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पाप-पुण्य ही हमारे सुख-दुख का कारण : साध्वी मनीषी

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Mon, 24 Mar 2025 01:34 AM IST
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Sin and virtue are the reason for our happiness and sorrow: Sadhvi Manishi
अंबाला सिटी के दिव्य जागृति संस्थान में प्रवचन करती साध्वियां। प्रवक्ता
अंबाला।
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इंसान ने एक बार कर्म करता है तो उसका फल उसे वैसे ही ढूंढ लेता है, जैसे हजार गायों के झुंड में एक बछड़ा अपनी मां को ढूंढ लेता है। इंसान अपने जीवन में अनगिनत कर्म करता है, कुछ अच्छे होते हैं, कुछ बुरे। इन्हीं कर्मों में बंधा जीव सारा जीवन सुख और दुःख की चक्की में पिसता रहता है।

ये बात गुरुदेव सर्वश्री आशुतोष महाराज की शिष्या साध्वी मनीषी भारती ने कही। वे दिव्य ज्योति जाग्रति संस्था की ओर से आयोजित सत्संग में बोल रहीं थीं। उन्होंने कहा कि मारा संसार कर्म के सिद्धांत के अधीन है। ईश्वर ने इस सृष्टि का निर्माण किया और इसे कर्म के नियमों से बांध दिया। कर्म का यही सिद्धांत कहता है कि जैसा कर्म करेगा वैसा फल पाएगा। उन्होंने कहा कि कर्म करने का चुनाव तो हमारा होता है लेकिन उसका फल का चुनाव हमारा नहीं है।
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ये कर्म चक्र ही तो है जो हमारे आवागमन का कारण बनता है। आखिर इस कर्म चक्र से मुक्ति का उपाय क्या है? अक्सर लोग कहते हैं कि जीवनभर अच्छे कर्म करो, सबका भला करो, किसी का दिल न दुखाओ। बस अच्छा करो और अच्छा पाओ लेकिन जंज़ीर चाहे सोने की हो या लोहे की, वो काम तो बांधने का ही करती है। पिंजरा सोने का हो या लोहे का, वो बन्धन का ही कारण बनेगा। ऐसे ही कर्म चाहे अच्छे हों या बुरे, वो बन्धन के ही हेतु हैं। फिर कर्म बन्धन से मुक्ति का उपाय क्या है? जिस प्रकार एक बीज को अगर अग्नि में भून दिया जाए तो वह अंकुरित नहीं हो सकता। जब जीवन में पूर्ण गुरु का आगमन होता है, तब वह हमें ईश्वर के ज्योति स्वरूप का हमारे घट में दर्शन कराकर हमारे भीतर ही ब्रह्मज्ञान की अग्नि प्रज्वलित कर देते हैं।
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गुरु आज्ञा में चलते हुए एक साधक इस ज्ञानाग्नि में अपने सब कर्म स्वाहा कर लेता है और सदा-सदा के लिए मोक्ष का अधिकारी हो जाता है। इसलिए हमें भी ज़रूरत है एक ऐसे पूर्ण गुरु की जो हमारे भीतर ही हमें ईश दर्शन करवा हमें कर्मों की कारा से मुक्त कर दे।

अंबाला सिटी के दिव्य जागृति संस्थान में प्रवचन करती साध्वियां। प्रवक्ता

अंबाला सिटी के दिव्य जागृति संस्थान में प्रवचन करती साध्वियां। प्रवक्ता

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