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धड़ल्ले से लगाए जा रहे सबमर्सिबल, नहीं लेनी पड़ती है किसी से अनुमति
कैथल
Updated Sat, 10 May 2014 12:10 AM IST
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कैथल। जिले में लगातार पाताल की ओर जा रहे भू-जलस्तर के गिरने का एक बड़ा कारण जिले भर में धड़ल्ले से लगाए जा रहे सबमर्सिबल पंप हैं। जो न केवल खेतों में, बल्कि लगभग हर घर में लगवाए जा रहे हैं।
इन सबमर्सिबल पंपों को लगाने के लिए न तो किसी विभाग से अनुमति ही लेनी पड़ती और न किसी से पूछने की आवश्यकता। आलम यह है कि गांवों में पंचायतों में सबमर्सिबल पंप स्टेट्स सिंबल बन गए हैं। ग्राम पंचायतों के खर्च पर धड़ल्ले से घरों में छोटे सबमर्सिबल पंप लगाए जा रहे हैं। यदि जिला प्रशासन ने इस ओर ध्यान नहीं दिया तो आने वाले समय में गंभीर संकट पैदा हो सकेगा।
सबमर्सिबल पंपों से अंधाधुंध दोहन
जिले भर में सबमर्सिबल पंपों के माध्यम से धड़ल्ले से धरती का सीना चीर कर पानी निकाला जा रहा है। बेशक खेतों में लगाए जाने वाले पंप किसानों की जरूरतों को पूरा करते हैं। लेकिन अधिकतर घरों में ये स्टेट्स सिंबल बन गए हैं। शहरों में नगर परिषद एवं नगर पालिका के माध्यम से लगवाए जा रहे हैं तो गांवों में ग्राम पंचायतों द्वारा भी पैसा खर्च कर लोगों के लिए ये पंप लगवाए जा रहे हैं। जो एक घंटों में हजारों लीटर पानी बाहर निकालते हैं। ऐसे में खुले पंप के पाइप से ही वाहनों की साफ-सफाई, पशुओं को नहलाने यहां तक की गलियों की साफ-सफाई भी पंप की पाइपलाइन के साथ की जाती है।
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अकेले कैथल शहर में 514 सरकारी पंप
जनस्वास्थ्य विभाग के अनुसार, अकेले कैथल शहर में जनस्वास्थ्य विभाग द्वारा 514 छोटे सबमर्सिबल पंप लगाए गए हैं। जो विभाग की 40 ट्यूबवेलों के माध्यम से दी जाने वाली पेय जलापूर्ति से अलग चल रहे हैं। इनमें से ही लाखों लीटर पानी प्रतिदिन बाहर निकाला जा रहा है। जबकि पेयजल के लिए जनस्वास्थ्य विभाग द्वारा बड़ी नहरी पानी आधारित परियोजनाएं शुरू करवाई जा चुकी हैं। यही स्थिति गांवों की भी है। गांवों में पंचायतों के खर्च के माध्यम से पंप लगवाए जा रहे हैं।
स्थिति संभालने की जरूरत : विशेषज्ञ
सरकारी विभागों के अलावा निजी तौर पर भी करीब 20 हजार रुपये की राशि खर्च करके छोटे पंप आसानी से लगवाए जा सकते हैं। जिले भर में सरकारी के अलावा हजारों की संख्या में निजी तौर पर भी सबमर्सिबल लगवाए गए हैं। जिन पर कोई रोक-टोक नहीं है। लेकिन ये आने वाले समय में कितनी बड़ी समस्या का कारण बनेंगे, इस बारे में शायद किसी का ध्यान नहीं है। कृषि वैज्ञानिक डा. रमेश वर्मा का कहना है कि जिले के कई हिस्से भू-जल को लेकर डार्क जोन में हैं। यदि स्थिति नहीं संभाली गई तो पीने तक के पानी की समस्या खड़ी हो जाएगी।
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इन सबमर्सिबल पंपों को लगाने के लिए न तो किसी विभाग से अनुमति ही लेनी पड़ती और न किसी से पूछने की आवश्यकता। आलम यह है कि गांवों में पंचायतों में सबमर्सिबल पंप स्टेट्स सिंबल बन गए हैं। ग्राम पंचायतों के खर्च पर धड़ल्ले से घरों में छोटे सबमर्सिबल पंप लगाए जा रहे हैं। यदि जिला प्रशासन ने इस ओर ध्यान नहीं दिया तो आने वाले समय में गंभीर संकट पैदा हो सकेगा।
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सबमर्सिबल पंपों से अंधाधुंध दोहन
जिले भर में सबमर्सिबल पंपों के माध्यम से धड़ल्ले से धरती का सीना चीर कर पानी निकाला जा रहा है। बेशक खेतों में लगाए जाने वाले पंप किसानों की जरूरतों को पूरा करते हैं। लेकिन अधिकतर घरों में ये स्टेट्स सिंबल बन गए हैं। शहरों में नगर परिषद एवं नगर पालिका के माध्यम से लगवाए जा रहे हैं तो गांवों में ग्राम पंचायतों द्वारा भी पैसा खर्च कर लोगों के लिए ये पंप लगवाए जा रहे हैं। जो एक घंटों में हजारों लीटर पानी बाहर निकालते हैं। ऐसे में खुले पंप के पाइप से ही वाहनों की साफ-सफाई, पशुओं को नहलाने यहां तक की गलियों की साफ-सफाई भी पंप की पाइपलाइन के साथ की जाती है।
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अकेले कैथल शहर में 514 सरकारी पंप
जनस्वास्थ्य विभाग के अनुसार, अकेले कैथल शहर में जनस्वास्थ्य विभाग द्वारा 514 छोटे सबमर्सिबल पंप लगाए गए हैं। जो विभाग की 40 ट्यूबवेलों के माध्यम से दी जाने वाली पेय जलापूर्ति से अलग चल रहे हैं। इनमें से ही लाखों लीटर पानी प्रतिदिन बाहर निकाला जा रहा है। जबकि पेयजल के लिए जनस्वास्थ्य विभाग द्वारा बड़ी नहरी पानी आधारित परियोजनाएं शुरू करवाई जा चुकी हैं। यही स्थिति गांवों की भी है। गांवों में पंचायतों के खर्च के माध्यम से पंप लगवाए जा रहे हैं।
स्थिति संभालने की जरूरत : विशेषज्ञ
सरकारी विभागों के अलावा निजी तौर पर भी करीब 20 हजार रुपये की राशि खर्च करके छोटे पंप आसानी से लगवाए जा सकते हैं। जिले भर में सरकारी के अलावा हजारों की संख्या में निजी तौर पर भी सबमर्सिबल लगवाए गए हैं। जिन पर कोई रोक-टोक नहीं है। लेकिन ये आने वाले समय में कितनी बड़ी समस्या का कारण बनेंगे, इस बारे में शायद किसी का ध्यान नहीं है। कृषि वैज्ञानिक डा. रमेश वर्मा का कहना है कि जिले के कई हिस्से भू-जल को लेकर डार्क जोन में हैं। यदि स्थिति नहीं संभाली गई तो पीने तक के पानी की समस्या खड़ी हो जाएगी।