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Chandigarh-Haryana News: पूर्व सैनिकों के अधिकारों के प्रति केंद्र की असंवेदनशीलता पर हाईकोर्ट नाराज
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- केंद्र सरकार की ओर से दाखिल की गई याचिका को हाईकोर्ट ने किया खारिज
अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने पूर्व सैनिकों को विकलांगता पेंशन देने के मामले में केंद्र सरकार के रवैये की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट के अंतिम निर्णयों का पालन न करने के कारण सशस्त्र बल न्यायाधिकरण पर अनावश्यक मुकदमों का बोझ बढ़ रहा है।
जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा और न्यायमूर्ति एच.एस. ग्रेवाल की खंडपीठ ने कहा कि हम रोज देख रहे हैं कि पूर्व सैनिक अपने अधिकारों के लिए का रुख कर रहे हैं, जबकि उनके मामले पहले ही सुप्रीम कोर्ट द्वारा अंतिम रूप से निपटाए जा चुके हैं। केंद्र सरकार के असंवेदनशील रवैये और सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का पालन न करने के कारण सशस्त्र बल न्यायाधिकरण और इस अदालत पर अनावश्यक मुकदमों का बोझ डाला जा रहा है। हम भारत सरकार द्वारा अपने ही पूर्व सैनिकों के प्रति अपनाए गए रवैये की निंदा करते हैं।
यह टिप्पणी उन याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान की गई, जो केंद्र सरकार ने शस्त्र बल न्यायाधिकरण के उस आदेश को चुनौती देते हुए दायर की थीं, जिसमें पूर्व सैनिकों को विकलांगता पेंशन दिए जाने के निर्देश दिए गए थे।
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बेंच ने यह भी बताया कि संबंधित पूर्व सैनिक की 30 प्रतिशत विकलांगता के रूप में पुनर्मूल्यांकन किया गया था, जबकि राम अवतार मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के अनुसार इस प्रतिशत को 50 किया जाना था, जिसे केंद्र सरकार ने नहीं किया। इसी वजह से पूर्व सैनिकों ने शस्त्र बल न्यायाधिकरण का दरवाजा खटखटाया।
केंद्र सरकार के वकील ने सुप्रीम कोर्ट के एक अंतरिम आदेश का हवाला दिया जिसमें कहा गया था कि तीन साल से अधिक पुराने बकाया भुगतान पर रोक लगाई गई है। लेकिन हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि महज अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल की सहमति को सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिया गया कानून नहीं माना जा सकता। अंत में, अदालत ने कहा कि कानूनों की उदार व्याख्या की जानी चाहिए और केवल तीन वर्षों तक का दावा सीमित करना न्याय का मज़ाक होगा।
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अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने पूर्व सैनिकों को विकलांगता पेंशन देने के मामले में केंद्र सरकार के रवैये की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट के अंतिम निर्णयों का पालन न करने के कारण सशस्त्र बल न्यायाधिकरण पर अनावश्यक मुकदमों का बोझ बढ़ रहा है।
जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा और न्यायमूर्ति एच.एस. ग्रेवाल की खंडपीठ ने कहा कि हम रोज देख रहे हैं कि पूर्व सैनिक अपने अधिकारों के लिए का रुख कर रहे हैं, जबकि उनके मामले पहले ही सुप्रीम कोर्ट द्वारा अंतिम रूप से निपटाए जा चुके हैं। केंद्र सरकार के असंवेदनशील रवैये और सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का पालन न करने के कारण सशस्त्र बल न्यायाधिकरण और इस अदालत पर अनावश्यक मुकदमों का बोझ डाला जा रहा है। हम भारत सरकार द्वारा अपने ही पूर्व सैनिकों के प्रति अपनाए गए रवैये की निंदा करते हैं।
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यह टिप्पणी उन याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान की गई, जो केंद्र सरकार ने शस्त्र बल न्यायाधिकरण के उस आदेश को चुनौती देते हुए दायर की थीं, जिसमें पूर्व सैनिकों को विकलांगता पेंशन दिए जाने के निर्देश दिए गए थे।
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बेंच ने यह भी बताया कि संबंधित पूर्व सैनिक की 30 प्रतिशत विकलांगता के रूप में पुनर्मूल्यांकन किया गया था, जबकि राम अवतार मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के अनुसार इस प्रतिशत को 50 किया जाना था, जिसे केंद्र सरकार ने नहीं किया। इसी वजह से पूर्व सैनिकों ने शस्त्र बल न्यायाधिकरण का दरवाजा खटखटाया।
केंद्र सरकार के वकील ने सुप्रीम कोर्ट के एक अंतरिम आदेश का हवाला दिया जिसमें कहा गया था कि तीन साल से अधिक पुराने बकाया भुगतान पर रोक लगाई गई है। लेकिन हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि महज अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल की सहमति को सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिया गया कानून नहीं माना जा सकता। अंत में, अदालत ने कहा कि कानूनों की उदार व्याख्या की जानी चाहिए और केवल तीन वर्षों तक का दावा सीमित करना न्याय का मज़ाक होगा।