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Chandigarh-Haryana News: मौखिक और बिना विस्तृत कारण वाला आदेश, हिसार के आयुक्त को फटकार
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-18 नवंबर तक प्रदेश के मुख्य सचिव को भी सौंपना होगा जवाब
-अस्पष्ट आदेश जारी करने की प्रवृत्ति पर हाईकोर्ट ने जताई चिंता
अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। अपीलीय अधिकारियों की ओर से बिना कारण दर्ज किए मौखिक या अस्पष्ट आदेश पारित करने की बढ़ती प्रवृत्ति पर पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने चिंता जताई है। कोर्ट ने कहा कि इस प्रकार के आदेश जारी करना न्यायिक प्रक्रिया की भावना के विपरीत है। हाईकोर्ट ने हरियाणा सरकार के मुख्य सचिव को भी निर्देश दिया कि वे इस विषय पर राज्य का पक्ष बताते हुए 18 नवंबर तक या उससे पहले जवाब दाखिल करें।
जस्टिस जसगुरप्रीत सिंह पुरी की एकल पीठ के समक्ष हिसार डिवीजन के आयुक्त द्वारा पारित आदेश को चुनौती देने वाली याचिका सुनवाई के लिए पहुंची थी। याचिकाकर्ता का आरोप था कि आयुक्त ने अपील को खारिज करते हुए न तो कोई कारण बताया और न ही किसी साक्ष्य का उल्लेख किया जबकि आदेश में यह दावा किया गया था कि उन्होंने रिकाॅर्ड और तथ्यों की पूरी तरह जांच की है।
कोर्ट ने पाया कि अपील खारिज करने के आदेश में किसी भी तरह का तर्क या कारण दर्ज नहीं किया गया है। इस पर हाईकोर्ट ने हिसार के आयुक्त को निर्देश दिया कि वे एक व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करें जिसमें स्पष्ट करें कि क्या वास्तव में उन्होंने विवादित मामले का पूरा अध्ययन और परीक्षण किया था जैसा आदेश में कहा गया है। जस्टिस पुरी ने कहा कि इस तरह के गैर-वाक्यात्मक और अस्पष्ट आदेश अब आम होते जा रहे हैं जो प्रशासनिक निर्णयों की पारदर्शिता और वैधानिक जवाबदेही पर सवाल उठाते हैं। कोर्ट ने सुझाव दिया कि आगे ऐसी स्थिति से बचने के लिए अपीलीय और वैधानिक प्राधिकारियों को कानूनी रूप से टिकाऊ और तर्कसंगत आदेश पारित करने के लिए प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। इस सिलसिले में अदालत ने संकेत दिया कि वह किसी कानूनी विशेषज्ञ या प्राधिकारी की नियुक्ति पर विचार कर सकती है, जो अधिकारियों को इस विषय पर व्याख्यान और प्रशिक्षण प्रदान करे। कोर्ट ने राज्य के वकील से पूछा कि क्या सरकार ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रम के लिए सहमत है। इस पर सरकारी पक्ष ने कहा कि वह इस संबंध में अगली सुनवाई पर अपना रुख स्पष्ट करेगा।
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-अस्पष्ट आदेश जारी करने की प्रवृत्ति पर हाईकोर्ट ने जताई चिंता
अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। अपीलीय अधिकारियों की ओर से बिना कारण दर्ज किए मौखिक या अस्पष्ट आदेश पारित करने की बढ़ती प्रवृत्ति पर पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने चिंता जताई है। कोर्ट ने कहा कि इस प्रकार के आदेश जारी करना न्यायिक प्रक्रिया की भावना के विपरीत है। हाईकोर्ट ने हरियाणा सरकार के मुख्य सचिव को भी निर्देश दिया कि वे इस विषय पर राज्य का पक्ष बताते हुए 18 नवंबर तक या उससे पहले जवाब दाखिल करें।
जस्टिस जसगुरप्रीत सिंह पुरी की एकल पीठ के समक्ष हिसार डिवीजन के आयुक्त द्वारा पारित आदेश को चुनौती देने वाली याचिका सुनवाई के लिए पहुंची थी। याचिकाकर्ता का आरोप था कि आयुक्त ने अपील को खारिज करते हुए न तो कोई कारण बताया और न ही किसी साक्ष्य का उल्लेख किया जबकि आदेश में यह दावा किया गया था कि उन्होंने रिकाॅर्ड और तथ्यों की पूरी तरह जांच की है।
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कोर्ट ने पाया कि अपील खारिज करने के आदेश में किसी भी तरह का तर्क या कारण दर्ज नहीं किया गया है। इस पर हाईकोर्ट ने हिसार के आयुक्त को निर्देश दिया कि वे एक व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करें जिसमें स्पष्ट करें कि क्या वास्तव में उन्होंने विवादित मामले का पूरा अध्ययन और परीक्षण किया था जैसा आदेश में कहा गया है। जस्टिस पुरी ने कहा कि इस तरह के गैर-वाक्यात्मक और अस्पष्ट आदेश अब आम होते जा रहे हैं जो प्रशासनिक निर्णयों की पारदर्शिता और वैधानिक जवाबदेही पर सवाल उठाते हैं। कोर्ट ने सुझाव दिया कि आगे ऐसी स्थिति से बचने के लिए अपीलीय और वैधानिक प्राधिकारियों को कानूनी रूप से टिकाऊ और तर्कसंगत आदेश पारित करने के लिए प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। इस सिलसिले में अदालत ने संकेत दिया कि वह किसी कानूनी विशेषज्ञ या प्राधिकारी की नियुक्ति पर विचार कर सकती है, जो अधिकारियों को इस विषय पर व्याख्यान और प्रशिक्षण प्रदान करे। कोर्ट ने राज्य के वकील से पूछा कि क्या सरकार ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रम के लिए सहमत है। इस पर सरकारी पक्ष ने कहा कि वह इस संबंध में अगली सुनवाई पर अपना रुख स्पष्ट करेगा।
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