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Ambala News: 12 साल की उम्र में शुरु की जिम्नास्टिक, बने राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी
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अंबाला। सीखने की कोई उम्र नहीं होती बस जज्बा होना चाहिए। इस बात को राष्ट्रीय खिलाड़ी जितेंद्र ने सच साबित कर दिया। उन्होंने 12 साल की उम्र में जिम्नास्टिक सीखना शुरु किया था जबकि जिम्नास्टिक सीखने की उम्र पांच से छह साल तक है। जतिंदर ने 10 साल की कड़ी मेहनत और कोच सतपाल की ट्रेनिंग के दम पर पैरलल बार ओर होरिजेंटल बार में माहिर बन 33 पदक अपने नाम किए। उत्तराखंड में आयोजित 38वीं नेशनल जिम्नास्टिक चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीतकर राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी बन गए।
जितेंद्र ने बताया कि वह अंबाला छावनी के बीडी फ्लोर मिल स्थित प्रगति विहार का निवासी है उसके पिता संजय चावला बाइक मैकेनिक है और मां माया देवी गृहणी हैं। मौजूदा समय में वह अंबाला छावनी के जीएमएन कॉलेज में एमए द्वितीय वर्ष का छात्र है। जब वह 12 साल का था। तब उसके पिता संजय चावला उसे लेकर छावनी के वार हीरो स्टेडियम में गए। जहां पर उसे जिम्नास्टिक सीखने के लिए दाखिल करवा दिया। लेकिन उम्र ज्यादा होने के कारण जितेंद्र को बहुत दिक्कतों का सामना करना पड़ा।
पांच से छह साल की उम्र में बच्चों की हड्डियां नरम होती है जो जिम्नास्टिक करते हुए आसानी से मुड़ जाती हैं। लेकिन 12 साल की उम्र में हड्डियां कठोर हो जाती है। जिन्हें मुड़ने में समय लगता है लेकिन जितेंद्र ने धीरे-धीरे जिम्नास्टिक की बारीकियों को पकड़ना शुरु कर दिया और पैरलल बार ओर होरिजेंटल बार पर अपनी पकड़ बनाई। इसके बाद जितेंद्र ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। जितेंद्र के पास 33 पदक है जिसमें 15 स्वर्ण, 10 रजत और आठ कांस्य पदक है। उन्होंने सात के करीब राज्यस्तरीय प्रतियोगिताएं खेली हैं। जिसमें छह से सात पदक अपने नाम किए हैं। इसके साथ ही उन्होंने तीन बार अमृतसर में आयोजित ऑल इंडिया यूनिवर्सिटी गेम में प्रतिभाग किया और पदक भी जीते। इसके साथ ही जिलास्तर पर कई पदक जीते हैं।
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जितेंद्र ने बताया कि वह अंबाला छावनी के बीडी फ्लोर मिल स्थित प्रगति विहार का निवासी है उसके पिता संजय चावला बाइक मैकेनिक है और मां माया देवी गृहणी हैं। मौजूदा समय में वह अंबाला छावनी के जीएमएन कॉलेज में एमए द्वितीय वर्ष का छात्र है। जब वह 12 साल का था। तब उसके पिता संजय चावला उसे लेकर छावनी के वार हीरो स्टेडियम में गए। जहां पर उसे जिम्नास्टिक सीखने के लिए दाखिल करवा दिया। लेकिन उम्र ज्यादा होने के कारण जितेंद्र को बहुत दिक्कतों का सामना करना पड़ा।
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पांच से छह साल की उम्र में बच्चों की हड्डियां नरम होती है जो जिम्नास्टिक करते हुए आसानी से मुड़ जाती हैं। लेकिन 12 साल की उम्र में हड्डियां कठोर हो जाती है। जिन्हें मुड़ने में समय लगता है लेकिन जितेंद्र ने धीरे-धीरे जिम्नास्टिक की बारीकियों को पकड़ना शुरु कर दिया और पैरलल बार ओर होरिजेंटल बार पर अपनी पकड़ बनाई। इसके बाद जितेंद्र ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। जितेंद्र के पास 33 पदक है जिसमें 15 स्वर्ण, 10 रजत और आठ कांस्य पदक है। उन्होंने सात के करीब राज्यस्तरीय प्रतियोगिताएं खेली हैं। जिसमें छह से सात पदक अपने नाम किए हैं। इसके साथ ही उन्होंने तीन बार अमृतसर में आयोजित ऑल इंडिया यूनिवर्सिटी गेम में प्रतिभाग किया और पदक भी जीते। इसके साथ ही जिलास्तर पर कई पदक जीते हैं।
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