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भगवान शिव का न कोई गौत्र, न कोई पिता-माता, न कोई वंश वह स्वयंभू हैं - पंडित भगवती प्रसाद000

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Wed, 27 Jul 2022 02:03 AM IST
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Om Namah: Worship of Shiva with the help of Shivaay
अंबाला सिटी के सेक्टर सात स्थित श्री नीलकंठ महादेव मंदिर में चल रहे सवा करोड़ ओम नम: शिवाय मंत्र जाप कार्यक्रम में सुबह करीब छह बजे शिव भक्तों ने भगवान भोलेनाथ के दरबार में शिवलिंग पर जलाभिषेक किया गया। जिसमें सेक्टर से करीब 100 परिवारों के सदस्यों ने पहुंचकर ओम नम: शिवाय मंत्र के जाप में भाग लिया। मंदिर पुजारी पंडित भगवती प्रसाद की ओर से मंत्रोच्चारण करते हुए विधिवत तरीके से भगवान शिव की विशेष पूजा करवाई। इस अवसर पर पंडित भगवती प्रसाद शास्त्री ने शिव पार्वती की विवाह की कथा को आगे बढ़ाते हुए कहा कि शिव पार्वती विवाह समारोह में जब भगवान शिव के परिवार व गौत्र के बारे में सभा के उपस्थित राजा व प्रजा के लोग चर्चा करने लगे तो भगवान शिव चुपचाप बैठे रहे और दुल्हन की ओर देख रहे थे। वधू पक्ष के लोग बार-बार उनसे यह सवाल पूछते रहे, क्योंकि विवाह करने से पूर्व वधू पक्ष को वर पक्ष के वंश का अता-पता होना जरूरी माना गया है। वहीं विवाह का शुभ मुहूर्त तेजी से निकलता जा रहा था, मगर शिव मौन बैठे रहे। समाज के लोग, कुलीन राजा-महाराजा और पंडित बहुत घृणा से शिव की ओर देखने लगे और तुरंत सभी सहजता से आपस में चर्चा करने लगे कि इसका वंश क्या होगा, यह बोल क्यों नहीं रहे, कहीं इसका परिवार किसी नीची जाति का तो नहीं हैं इसलिए इसको अपने वंश के बारे में बताने में शर्म आ रही होगी, लेकिन इस दौरान नारद मुनि इस पूरे वाक्य को देख रहे थे। नारद मुनि ने यह सब तमाशा देखकर अपनी वीणा उठाई और उसकी एक ही तार खींचते रहे। वह लगातार एक ही धुन बजाते रहे। जिसको देखकर पार्वती के पिता पर्वत राज अपना आपा खो बैठे और गुस्से में आकर बोले यह सब क्या कर रहे हो। हम वर की वंशावली के बारे में सुनना चाहते हैं, मगर वह कुछ बोल नहीं रहे हैं। क्या मैं अपनी बेटी का विवाह एक ऐसे आदमी से कर दूं जिसके वंश का कोई अता पता नहीं, इसपर नारद ने जवाब दिया कि वर के माता-पिता नहीं हैं। वह अपने माता-पिता के बारे में नहीं जानते वह भगवान स्वयंभू हैं। इनकी कोई विरासत नहीं है, इनका कोई गोत्र नहीं है, इसके पास कुछ नहीं है, इनके पास अपने खुद के अलावा कुछ भी नहीं है। पूरी सभा आश्चर्य चकित हो गई। पर्वत राज ने कहा हम ऐसे लोगों को नहीं जानते हैं। जिनको अपने पिता-माता के बारे में कुछ भी नहीं पता हो, इस वर का भी किसी माता-पिता से ही जन्म जरूर हुआ होगा, ऐसा कैसे हो सकता है कि किसी का कोई पिता व मां ही न हो। नारद ने जवाब दिया, क्योंकि यह स्वयंभू हैं। इन्होंने खुद की रचना की है। इनके न तो पिता हैं न माता। इनका न कोई वंश है, न परिवार है। यह किसी परंपरा से ताल्लुक नहीं रखते और न ही इनके पास कोई राज्य है। इनका न तो कोई गोत्र है, और न कोई नक्षत्र। न कोई भाग्यशाली तारा इनकी रक्षा करता है। यह इन सब चीजों से परे हैं। यह एक योगी हैं और इन्होंने सारे अस्तित्व को अपना एक हिस्सा बना लिया है। इनके लिए सिर्फ एक वंश है। ध्वनि आदि, शून्य प्रकृति ने जब अस्तित्व में आई, तो अस्तित्व में आने वाली पहली चीज थी ध्वनि, इनकी पहली अभिव्यक्ति एक ध्वनि के रूप में है। ये सबसे पहले एक ध्वनि के रूप में प्रकट हुए। उसके पहले ये कुछ नहीं थे। यही वजह है कि मैं यह तार खींच रहा था, ताकि आप सभी उपस्थित लोगों को इशारे में बता सकूं। फिर कहीं जाकर नारद मुनि द्वारा बताए जाने पर सभी को सभागार में उपस्थित राजा व महाराजाओं को संतुष्ट किया। तत्पश्चात शिव पार्वती का विवाह संपन्न हुआ। कथा विश्राम के पश्चात सभी शिव भक्तों ने भगवान भोलेनाथ के दरबार में विशेष आरती कर प्रसाद ग्रहण किया।
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