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Charkhi Dadri News: बच्चों के स्वास्थ्य पर खतरा, 364 स्कूलों के पेयजल में फ्लोराइड अधिक
Mon, 24 Aug 2026 01:41 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, चरखी दादरी
संवाद न्यूज एजेंसी, चरखी दादरी
Updated Mon, 24 Aug 2026 01:41 AM IST
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राजकीय स्कूल के विद्यार्थी।
चरखी दादरी। जिले के 168 गांवों में स्थित 364 राजकीय स्कूलों के विद्यार्थियों को मिलने वाले पेयजल की गुणवत्ता जांच की गई है। इस जांच में पानी में फ्लोराइड की मात्रा निर्धारित स्तर से अधिक पाई गई है। सरकारी पेयजल आपूर्ति और भूमिगत जल दोनों के सैंपल लिए गए थे।
जांच के दौरान कुछ गांवों के स्कूलों में क्लोरिन की मात्रा भी अधिक मिली है। वहीं, कई जगहों पर पानी सोडिक पाए जाने की जानकारी सामने आई है। जिले में पिछले एक दशक से पर्याप्त बारिश नहीं हुई है।
इसके कारण भूमिगत जलस्तर में लगातार गिरावट आ रही है। पानी की गुणवत्ता भी बुरी तरह प्रभावित हो रही है। बारिश कम होने से जमीन के अंदर पानी का प्राकृतिक रिचार्ज पर्याप्त मात्रा में नहीं हो पा रहा है।
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इससे भूमिगत पानी में लवणीय तत्वों की मात्रा बढ़ने लगी है। ग्रामीण क्षेत्रों में जहां पेयजल आपूर्ति नियमित नहीं है, वहां कई स्कूलों में भूमिगत पानी का इस्तेमाल हो रहा है। ऐसे में पानी की गुणवत्ता विद्यार्थियों के स्वास्थ्य के लिए एक महत्वपूर्ण विषय बन गई है।
बच्चों के स्वास्थ्य पर दूषित पानी का असर : स्कूलों में छह से 18 वर्ष आयु वर्ग के विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करते हैं। यह उम्र बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। यदि उन्हें लंबे समय तक निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं होने वाला पेयजल मिलता है तो उनके स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ना स्वाभाविक है।
फ्लोराइड की अधिक मात्रा के साथ-साथ पानी में क्लोरिन और सोडिक तत्वों की अधिकता भी चिंता का विषय बनी हुई है। स्वास्थ्य विभाग ने स्कूलों के पेयजल स्रोतों की गुणवत्ता जांचने के लिए सैंपल लिए थे। चिकित्सक बताते हैं कि पानी में फ्लोराइड की मात्रा 1.5 मिलीग्राम प्रति लीटर पीपीएम से अधिक होने पर यह नुकसानदायक होता है। इससे दांतों पर सफेद, पीले या भूरे धब्बे पड़ सकते हैं, जिसे डेंटल फ्लोरोसिस कहते हैं। लंबे समय तक बहुत अधिक फ्लोराइड लेने से हड्डियों और जोड़ों पर भी असर पड़ सकता है।
भूजल संतुलन और वैकल्पिक व्यवस्था की आवश्यकता : बारिश के पानी से भूमिगत जल का रिचार्ज होने पर उसमें घुले कई लवण और खनिज संतुलित रहते हैं। लगातार कम बारिश होने और भूजल का अत्यधिक दोहन किए जाने से यह प्राकृतिक संतुलन बिगड़ रहा है। जिले में खेती और पेयजल दोनों के लिए भूमिगत पानी पर निर्भरता अधिक है।
इस कारण आने वाले समय में जल गुणवत्ता की समस्या और गंभीर हो सकती है। स्वास्थ्य विभाग के सैंपलों में फ्लोराइड की अधिक मात्रा मिलने के बाद संबंधित क्षेत्रों में पेयजल की गुणवत्ता पर निगरानी बढ़ाने की जरूरत महसूस की जा रही है।
स्कूलों में सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने के लिए खराब गुणवत्ता वाले स्रोतों की पहचान करना आवश्यक है। इसके बाद वैकल्पिक व्यवस्था भी जरूरी है।
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जांच के दौरान कुछ गांवों के स्कूलों में क्लोरिन की मात्रा भी अधिक मिली है। वहीं, कई जगहों पर पानी सोडिक पाए जाने की जानकारी सामने आई है। जिले में पिछले एक दशक से पर्याप्त बारिश नहीं हुई है।
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इसके कारण भूमिगत जलस्तर में लगातार गिरावट आ रही है। पानी की गुणवत्ता भी बुरी तरह प्रभावित हो रही है। बारिश कम होने से जमीन के अंदर पानी का प्राकृतिक रिचार्ज पर्याप्त मात्रा में नहीं हो पा रहा है।
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इससे भूमिगत पानी में लवणीय तत्वों की मात्रा बढ़ने लगी है। ग्रामीण क्षेत्रों में जहां पेयजल आपूर्ति नियमित नहीं है, वहां कई स्कूलों में भूमिगत पानी का इस्तेमाल हो रहा है। ऐसे में पानी की गुणवत्ता विद्यार्थियों के स्वास्थ्य के लिए एक महत्वपूर्ण विषय बन गई है।
बच्चों के स्वास्थ्य पर दूषित पानी का असर : स्कूलों में छह से 18 वर्ष आयु वर्ग के विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करते हैं। यह उम्र बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। यदि उन्हें लंबे समय तक निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं होने वाला पेयजल मिलता है तो उनके स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ना स्वाभाविक है।
फ्लोराइड की अधिक मात्रा के साथ-साथ पानी में क्लोरिन और सोडिक तत्वों की अधिकता भी चिंता का विषय बनी हुई है। स्वास्थ्य विभाग ने स्कूलों के पेयजल स्रोतों की गुणवत्ता जांचने के लिए सैंपल लिए थे। चिकित्सक बताते हैं कि पानी में फ्लोराइड की मात्रा 1.5 मिलीग्राम प्रति लीटर पीपीएम से अधिक होने पर यह नुकसानदायक होता है। इससे दांतों पर सफेद, पीले या भूरे धब्बे पड़ सकते हैं, जिसे डेंटल फ्लोरोसिस कहते हैं। लंबे समय तक बहुत अधिक फ्लोराइड लेने से हड्डियों और जोड़ों पर भी असर पड़ सकता है।
भूजल संतुलन और वैकल्पिक व्यवस्था की आवश्यकता : बारिश के पानी से भूमिगत जल का रिचार्ज होने पर उसमें घुले कई लवण और खनिज संतुलित रहते हैं। लगातार कम बारिश होने और भूजल का अत्यधिक दोहन किए जाने से यह प्राकृतिक संतुलन बिगड़ रहा है। जिले में खेती और पेयजल दोनों के लिए भूमिगत पानी पर निर्भरता अधिक है।
इस कारण आने वाले समय में जल गुणवत्ता की समस्या और गंभीर हो सकती है। स्वास्थ्य विभाग के सैंपलों में फ्लोराइड की अधिक मात्रा मिलने के बाद संबंधित क्षेत्रों में पेयजल की गुणवत्ता पर निगरानी बढ़ाने की जरूरत महसूस की जा रही है।
स्कूलों में सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने के लिए खराब गुणवत्ता वाले स्रोतों की पहचान करना आवश्यक है। इसके बाद वैकल्पिक व्यवस्था भी जरूरी है।