Farm Laws Repeal: किसानों के संघर्ष की जीत, आंदोलन में हिसार के 6 किसानों ने दी जान की कुर्बानी
पीएम ने शुक्रवार को तीन कृषि कानून वापस लेने की घोषणा कर दी। इन कानूनों को वापस कराने की मांग को लेकर किसानों ने लगातार आंदोलन को जारी रखा। इस दौरान सैकड़ों किसानों ने अपनी जान गवां दी। आंदोलन में जान की कुर्बानी देने वालों में हिसार के किसानों का भी नाम है।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
प्रधानमंत्री ने शुक्रवार सुबह तीनों कृषि कानून वापस लेने की घोषणा की है। आंदोलन के कारण किसानों के संघर्ष की जीत हुई है। इस जीत में हरियाणा के हिसार जिले के 6 किसानों ने अपनी जान कुर्बान की है। इसमें एक किसान ने टीकरी बॉर्डर पर दो पेज का सुसाइड नोट छोड़कर आत्महत्या की थी। इसके अलावा पांच अन्य किसान अलग-अलग समय पर जान गंवाई।
शहीद हुए किसानों के परिवारों के बारे में भी सरकार को सोचना चाहिए
मेरे पति जोगेंद्र ढांडा किसान आंदोलन में दिल्ली के टीकरी बॉर्डर पर रहते थे। खेती-बाड़ी का काम संभालने के लिए कभी कभार घर आते थे। पूरी श्रद्धा व निष्ठा के साथ उन्होंने किसान आंदोलन में अपनी भूमिका निभाते हुए अपनी जान कुर्बान की। उनके चले जाने के बाद परिवार को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। उनके अलावा परिवार में और कोई कमाने वाला नहीं है। हम कानून वापसी का स्वागत करते हैं। आंदोलन में शहीद हुए किसानों के परिवारों के बारे में भी सरकार को सोचना चाहिए। - संगीता, पत्नी जोगेंद्र ढांडा
विज्ञापन
69 वर्षीय रामचंद्र खर्ब किसान आंदोलन में पहले दिन से ही सक्रिय रहा
मेरा बड़ा भाई 69 वर्षीय रामचंद्र खर्ब किसान आंदोलन में पहले दिन से ही सक्रिय रहा था। अक्सर दिल्ली के टिकरी बॉर्डर पर ही रहकर अपनी भूमिका निभा रहा था। हिसार में मुख्यमंत्री के कार्यक्रम के दिन हार्ड अटैक से उन्होंने अपनी शहादत दी थी। हमें अपने भाई पर गर्व है। हमारा परिवार तन मन धन से किसान आंदोलन के लिए हमेशा तैयार है। हम तीनों कानून वापस लेने के फैसले का स्वागत करते हैं। फैसला लेने में काफी समय लगा दिया। -रामपाल, मृतक रामचंद्र का भाई
विज्ञापन विज्ञापन
सुसाइड नोट में कानून वापस लेने की लिखी थी मांग
मेरे पिता 47 वर्षीय राजबीर ने कृषि कानूनों वापस नहीं लेने से आहत होकर टीकरी बॉर्डर पर आत्महत्या कर ली थी। उन्होंने दो पेज का एक सुसाइड नोट छोड़ा था। जिसमें मरने के बाद तीनों काले कृषि कानूनों को वापस लेने की मांग की थी। उनकी शहादत से हमारे परिवार को बहुत बड़ी क्षति हुई है। घर में और कमाने वाला कोई नहीं है। मुझे भी पढ़ा लिखा कर एक अधिकारी बनाने का मेरे पिता ने सपना देखा था। सरकार को शहीद हुए किसानों की सुध लेनी चाहिए। -पिंकी, गांव सिसाय, मृतक किसान राजबीर की बेटी
किसानों की ट्रैक्टर रैली के दौरान मौत हो गई थी
मेरे चाचा ज्ञानीराम की 6 जनवरी को बरवाला में हुई किसानों की ट्रैक्टर रैली के दौरान मौत हो गई थी। कृषि कानून रद्द करने की घोषणा किसान आंदोलन की पहली जीत है। आंदोलन में बहुत से किसान शहीद हुए हैं। इसके अलावा जिन किसानों पर मामले दर्ज हुए है उन्हें भी वापस लिया जाना चाहिए। प्रधानमंत्री का यह कदम सही मायने में स्वागत योग्य कदम है। -लीलू राम, गांव जेवरा, ज्ञानीराम का भतीजा
लांधड़ी टोल पर आंदोलन के दौरान हृदय गति रुकने से हुई थी मौत
मेरे पिता की लांधड़ी टोल पर आंदोलन के दौरान हृदय गति रुकने से मौत हुई थी। उन्होंने किसान आंदोलन के लिए गांव में सबसे चंदा शुरू किया था। सरकार की तरफ से उन्होंने कोई सुविधा नहीं मिली। कृषि कानून वापस होने पर हमें खुशी है। किसान आंदोलन की जीत हुई। सरकार को यह फैसला एक साल पहले लेना चाहिए था जिससे 700 किसानों को शहादत न देनी पड़ती। -लीलाराम, गांव कुलेरी, रसीद खान का बेटा
उप मुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला के प्रोग्राम के विरोध में हृदय गति रुकने से हो गई थी मौत
मेरे पति महेंद्र सिंह थाकन टोल पर चल रहे धरने के प्रधान थे। 7 अगस्त 2021 को मेडिकल कॉलेज अग्रोहा में उप मुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला के प्रोग्राम के विरोध में हृदय गति रुकने से उसकी मौत हो गई थी। आंदोलन में 700 से अधिक किसानों ने शदाहत दी है। किसानों के आगे सरकार को झुकना ही पड़ा। किसान एकता के कारण ही सरकार मजबूर हुई। उसे कानून वापस लेने पड़े। हमें सरकार पर विश्वास नहीं है। संसद में लिखित रूप में कानून रद्द करने व एमएसपी की गारंटी निर्धारित होने तक डटे रहेंगे। - बिमला देवी,गांव कुलेरी, मृतक महेंद्र की पत्नी