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Chandigarh-Haryana News: नशीले पदार्थों के मामले में की गई रोकथामात्मक हिरासत रद्द

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बिना किसी एफआईआर के हिरासत में रखने को हाईकोर्ट ने माना अनुचित
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संबंधित अधिकारियों से हर्जाने के लिए अदालत में दावे की याची को छूट


चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने अहम फैसले में राज्य के गृह विभाग की ओर से जारी रोकथामात्मक हिरासत आदेश को रद्द कर दिया है। जस्टिस सुवीर सहगल की खंडपीठ ने कहा कि जब तक एनडीपीएस कानून के तहत किसी कड़े अपराध या बड़े पैमाने पर नशे की तस्करी का स्पष्ट मामला न हो तब तक बिना मुकदमे के हिरासत उचित नहीं ठहराई जा सकती। अदालत ने अंत में राज्य सरकार के आदेश को रद्द करते हुए याचिकाकर्ता को यह स्वतंत्रता दी कि वह संबंधित अधिकारियों के खिलाफ हर्जाने के लिए सिविल अदालत में दावा दायर कर सकता है।


कोर्ट ने यह आदेश करनाल निवासी राहुल उर्फ राजू की याचिका पर सुनाया जो एक किराना दुकान चलाता है। उसके खिलाफ पिछले चार सालों में छह मामले दर्ज थे जिनमें आरोप गैर व्यावसायिक मात्रा में गांजा रखने से जुड़े थे। सभी मामलों में उसे जमानत मिल चुकी थी। इसके बावजूद राज्य के गृह विभाग ने पांच मई और 29 जुलाई को नशीली दवाओं व पदार्थों की अवैध तस्करी की रोकथाम अधिनियम, 1988 के तहत छह माह की रोकथामात्मक हिरासत का आदेश जारी किया था।
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राजू ने 29 सितंबर को हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर हिरासत आदेश को चुनौती दी और हिरासत अवधि के लिए प्रति माह एक लाख रुपये मुआवजे की मांग की थी। हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि अधिकारियों ने यह मानकर आदेश जारी किया कि आरोपी से हेरोइन बरामद हुई है जबकि रिकार्ड में ऐसा कोई मामला दर्ज नहीं है। अदालत ने कहा कि रिकार्ड में उपलब्ध सामग्री याचिकाकर्ता के पूर्व आचरण से संबंधित नहीं है और इस पर रोकथामात्मक हिरासत का आधार नहीं बनाया जा सकता। पुलिस की सिफारिशों को गृह विभाग ने यांत्रिक रूप से अपनाया है।
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राज्य के वकील ने दलील दी कि याचिकाकर्ता नशे का आदी अपराधी है, लेकिन यह भी स्वीकार किया कि उसे हेरोइन तस्कर बताना गलती थी। कोर्ट ने कहा कि हिरासत आदेश पारित करते समय पुलिस ने उच्चाधिकारियों को यह नहीं बताया कि अभियोजन द्वारा दाखिल की गई जमानत रद्द करने की अर्जी पहले ही अदालत से खारिज हो चुकी है।
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