{"_id":"682e361e7f38289968027d22","slug":"appropriate-authority-did-not-give-complaint-high-court-cancels-conviction-in-pndt-case-chandigarh-haryana-news-c-16-1-pkl1041-715681-2025-05-22","type":"story","status":"publish","title_hn":"Chandigarh-Haryana News: उचित प्राधिकारी ने शिकायत नहीं दी, पीएनडीटी मामले में हाईकोर्ट ने रद्द की दोषसिद्धि","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Chandigarh-Haryana News: उचित प्राधिकारी ने शिकायत नहीं दी, पीएनडीटी मामले में हाईकोर्ट ने रद्द की दोषसिद्धि
विज्ञापन
कोर्ट ने पीएनडीटी एक्ट की धारा 17 की विस्तृत विवेचना की
हिसार से जुड़ा हुआ है मामला, 2008 में डाॅक्टर को अदालत ने माना था दोषी
चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने गर्भधारण पूर्व एवं प्रसव पूर्व निदान तकनीक (लिंग चयन निषेध) अधिनियम, 1994 (पीसी एवं पीएनडीटी अधिनियम) के तहत वर्ष 2008 में पारित दोषसिद्धि आदेश को खारिज कर दिया है। हाईकोर्ट ने पाया कि निदान केंद्र के खिलाफ शिकायत उचित प्राधिकारी द्वारा नहीं की गई थी।
कोर्ट ने कहा कि पीसी एवं पीएनडीटी अधिनियम की धारा 17 के अनुसार शिकायत राज्य या केंद्र शासित प्रदेश द्वारा नियुक्त उचित प्राधिकारी द्वारा ही की जा सकती है। इसमें तीन सदस्य होते हैं जिनमें स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण के संयुक्त निदेशक या उससे ऊपर के पद का अधिकारी अध्यक्ष, महिला संगठन का प्रतिनिधित्व करने वाली एक प्रतिष्ठित महिला और संबंधित राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के विधि विभाग का एक अधिकारी शामिल होता है।
जस्टिस जसजीत सिंह बेदी ने कहा कि शिकायत अकेले डाॅक्टर एसके नवल द्वारा दायर की गई थी और इसे पीसी और पीएनडीटी अधिनियम की धारा 17 के तहत अधिसूचना द्वारा नियुक्त तीन सदस्यीय समिति द्वारा दायर किया जाना चाहिए था। ऐसा न किए जाने के कारण शिकायत ही सुनवाई योग्य नहीं है और इसलिए दोषसिद्धि गलत है।
विज्ञापन
यह है मामला
हरियाणा के हिसार में कंबोज अल्ट्रासाउंड और डायग्नोस्टिक के खिलाफ 2006 में शिकायत की गई थी कि यह लिंग निर्धारण का कारोबार चला रहा है। नतीजतन अल्ट्रासाउंड मशीन के साथ केंद्र को सील कर दिया गया था। यह पाया गया कि प्रथम दृष्टया पीएनडीटी अधिनियम के प्रावधानों का घोर उल्लंघन था और इस तरह अधिनियम की धारा 23 के तहत आरोपी का पंजीकरण निलंबित कर दिया गया। आरोपियों को अगले आदेश तक अधिनियम के तहत किसी भी गतिविधि में शामिल न होने के लिए भी कहा गया। ट्रायल कोर्ट ने डायग्नोस्टिक सेंटर के निदेशकों को प्रसव पूर्व निदान करने के लिए दोषी ठहराया और 3 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई। इसे उच्च न्यायालय के समक्ष चुनौती दी गई।
विज्ञापन
हिसार से जुड़ा हुआ है मामला, 2008 में डाॅक्टर को अदालत ने माना था दोषी
चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने गर्भधारण पूर्व एवं प्रसव पूर्व निदान तकनीक (लिंग चयन निषेध) अधिनियम, 1994 (पीसी एवं पीएनडीटी अधिनियम) के तहत वर्ष 2008 में पारित दोषसिद्धि आदेश को खारिज कर दिया है। हाईकोर्ट ने पाया कि निदान केंद्र के खिलाफ शिकायत उचित प्राधिकारी द्वारा नहीं की गई थी।
कोर्ट ने कहा कि पीसी एवं पीएनडीटी अधिनियम की धारा 17 के अनुसार शिकायत राज्य या केंद्र शासित प्रदेश द्वारा नियुक्त उचित प्राधिकारी द्वारा ही की जा सकती है। इसमें तीन सदस्य होते हैं जिनमें स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण के संयुक्त निदेशक या उससे ऊपर के पद का अधिकारी अध्यक्ष, महिला संगठन का प्रतिनिधित्व करने वाली एक प्रतिष्ठित महिला और संबंधित राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के विधि विभाग का एक अधिकारी शामिल होता है।
विज्ञापन
जस्टिस जसजीत सिंह बेदी ने कहा कि शिकायत अकेले डाॅक्टर एसके नवल द्वारा दायर की गई थी और इसे पीसी और पीएनडीटी अधिनियम की धारा 17 के तहत अधिसूचना द्वारा नियुक्त तीन सदस्यीय समिति द्वारा दायर किया जाना चाहिए था। ऐसा न किए जाने के कारण शिकायत ही सुनवाई योग्य नहीं है और इसलिए दोषसिद्धि गलत है।
विज्ञापन
यह है मामला
हरियाणा के हिसार में कंबोज अल्ट्रासाउंड और डायग्नोस्टिक के खिलाफ 2006 में शिकायत की गई थी कि यह लिंग निर्धारण का कारोबार चला रहा है। नतीजतन अल्ट्रासाउंड मशीन के साथ केंद्र को सील कर दिया गया था। यह पाया गया कि प्रथम दृष्टया पीएनडीटी अधिनियम के प्रावधानों का घोर उल्लंघन था और इस तरह अधिनियम की धारा 23 के तहत आरोपी का पंजीकरण निलंबित कर दिया गया। आरोपियों को अगले आदेश तक अधिनियम के तहत किसी भी गतिविधि में शामिल न होने के लिए भी कहा गया। ट्रायल कोर्ट ने डायग्नोस्टिक सेंटर के निदेशकों को प्रसव पूर्व निदान करने के लिए दोषी ठहराया और 3 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई। इसे उच्च न्यायालय के समक्ष चुनौती दी गई।