{"_id":"fc046589466662cd14de52d40e44b517","slug":"there-will-be-safe-the-jungle-of-deers-hindi-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"नहीं उजड़ेगा हिरणों का आसियाना","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
नहीं उजड़ेगा हिरणों का आसियाना
ब्यूरो/अमर उजाला फतेहाबाद
Updated Fri, 18 Dec 2015 12:09 AM IST
विज्ञापन
इसके लिए मुख्यमंत्री ने वन्य जीव विभाग को भूमि हस्तांतरित करने व किसानों को रायल्टी देने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। जिसके बाद वन्य विभाग ने कार्रवाई शुरू कर दी है। यह जानकारी पर्यावरण एवं जीव रक्षा बिश्नोई सभा द्वारा मांगी गई आरटीआई के तहत दी गई है।
जानकारी के अनुसार एनपीसीआईएल द्वारा फतेहाबाद के गांव गोरखपुर में 1503 एकड़ जमीन पर परमाणु संयंत्र लगाया जा रहा है। इसके लिए 1313 एकड़ जमीन गांव गोरखपुर व अन्य जमीन बड़ोपल व काजलहेड़ी की अधिग्रहीत की गई।
बड़ोपल की 185 एकड़ जमीन पर एनपीसीआईएल द्वारा आवासीय कालोनी बनाई जानी थी लेकिन इस जमीन पर वन्य जीव विचरते हैं। खासकर काले हिरण का यहां ठौर है।
काले हिरण और चिंकारा हिरण संरक्षित वन्य प्राणियों की श्रेणी में होने के कारण यहां पर एनपीसीआईएल ने तारबंदी कर दी थी जिस कारण 8 काले हिरण मारे गए थे।
इसके लिए पर्यावरण एवं जीव रक्षा बिश्नोई सभा ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में याचिका डालकर इस जमीन को संरक्षित घोषित करने की मांग रखी। पिछले दो सालों से एनपीसीआईएल की यहां पर कोई गतिविधि नहीं चल रही।
विज्ञापन
इसके अलावा कुरुक्षेत्र स्थित पर्यावरण अदालत में जिले के तत्कालीन उपायुक्त सहित 8 आला अधिकारियों के खिलाफ वन्य प्राणी संरक्षण अधिनियम के तहत मामला भी चल रहा है।
एनपीसीआईएल ने जमीन अधिग्रहण के लिए 56 करोड़ 46 लाख का मुआवजा दिया था। साथ में करीबन 7 करोड़ मुकदमा न करने के लिए और ट्यूबवेलों एवं भवनों का मुआवजा राशि के रूप में 83 लाख 79 हजार रुपये दिए।
इसके अलावा 2013 व 2014 में जमीन के रायल्टी के रूप में करीब 80 लाख दिए गए। जमीन पर वन्य प्राणी संरक्षित क्षेत्र की प्रक्रिया शुरू होते देख एनपीसीआईएल ने 2015 की रायल्टी राशि 41 लाख 33 हजार बनती है, ये कहकर देने से मना कर दिया कि अब इसकी जिम्मेदारी राज्य सरकार की बनती है।
अब पर्यावरण एवं जीव रक्षा बिश्नोई सभा द्वारा आरटीआई के तहत जानकारी मांगी गई तो मुख्य वन्य जीव संरक्षक हरियाणा द्वारा दी गई सूचना अनुसार मुख्यमंत्री ने 185 एकड़ जमीन वन एवं वन्यजीव विभाग के नाम हस्तांतरित करने और आगे 30 वर्षों तक किसानों को 19 करोड़ रुपये की राशि इसी विभाग द्वारा दिए जाने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। इसके अलावा वन्यजीव विभाग ने इस 185 एकड़ भूमि को भारतीय वन्यजीव कानून 1972 की धारा 36ए के अनुसार संरक्षित क्षेत्र कंजर्वेशन रिजर्व घोषित करने का प्रस्ताव सरकार को भेज दिया है।
अब काले हिरणों के लिए संरक्षित क्षेत्र कंजर्रेशन रिजर्व घोषित करने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। साथ ही किसानों को 30 सालों तक 19 करोड़ देने का निर्णय भी लिया गया है।
किसानों को 2015 के लिए रॉयल्टी 41.33 लाख दी जाएगी। मालूम हो कि एनपीसीआईएल के परमाणु संयंत्र में 700-700 मेगावाट की चार यूनिटें स्थापित होनी हैं जिसके लिए करीब साढ़े 23 हजार करोड़ लागत आएगी।
12 जनवरी 2014 को तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इसका शिलान्यास भी कर चुके हैं। मामला नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में होने पर एनपीसीआईएल के इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट को कई प्रकार एनओसी नहीं मिली है।
185 एकड़ जमीन पर कालोनी की जगह संरक्षित क्षेत्र घोषित होने के बाद यहां परमाणु संयंत्र का निर्माण कार्य शुरू होने के रास्ते खुलते दिख रहे हैं।
