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कभी बीनने थे कूड़ा, आज बोलते हैं ए फॉर एप्पल
अमर उजाला ब्यूरो
Updated Mon, 05 Sep 2016 12:57 AM IST
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बस्ती
- फोटो : अमर उजाला
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भिवानी में सालभर पहले स्लम बस्तियों में रहने वाले बच्चे होटल में बर्तन साफ करने या फिर कूड़ा-बीनने का काम करते थे। आज वे ए फॉर एप्पल, एक से सौ तक की गिनती और पहाड़े सीख रहे हैं।
दिहाड़ी मजदूरों, प्रवासी और जरूरतमंद लोगों के बच्चों के जीवन में यह बदलाव लाया है स्वास्थ्य शिक्षा सहयोग संगठन। जून 2015 से रेलवे स्टेशन के पीछे झुग्गी- झोपड़ियों में बच्चों को पढ़ाने की शुरूआत की तो कुछ ही दिनों में संख्या 40 हो गई। अभिभावकों का भरोसा और समझ बढ़ी तो बच्चों की संख्या बढ़ती गई। आज शहर में छह अलग-अलग जगहों पर 280 बच्चे पढ़ रहे हैं। संगठन ने टीचर और कॉपी किताबों का तो इंतजाम कर दिया लेकिन बच्चों की खुले आसमान के नीचे क्लास लग रही है।
यहां लगती है क्लास
शहर में रोहतक रोड पर वाटर वर्क्स के सामने, पालुवास मोड़ स्थित पार्क, सेक्टर-13, ऑटो मार्केट, तोशाम बाईपास अनाज मंडी और रेलवे स्टेशन के पीछे बनी झुग्गी झोपड़ियों में हर रोज कक्षाएं लगाई जाती हैं। तीन-तीन घंटे की कक्षा में बच्चों को हिंदी, गणित, अंग्रेजी के साथ-साथ नैतिक मूल्यों की शिक्षा भी दी जा रही है। कॉपी, पेंसिल, कायदे, चार्ट संगठन की तरफ से बच्चों को मुफ्त मुहैया कराए जाते हैं। शिक्षिका कुसुम, पूनम, सुनीता का कहना है कि अभावों में गुजर-बसर करने वाले बच्चों का क्लास में आना सुखद है। समय से आकर अपना काम दिखाना, गिनती, पहाड़े सुनाने की होड़ बताती है कि ये बच्चे पढ़ना चाहते हैं।
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अभिभावकों को समझाने में मशक्कत
संगठन के प्रदेशाध्यक्ष बृजपाल परमार का कहना है कि स्लम बस्तियों में स्कूल खोलने को लेकर काफी कठिनाइयों को सामना करना पड़ा। बार-बार समझाने, बात करने पर भी झुग्गियों में रहने वाले लोग अपने बच्चों को कूड़ा-बीनने या होटल में काम करने भेज देते थे। मशक्कत के बाद अभिभावक अपने बच्चों को पढ़ने के लिए भेजने लगे।
खुद पैसे जोड़कर पढ़ाते है बच्चों को
संगठन के पदाधिकारी और सदस्य सालाना पांच-पांच हजार रुपये एकत्रित कर शिक्षकों को वेतन, किताबें, कॉपी आदि का इंतजाम करते हैं। कई बार कुछ समाजसेवी लोग भी अपनी तरफ से अनुदान या फिर बच्चों की पाठ्यसामग्री में सहायता देते हैं।
संगठन के पदाधिकारी राजेश रंगा, रमेश सैनी, संजीव तंवर, कुलदीप, भारती, रूबी मित्तल का कहना है कि अगर प्रशासन थोड़ी बहुत सहायता भी कर दे तो शिक्षण कार्य में कोई बाधा नहीं होगी। बस्तियों में बच्चों को पढ़ाने के लिए शेड, जगह न होने के कारण गर्मी-सर्दी, बारिश के मौसम में परेशानी होती है। कई बार छुट्टी भी करनी पड़ती है।
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दिहाड़ी मजदूरों, प्रवासी और जरूरतमंद लोगों के बच्चों के जीवन में यह बदलाव लाया है स्वास्थ्य शिक्षा सहयोग संगठन। जून 2015 से रेलवे स्टेशन के पीछे झुग्गी- झोपड़ियों में बच्चों को पढ़ाने की शुरूआत की तो कुछ ही दिनों में संख्या 40 हो गई। अभिभावकों का भरोसा और समझ बढ़ी तो बच्चों की संख्या बढ़ती गई। आज शहर में छह अलग-अलग जगहों पर 280 बच्चे पढ़ रहे हैं। संगठन ने टीचर और कॉपी किताबों का तो इंतजाम कर दिया लेकिन बच्चों की खुले आसमान के नीचे क्लास लग रही है।
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यहां लगती है क्लास
शहर में रोहतक रोड पर वाटर वर्क्स के सामने, पालुवास मोड़ स्थित पार्क, सेक्टर-13, ऑटो मार्केट, तोशाम बाईपास अनाज मंडी और रेलवे स्टेशन के पीछे बनी झुग्गी झोपड़ियों में हर रोज कक्षाएं लगाई जाती हैं। तीन-तीन घंटे की कक्षा में बच्चों को हिंदी, गणित, अंग्रेजी के साथ-साथ नैतिक मूल्यों की शिक्षा भी दी जा रही है। कॉपी, पेंसिल, कायदे, चार्ट संगठन की तरफ से बच्चों को मुफ्त मुहैया कराए जाते हैं। शिक्षिका कुसुम, पूनम, सुनीता का कहना है कि अभावों में गुजर-बसर करने वाले बच्चों का क्लास में आना सुखद है। समय से आकर अपना काम दिखाना, गिनती, पहाड़े सुनाने की होड़ बताती है कि ये बच्चे पढ़ना चाहते हैं।
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अभिभावकों को समझाने में मशक्कत
संगठन के प्रदेशाध्यक्ष बृजपाल परमार का कहना है कि स्लम बस्तियों में स्कूल खोलने को लेकर काफी कठिनाइयों को सामना करना पड़ा। बार-बार समझाने, बात करने पर भी झुग्गियों में रहने वाले लोग अपने बच्चों को कूड़ा-बीनने या होटल में काम करने भेज देते थे। मशक्कत के बाद अभिभावक अपने बच्चों को पढ़ने के लिए भेजने लगे।
खुद पैसे जोड़कर पढ़ाते है बच्चों को
संगठन के पदाधिकारी और सदस्य सालाना पांच-पांच हजार रुपये एकत्रित कर शिक्षकों को वेतन, किताबें, कॉपी आदि का इंतजाम करते हैं। कई बार कुछ समाजसेवी लोग भी अपनी तरफ से अनुदान या फिर बच्चों की पाठ्यसामग्री में सहायता देते हैं।
संगठन के पदाधिकारी राजेश रंगा, रमेश सैनी, संजीव तंवर, कुलदीप, भारती, रूबी मित्तल का कहना है कि अगर प्रशासन थोड़ी बहुत सहायता भी कर दे तो शिक्षण कार्य में कोई बाधा नहीं होगी। बस्तियों में बच्चों को पढ़ाने के लिए शेड, जगह न होने के कारण गर्मी-सर्दी, बारिश के मौसम में परेशानी होती है। कई बार छुट्टी भी करनी पड़ती है।