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कृषि में कुछ करने के लिए 12 साल रिसर्च किया ,पत्नी के गहने भी बेच दिए
Updated Wed, 29 Nov 2017 01:02 AM IST
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रासायनिक खादों के प्रयोग से जमीन बंजर हो गई। इससे जमीन में कृषि पैदावार कम होने लगी। कृषि में लगातार घाटा होने से परिवार चलाना भी मुश्किल हो गया। इस पर भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अपने पिता जी की राह अपनाते हुए प्राकृतिक खेती पर रिसर्च शुरू किया। उनके पास गोबर की देसी खाद पर रिसर्च के लिए पैसे नहीं थे। रिसर्च के पैसे जुटाने के लिए उन्होंने अपनी पत्नी तक के गहने बेच दिए। इस पर लोगों ने उन्हें पागल कहना शुरू कर दिया। सिरफिरा कहते हुए रिश्तेदारों ने भी मुझ से दूरियां बना लीं। इसके बाद भी रिसर्च पूरा नहीं हुई। करीब 12 साल बाद उन्होंने जीरो बजट जैविक खेती का फार्मूला दिया। यह कहना है महाराष्ट्र से पहुंचे किसान डॉ. सुभाष पालेकर का। वे मंगलवार को एचएयू (चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय) में प्राकृतिक एवं आध्यात्मिक खेती विषय पर आयोजित तीन दिवसीय कार्यशाला में भाग लेने पहुंचे थे। सरकार ने उन्हें गेम चेंजर का नाम देते हुए पदम्श्री से सम्मानित किया। एचएयू हिसार में पहुंचे डॉ. सुभाष पालेकर के साथ किसान सेल्फी लेते दिखे। कुछ किसान उनका मोबाइल नंबर ले रहे थे।
नागपुर कृषि विश्वविद्यालय से की स्नातक
1949 में महाराष्ट्र के गांव बेलोरा में जन्मे सुभाष पालेकर ने नागपुर कृषि विश्वविद्यालय से कृषि स्नातक की। खेती के लिए उन्होंने रासायनिक खाद का प्रयोग किया। जमीन बंजर हो गई तो अपने पिता जी की राह अपनाते हुए प्राकृतिक खेती पर रिसर्च शुरू किया। करीब 12 साल बाद उन्होंने जीरो बजट जैविक खेती का फार्मूला दिया।
यह फार्मूला दिया
गाय के गोबर और गोमूत्र का अलग-अलग अनुपात में, कई अन्य वस्तुओं के साथ मिश्रित करके, अलग-अलग समयावधि और समय अंतराल के प्रयोग किए। कई-कई दिनों तक लगातार 12-12 घंटे खेत में काम किया। छह साल में 154 बार फार्मूलों के बाद जीवामृत फार्मूला बनाया। इसका प्रयोग करने के बाद खेती में कोई खाद डालने की जरूरत ही नहीं है।
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40 लाख किसान अपना रहे जीरो बजट खेती
अब देश के कर्नाटक, केरल, असम, गुजरात, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, यूपी, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान के अलावा दक्षिण भारत के करीब 40 लाख से ज्यादा किसान जीरो बजट प्राकृतिक खेती कर रहे हैं।
21 पुस्तकें लिखकर किसानों तक पहुंचाया
अपने फार्मूले को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाने के लिए हिंदी, अंग्रेजी और मराठी में 21 पुस्तकें लिखी हैं। इन पुस्तकों का देश की अन्य भाषाओं में भी अनुवाद किया जा रहा है। केंद्र सरकार ने 2016 में पद्मश्री से सम्मानित किया।
सात लाख किसानों ने किया सुसाइड
सुभाष पालेकर ने कहा कि देश में अब तक 7 लाख लोगों ने सुसाइड किया है। जीरो बजट जैविक खेती करने वाले किसी किसान ने आत्महत्या नहीं की। लगातार घाटे का सौदा होने के कारण युवा वर्ग खेती से भाग रहा है। जो देश के सामने सबसे बड़ा संकट है। 2050 तक जितने खाद्यान्न की जरूरत होगी उसके लिए वैैज्ञानिकों को सीमित भूमि में दोगुना उत्पादन कराना होगा।
जैविक खेती के नाम पर लूट बंद हो
जैविक खेती के नाम पर किसी तरह के उत्पाद बेचना किसानों के साथ लूट है। किसान जैविक खेती का कोई उत्पाद न खरीदें। केवल गाय के गोबर की खाद का उपयोग करें।