वन्यजीव विभाग ने उक्त बैठक का हवाला देते हुए 21 अगस्त 2015 को हरियाणा सरकार को प्रस्ताव भेजते हुए लिखा है कि इस वर्ष 2015 के 41.33 लाख वार्षिकी और आगे 30 वर्षों तक देने के लिए 19 करोड़ रुपये की राशि जारी की जाए।
विनोद कड़वासरा, महासचिव, पर्यावरण एवं जीव रक्षा बिश्नोई सभा हरियाणा
विज्ञापन
जानकारी के अनुसार एनपीसीआईएल द्वारा फतेहाबाद के गांव गोरखपुर में 1503 एकड़ जमीन पर परमाणु संयंत्र लगाया जा रहा है। इसके लिए 1313 एकड़ जमीन गांव गोरखपुर व अन्य जमीन बड़ोपल व काजलहेड़ी की अधिग्रहीत की गई।
विज्ञापन
बड़ोपल की 185 एकड़ जमीन पर एनपीसीआईएल द्वारा आवासीय कालोनी बनाई जानी थी लेकिन इस जमीन पर वन्य जीव विचरते हैं। खासकर काले हिरण का यहां ठौर है।
काले हिरण और चिंकारा हिरण संरक्षित वन्य प्राणियों की श्रेणी में होने के कारण यहां पर एनपीसीआईएल ने तारबंदी कर दी थी जिस कारण 8 काले हिरण मारे गए थे।
इसके लिए पर्यावरण एवं जीव रक्षा बिश्नोई सभा ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में याचिका डालकर इस जमीन को संरक्षित घोषित करने की मांग रखी। पिछले दो सालों से एनपीसीआईएल की यहां पर कोई गतिविधि नहीं चल रही।
विज्ञापन
इसके अलावा कुरुक्षेत्र स्थित पर्यावरण अदालत में जिले के तत्कालीन उपायुक्त सहित 8 आला अधिकारियों के खिलाफ वन्य प्राणी संरक्षण अधिनियम के तहत मामला भी चल रहा है।
एनपीसीआईएल ने जमीन अधिग्रहण के लिए 56 करोड़ 46 लाख का मुआवजा दिया था। साथ में करीबन 7 करोड़ मुकदमा न करने के लिए और ट्यूबवेलों एवं भवनों का मुआवजा राशि के रूप में 83 लाख 79 हजार रुपये दिए।
इसके अलावा 2013 व 2014 में जमीन के रायल्टी के रूप में करीब 80 लाख दिए गए। जमीन पर वन्य प्राणी संरक्षित क्षेत्र की प्रक्रिया शुरू होते देख एनपीसीआईएल ने 2015 की रायल्टी राशि 41 लाख 33 हजार बनती है, ये कहकर देने से मना कर दिया कि अब इसकी जिम्मेदारी राज्य सरकार की बनती है।
अब पर्यावरण एवं जीव रक्षा बिश्नोई सभा द्वारा आरटीआई के तहत जानकारी मांगी गई तो मुख्य वन्य जीव संरक्षक हरियाणा द्वारा दी गई सूचना अनुसार मुख्यमंत्री ने 185 एकड़ जमीन वन एवं वन्यजीव विभाग के नाम हस्तांतरित करने और आगे 30 वर्षों तक किसानों को 19 करोड़ रुपये की राशि इसी विभाग द्वारा दिए जाने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। इसके अलावा वन्यजीव विभाग ने इस 185 एकड़ भूमि को भारतीय वन्यजीव कानून 1972 की धारा 36ए के अनुसार संरक्षित क्षेत्र कंजर्वेशन रिजर्व घोषित करने का प्रस्ताव सरकार को भेज दिया है।
अब काले हिरणों के लिए संरक्षित क्षेत्र कंजर्रेशन रिजर्व घोषित करने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। साथ ही किसानों को 30 सालों तक 19 करोड़ देने का निर्णय भी लिया गया है।
किसानों को 2015 के लिए रॉयल्टी 41.33 लाख दी जाएगी। मालूम हो कि एनपीसीआईएल के परमाणु संयंत्र में 700-700 मेगावाट की चार यूनिटें स्थापित होनी हैं जिसके लिए करीब साढ़े 23 हजार करोड़ लागत आएगी।
12 जनवरी 2014 को तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इसका शिलान्यास भी कर चुके हैं। मामला नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में होने पर एनपीसीआईएल के इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट को कई प्रकार एनओसी नहीं मिली है।
185 एकड़ जमीन पर कालोनी की जगह संरक्षित क्षेत्र घोषित होने के बाद यहां परमाणु संयंत्र का निर्माण कार्य शुरू होने के रास्ते खुलते दिख रहे हैं।
वन्यजीव विभाग ने उक्त बैठक का हवाला देते हुए 21 अगस्त 2015 को हरियाणा सरकार को प्रस्ताव भेजते हुए लिखा है कि इस वर्ष 2015 के 41.33 लाख वार्षिकी और आगे 30 वर्षों तक देने के लिए 19 करोड़ रुपये की राशि जारी की जाए।
विनोद कड़वासरा, महासचिव, पर्यावरण एवं जीव रक्षा बिश्नोई सभा हरियाणा