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केंद्र का संचार साथी ऐप जासूसी का नया हथियार : अनुराग ढांडा
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फोटो -
अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी अनुराग ढांडा ने केंद्र सरकार के संचार साथी ऐप और विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) सिस्टम पर कहा कि मोदी सरकार तकनीक के नाम पर देशभर में निगरानी तंत्र खड़ा कर रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार की नीयत साफ नहीं है। नागरिकों की निजी स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक ढांचे को कमजोर करने की सुनियोजित कोशिश चल रही है।
ढांडा ने कहा कि मंत्री कह रहे हैं ऐप जरूरी नहीं चाहें तो डिलीट कर दो। जबकि सरकारी नोटिफिकेशन में लिखा है कि ऐप हट ही नहीं सकता। आखिर सच क्या है? सरकार खुद ही अपने बयान बदल रही है क्योंकि नीयत में खोट है। उन्होंने इसे नागरिकों के डाटा और निजी जीवन पर सीधा हमला बताया है। उन्होंने कहा कि जनता अब समझ रही है कि बार-बार ऐप और सिस्टम के नाम पर सरकार जासूसी क्यों बढ़ा रही है। यह लोकतंत्र को नियंत्रित करने और असहमति की आवाजें दबाने की रणनीति है।
एसआईआर सिस्टम पर प्रतिक्रिया देते हुए ढांडा ने कहा कि देश में बीएलओ कर्मियों पर पड़ रहे दबाव, मानसिक तनाव और आत्महत्या के मामलों ने चुनाव व्यवस्था की असलियत उजागर कर दी है। अगर चुनाव कराने वाले कर्मचारी ही आतंक और दबाव में होंगे तो प्रक्रिया निष्पक्ष कैसे रहेगी? यह पूरा सिस्टम चुनावी भरोसे पर हमला है।
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अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी अनुराग ढांडा ने केंद्र सरकार के संचार साथी ऐप और विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) सिस्टम पर कहा कि मोदी सरकार तकनीक के नाम पर देशभर में निगरानी तंत्र खड़ा कर रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार की नीयत साफ नहीं है। नागरिकों की निजी स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक ढांचे को कमजोर करने की सुनियोजित कोशिश चल रही है।
ढांडा ने कहा कि मंत्री कह रहे हैं ऐप जरूरी नहीं चाहें तो डिलीट कर दो। जबकि सरकारी नोटिफिकेशन में लिखा है कि ऐप हट ही नहीं सकता। आखिर सच क्या है? सरकार खुद ही अपने बयान बदल रही है क्योंकि नीयत में खोट है। उन्होंने इसे नागरिकों के डाटा और निजी जीवन पर सीधा हमला बताया है। उन्होंने कहा कि जनता अब समझ रही है कि बार-बार ऐप और सिस्टम के नाम पर सरकार जासूसी क्यों बढ़ा रही है। यह लोकतंत्र को नियंत्रित करने और असहमति की आवाजें दबाने की रणनीति है।
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एसआईआर सिस्टम पर प्रतिक्रिया देते हुए ढांडा ने कहा कि देश में बीएलओ कर्मियों पर पड़ रहे दबाव, मानसिक तनाव और आत्महत्या के मामलों ने चुनाव व्यवस्था की असलियत उजागर कर दी है। अगर चुनाव कराने वाले कर्मचारी ही आतंक और दबाव में होंगे तो प्रक्रिया निष्पक्ष कैसे रहेगी? यह पूरा सिस्टम चुनावी भरोसे पर हमला है।
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