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Charkhi Dadri News: आयोग ने बीमा क्लेम खारिज करने को माना सेवा में कोताही
Sun, 22 Feb 2026 12:43 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, चरखी दादरी
संवाद न्यूज एजेंसी, चरखी दादरी
Updated Sun, 22 Feb 2026 12:43 AM IST
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चरखी दादरी। जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने दादरी निवासी एक युवक के बीमा क्लेम को गलत तरीके से खारिज करने के एक मामले में निर्णय सुनाते हुए बीमा कंपनी को शिकायतकर्ता को उपचार का खर्च, ब्याज और मानसिक उत्पीड़न के लिए मुआवजा अदा करने के आदेश दिए हैं।
शहर की शंकर कॉलोनी निवासी अमित बंसल ने अगस्त 2020 में इफको टोकियो कंपनी से पांच लाख रुपये की स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी ली थी। सितंबर 2020 में तबीयत बिगड़ने पर उसे एक अस्पताल में भर्ती कराया गया। अस्पताल में उनके उपचार पर 82,135 रुपये खर्च हुए। जब शिकायतकर्ता ने क्लेम के लिए आवेदन किया तो बीमा कंपनी ने इसे यह कहते हुए खारिज कर दिया कि अस्पताल में भर्ती होने की बात झूठी है। कंपनी का तर्क था कि जांच के दौरान उनके परिवार ने अस्पताल में भर्ती होने से इनकार किया था।
मामले की सुनवाई के दौरान आयोग के अध्यक्ष मंजीत सिंह नरयाल ने पाया कि शिकायतकर्ता ने अस्पताल की डिस्चार्ज समरी, बिल और लैब रिपोर्ट जैसे दस्तावेज प्रस्तुत किए हैं। आयोग ने कहा कि वह समय कोविड-19 महामारी का था। महामारी के दौरान डर के कारण परिवार द्वारा अस्पताल जाने की बात छिपाना एक स्वाभाविक मानवीय प्रतिक्रिया हो सकती है। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि बीमा कंपनी अस्पताल के रिकॉर्ड को फर्जी साबित करने में नाकाम रही। केवल एक सतही जांच रिपोर्ट के आधार पर वैध मेडिकल दस्तावेजों को नजरअंदाज करना सेवा में कोताही है।
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शहर की शंकर कॉलोनी निवासी अमित बंसल ने अगस्त 2020 में इफको टोकियो कंपनी से पांच लाख रुपये की स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी ली थी। सितंबर 2020 में तबीयत बिगड़ने पर उसे एक अस्पताल में भर्ती कराया गया। अस्पताल में उनके उपचार पर 82,135 रुपये खर्च हुए। जब शिकायतकर्ता ने क्लेम के लिए आवेदन किया तो बीमा कंपनी ने इसे यह कहते हुए खारिज कर दिया कि अस्पताल में भर्ती होने की बात झूठी है। कंपनी का तर्क था कि जांच के दौरान उनके परिवार ने अस्पताल में भर्ती होने से इनकार किया था।
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मामले की सुनवाई के दौरान आयोग के अध्यक्ष मंजीत सिंह नरयाल ने पाया कि शिकायतकर्ता ने अस्पताल की डिस्चार्ज समरी, बिल और लैब रिपोर्ट जैसे दस्तावेज प्रस्तुत किए हैं। आयोग ने कहा कि वह समय कोविड-19 महामारी का था। महामारी के दौरान डर के कारण परिवार द्वारा अस्पताल जाने की बात छिपाना एक स्वाभाविक मानवीय प्रतिक्रिया हो सकती है। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि बीमा कंपनी अस्पताल के रिकॉर्ड को फर्जी साबित करने में नाकाम रही। केवल एक सतही जांच रिपोर्ट के आधार पर वैध मेडिकल दस्तावेजों को नजरअंदाज करना सेवा में कोताही है।
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