्चों की जिंदगी बचाई थी। अगर पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने ग्रोवर को शौर्य पुरस्कार देने की सिफारिश की थी, तो मैं मानता हूं कि यह सरकार और प्रशासन की नालायकी है जो अभी तक ग्रोवर को शौर्य पुरस्कार नहीं दिया गया है।
-विनोद बंसल, प्रवक्ता, डबवाली फायर विक्टम एसोसिएशन