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Charkhi Dadri News: रासायनिक खादों के अंधाधुंध इस्तेमाल के कारण घटी चने की पैदावार
Tue, 30 Jan 2024 11:18 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, चरखी दादरी
संवाद न्यूज एजेंसी, चरखी दादरी
Updated Tue, 30 Jan 2024 11:18 PM IST
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चरखी दादरी। रासायनिक खादों के अंधाधुंध इस्तेमाल की वजह से जिले में चने की खेती खत्म होने के कगार पर पहुंच गई है। जमीन में चने की पैदावार ही नहीं हो रही है। मौजूदा रबी सीजन में कुल कृषि योग्य क्षेत्र 1.21 लाख हेक्टेयर में से मात्र 150 हेक्टेयर में ही चने की बिजाई कर रखी है। चने के लिए नाइट्रोजन उपयुक्त नहीं है जबकि खेतों में किसान इसका अंधाधुंध इस्तेमाल कर रहे हैं। दूसरी ओर आजकल पूरे कृषि क्षेत्र में सिंचाई के संसाधन हो गए हैं। चना को पानी की जरूरत नाममात्र की ही होती है।
जिले की बात करें तो पिछले डेढ़ दशक से चने की खेती कम होती जा रही है। पहले जिले में बरानी एरिया ज्यादा था। बरानी एरिया केवल बारिश पर ही निर्भर होता था। उस समय किसान के पास सिंचाई के संसाधन नहीं होते थे। अब तो बरानी एरिया में भी किसानों ने सिंचाई का प्रबंध कर रखा है। बरानी एरिया में ही चना की पैदावार ज्यादा मात्रा में होती थी। किसान उस समय देसी खाद का भी ज्यादा मात्रा में इस्तेमाल करते थे। उसके बाद तो किसानों ने खेतों में रासायनिक खादों का हद से ज्यादा इस्तेमाल करना शुरू कर दिया।
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि जिस जमीन में रासायनिक खाद का इस्तेमाल हो जाता है वहां चना की पैदावार नहीं हो पाती। चना रासायनिक खाद को नहीं मानता है। वैसे भी चना ऐसा अनाज है जिसके पौधे को उगते ही खाने के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा है। जब यह उगता है तो कच्चे साग के रूप में इसका इस्तेमाल होता है। जब फल यानी टाट लगती है तो इसे सब्जी व चटनी के रूप में खाने में इस्तेमाल किया जाता है। जब टाट पक कर तैयार हो जाती है तो इनको भूनकर खाया जाता है जिन्हें हरियाणवी में होला कहा जाता है। जब मशीन से कटाई व कढ़ाई कर दी जाती है तो चना को आटा व बेसन के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। बेसन से अनेक प्रकार की मिठाइयां बनती हैं। चना वैसे भी मोटा अनाज की श्रेणी में शामिल है। यह शरीर में ग्लूकोज की मात्रा को कम करता है इसमें ग्लाइसेमिक इंडेक्स कम होता है जो मधुमेह रोगियों के लिए रामबाण का काम करता है।
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रासायिक खादों के इस्तेमाल की वजह से चना की पैदावार संभव नहीं है। चना बरानी एरिया में होता है जबकि आजकल तो जमीन की सिंचाई का प्रबंध किसान ने कर रखा है। चना शरीर के लिए बेहद गुणकारी एवं पौष्टिक होता है।
डॉ. चंद्रभान जाखड़, कृषि विशेषज्ञ
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जिले की बात करें तो पिछले डेढ़ दशक से चने की खेती कम होती जा रही है। पहले जिले में बरानी एरिया ज्यादा था। बरानी एरिया केवल बारिश पर ही निर्भर होता था। उस समय किसान के पास सिंचाई के संसाधन नहीं होते थे। अब तो बरानी एरिया में भी किसानों ने सिंचाई का प्रबंध कर रखा है। बरानी एरिया में ही चना की पैदावार ज्यादा मात्रा में होती थी। किसान उस समय देसी खाद का भी ज्यादा मात्रा में इस्तेमाल करते थे। उसके बाद तो किसानों ने खेतों में रासायनिक खादों का हद से ज्यादा इस्तेमाल करना शुरू कर दिया।
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कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि जिस जमीन में रासायनिक खाद का इस्तेमाल हो जाता है वहां चना की पैदावार नहीं हो पाती। चना रासायनिक खाद को नहीं मानता है। वैसे भी चना ऐसा अनाज है जिसके पौधे को उगते ही खाने के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा है। जब यह उगता है तो कच्चे साग के रूप में इसका इस्तेमाल होता है। जब फल यानी टाट लगती है तो इसे सब्जी व चटनी के रूप में खाने में इस्तेमाल किया जाता है। जब टाट पक कर तैयार हो जाती है तो इनको भूनकर खाया जाता है जिन्हें हरियाणवी में होला कहा जाता है। जब मशीन से कटाई व कढ़ाई कर दी जाती है तो चना को आटा व बेसन के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। बेसन से अनेक प्रकार की मिठाइयां बनती हैं। चना वैसे भी मोटा अनाज की श्रेणी में शामिल है। यह शरीर में ग्लूकोज की मात्रा को कम करता है इसमें ग्लाइसेमिक इंडेक्स कम होता है जो मधुमेह रोगियों के लिए रामबाण का काम करता है।
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रासायिक खादों के इस्तेमाल की वजह से चना की पैदावार संभव नहीं है। चना बरानी एरिया में होता है जबकि आजकल तो जमीन की सिंचाई का प्रबंध किसान ने कर रखा है। चना शरीर के लिए बेहद गुणकारी एवं पौष्टिक होता है।
डॉ. चंद्रभान जाखड़, कृषि विशेषज्ञ