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दादरी मंडी में किसानों ने बेची पांच हजार क्विंटल सरसों
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दादरी मंडी में सरसों की झराई करते श्रमिक।
- फोटो : CharkhiDadri
फसल खरीद सीजन के तीसरे दिन भी जिले में सरसों की सरकारी खरीद नहीं पाई। दादरी मंडी में 152 गेटपास कटे और किसानों ने करीब पांच हजार क्विंटल सरसों बेची। शनिवार को भी जिले में दादरी मंडी में ही सरसों की प्राइवेट खरीद हुई और लगातार तीसरे दिन खुली बोली में सरसों का भाव पांच हजार रुपये प्रति क्विंटल पहुंचा। आढ़तियों और ऑयल मिल संचालकों को सरसों बेचने वाले किसानों का कहना है कि भुगतान उन्हें हाथोंहाथ मिल रहा है है और सरकारी समर्थन मूल्य से अधिक है। ऐसे में खुले बाजार में सरसों बेचने में उन्हें फायदा ही है।
शनिवार को दादरी मंडी में गेहूं की सरकारी खरीद नहीं हुई। रविवार को भी गेहूं खरीद बंद रहेगी। वहीं, सरसों की सरकारी खरीद जिले में तीसरे दिन भी शुरू नहीं हो पाई और दादरी मंडी में केवल प्राइवेट तौर पर ही खरीद हुई। सरकारी खरीद के इंतजामात करने के लिए अधिकारी गंभीर नजर नहीं आ रहे। अधिकारियों का तर्क है कि प्राइवेट खरीद में किसानों को सरकारी से अधिक दाम मिल रहे हैं, ऐसे में किसान सरकारी रेट पर सरसों बेचने के लिए तैयार नहीं हैं।
शनिवार को दादरी मंडी में 150 से अधिक किसान पहुंचे। इन किसानों ने लैब टेस्ट रिपोर्ट के आधार पर प्राइवेट तौर पर सरसों बेची। किसानों का कहना है कि प्राइवेट तौर पर सरसों बेचना बेहद सुविधजनक है और इसमें सरकारी प्रक्रिया जितना जटिलता भी नहीं है। आढ़तियों को सरसों बेचने में दाम भी अच्छे मिल रहे हैं। इसके चलते किसान कम रेट पर सरकार को सरसों बेचने के लिए तैयार नहीं हैं।
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शनिवार को दादरी मंडी में गेहूं की सरकारी खरीद नहीं हुई। रविवार को भी गेहूं खरीद बंद रहेगी। वहीं, सरसों की सरकारी खरीद जिले में तीसरे दिन भी शुरू नहीं हो पाई और दादरी मंडी में केवल प्राइवेट तौर पर ही खरीद हुई। सरकारी खरीद के इंतजामात करने के लिए अधिकारी गंभीर नजर नहीं आ रहे। अधिकारियों का तर्क है कि प्राइवेट खरीद में किसानों को सरकारी से अधिक दाम मिल रहे हैं, ऐसे में किसान सरकारी रेट पर सरसों बेचने के लिए तैयार नहीं हैं।
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शनिवार को दादरी मंडी में 150 से अधिक किसान पहुंचे। इन किसानों ने लैब टेस्ट रिपोर्ट के आधार पर प्राइवेट तौर पर सरसों बेची। किसानों का कहना है कि प्राइवेट तौर पर सरसों बेचना बेहद सुविधजनक है और इसमें सरकारी प्रक्रिया जितना जटिलता भी नहीं है। आढ़तियों को सरसों बेचने में दाम भी अच्छे मिल रहे हैं। इसके चलते किसान कम रेट पर सरकार को सरसों बेचने के लिए तैयार नहीं हैं।
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