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रासायनिक खादों के प्रयोग से जमीन बंजर हो गई। इससे जमीन में कृषि पैदावार कम होने लगी। कृषि में लगातार घाटा होने से परिवार चलाना भी मुश्किल हो गया। इस पर भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अपने पिता जी की राह अपनाते हुए प्राकृतिक खेती पर रिसर्च शुरू किया। उनके पास गोबर की देसी खाद पर रिसर्च के लिए पैसे नहीं थे। रिसर्च के पैसे जुटाने के लिए उन्होंने अपनी पत्नी तक के गहने बेच दिए। इस पर लोगों ने उन्हें पागल कहना शुरू कर दिया। सिरफिरा कहते हुए रिश्तेदारों ने भी मुझ से दूरियां बना लीं। इसके बाद भी रिसर्च पूरा नहीं हुई। करीब 12 साल बाद उन्होंने जीरो बजट जैविक खेती का फार्मूला दिया। यह कहना है महाराष्ट्र से पहुंचे किसान डॉ. सुभाष पालेकर का। वे मंगलवार को एचएयू (चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय) में प्राकृतिक एवं आध्यात्मिक खेती विषय पर आयोजित तीन दिवसीय कार्यशाला में भाग लेने पहुंचे थे। सरकार ने उन्हें गेम चेंजर का नाम देते हुए पदम्श्री से सम्मानित किया। एचएयू हिसार में पहुंचे डॉ. सुभाष पालेकर के साथ किसान सेल्फी लेते दिखे। कुछ किसान उनका मोबाइल नंबर ले रहे थे।
नागपुर कृषि विश्वविद्यालय से की स्नातक
1949 में महाराष्ट्र के गांव बेलोरा में जन्मे सुभाष पालेकर ने नागपुर कृषि विश्वविद्यालय से कृषि स्नातक की। खेती के लिए उन्होंने रासायनिक खाद का प्रयोग किया। जमीन बंजर हो गई तो अपने पिता जी की राह अपनाते हुए प्राकृतिक खेती पर रिसर्च शुरू किया। करीब 12 साल बाद उन्होंने जीरो बजट जैविक खेती का फार्मूला दिया।
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यह फार्मूला दिया
गाय के गोबर और गोमूत्र का अलग-अलग अनुपात में, कई अन्य वस्तुओं के साथ मिश्रित करके, अलग-अलग समयावधि और समय अंतराल के प्रयोग किए। कई-कई दिनों तक लगातार 12-12 घंटे खेत में काम किया। छह साल में 154 बार फार्मूलों के बाद जीवामृत फार्मूला बनाया। इसका प्रयोग करने के बाद खेती में कोई खाद डालने की जरूरत ही नहीं है।
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40 लाख किसान अपना रहे जीरो बजट खेती
अब देश के कर्नाटक, केरल, असम, गुजरात, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, यूपी, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान के अलावा दक्षिण भारत के करीब 40 लाख से ज्यादा किसान जीरो बजट प्राकृतिक खेती कर रहे हैं।
21 पुस्तकें लिखकर किसानों तक पहुंचाया
अपने फार्मूले को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाने के लिए हिंदी, अंग्रेजी और मराठी में 21 पुस्तकें लिखी हैं। इन पुस्तकों का देश की अन्य भाषाओं में भी अनुवाद किया जा रहा है। केंद्र सरकार ने 2016 में पद्मश्री से सम्मानित किया।
सात लाख किसानों ने किया सुसाइड
सुभाष पालेकर ने कहा कि देश में अब तक 7 लाख लोगों ने सुसाइड किया है। जीरो बजट जैविक खेती करने वाले किसी किसान ने आत्महत्या नहीं की। लगातार घाटे का सौदा होने के कारण युवा वर्ग खेती से भाग रहा है। जो देश के सामने सबसे बड़ा संकट है। 2050 तक जितने खाद्यान्न की जरूरत होगी उसके लिए वैैज्ञानिकों को सीमित भूमि में दोगुना उत्पादन कराना होगा।
जैविक खेती के नाम पर लूट बंद हो
जैविक खेती के नाम पर किसी तरह के उत्पाद बेचना किसानों के साथ लूट है। किसान जैविक खेती का कोई उत्पाद न खरीदें। केवल गाय के गोबर की खाद का उपयोग करें।