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हाईटेंशन तारों से टकराई कांवड़, दो कांवड़िए झुलसे, पीजीआई रेफर
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अंबाला। हरिद्वार से छावनी आ रही करीब 20 फीट ऊंची कांवड़ हाईटेंशन तारों की चपेट में आ गई। हादसे में दो कांवड़िए गंभीर रूप से झुलस गए, जबकि चार बाल-बाल बच गए। घटना के बाद कांवड़ियों में हड़कंप मच गया। यह हादसा अंबाला-जगाधरी हाईवे स्थित इंडस्ट्रियल एरिया के पास हुआ। झुलसे गए कांवड़ियों को छावनी के नागरिक अस्पताल में दाखिल करवाया गया। जहां डॉक्टर ने प्राथमिक उपचार के बाद दोनों की बिगड़ती हालत को देखते हुए पीजीआई रेफर कर दिया।
झुलसे कांवड़ियों की पहचान छावनी की खटीक मंडी निवासी 40 वर्षीय तिलकराज व 22 वर्षीय हिमांशु के रूप में हुई है। परिजनों का कहना था कि हरिद्वार से कांवड़ लेने के लिए 12 युवाओं की टोली रवाना हुई थी। 18 जुलाई को गंगाजल लेकर अंबाला के लिए रवाना हुए थे। 25 जुलाई की दोपहर को छावनी इंडस्ट्रियल एरिया के पास पहुंचे। बता दें कि तिलकराज पहली तो हिमांशु दूसरी बार कांवड़ लेने के लिए गया था।
कांवड़िए यतिन ने बताया कि कांवड़ की ऊंचाई करीब 20 फीट थी। इतनी ऊंची कांवड़ को लाना काफी कठिन होता है। इसके लिए 12 युवाओं की टोली ने जिम्मा उठाया था और सभी की अलग-अलग ड्यूटी थी। दो कांवड़ियों को डंडे दे रखे थे जोकि कांवड़ के साथ-साथ बिजली के तारों को ऊपर कर रहे थे। कई जगह कांवड़ को झुकाकर निकालना पड़ रहा था। इंडस्ट्रियल एरिया के पास शिविर में रुके हुए थे। वहां से चलने की तैयारी की तो शिविर के पास ही हाईटेंशन तार से करंट लग गया। शिविर से निकलने से पहले कांवड़ को पूरी तरह से सजाया गया था।
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परिजनों की खुशियां गम में बदली
कांवड़िए यतिन, हैप्पी ने बताया कि अंबाला की यह सबसे ऊंची कांवड़ थी। अंबाला पहुंचने पर परिजनों द्वारा ढोल-नगाड़ों के साथ कांवड़ का स्वागत करने की तैयारी चल रही थी। मुख्य रास्ते से होते हुए प्राचीन हाथी खाना मंदिर जाना था। उससे पहले ही परिजनों को भनक लगी कि कांवड़ लगने पर दो झुलस गए। सभी खुशियां गम में बदल गई।
180 किलोमीटर से कांवड़ लाने के बाद जली
18 जुलाई की रात से कांवड़ को दिन-रात कंधों पर उठाकर अंबाला पहुंचे। यहां हाईटेंशन तारों की चपेट में आने से झुलसने पर कांवड़ियों की आंखें नम हो गई। एक तरफ दो साथियों के झुलसने का तो दूसरी तरफ पिछले 10 साल से लगातार ला रहे कांवड़ के खंडित होने का गम था। कांवड़िए यतिन का कहना है कि पुजारी से बातचीत कर सुबह निर्णय लिया जाएगा कि आखिर कांवड़ का क्या करना है।
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झुलसे कांवड़ियों की पहचान छावनी की खटीक मंडी निवासी 40 वर्षीय तिलकराज व 22 वर्षीय हिमांशु के रूप में हुई है। परिजनों का कहना था कि हरिद्वार से कांवड़ लेने के लिए 12 युवाओं की टोली रवाना हुई थी। 18 जुलाई को गंगाजल लेकर अंबाला के लिए रवाना हुए थे। 25 जुलाई की दोपहर को छावनी इंडस्ट्रियल एरिया के पास पहुंचे। बता दें कि तिलकराज पहली तो हिमांशु दूसरी बार कांवड़ लेने के लिए गया था।
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कांवड़िए यतिन ने बताया कि कांवड़ की ऊंचाई करीब 20 फीट थी। इतनी ऊंची कांवड़ को लाना काफी कठिन होता है। इसके लिए 12 युवाओं की टोली ने जिम्मा उठाया था और सभी की अलग-अलग ड्यूटी थी। दो कांवड़ियों को डंडे दे रखे थे जोकि कांवड़ के साथ-साथ बिजली के तारों को ऊपर कर रहे थे। कई जगह कांवड़ को झुकाकर निकालना पड़ रहा था। इंडस्ट्रियल एरिया के पास शिविर में रुके हुए थे। वहां से चलने की तैयारी की तो शिविर के पास ही हाईटेंशन तार से करंट लग गया। शिविर से निकलने से पहले कांवड़ को पूरी तरह से सजाया गया था।
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परिजनों की खुशियां गम में बदली
कांवड़िए यतिन, हैप्पी ने बताया कि अंबाला की यह सबसे ऊंची कांवड़ थी। अंबाला पहुंचने पर परिजनों द्वारा ढोल-नगाड़ों के साथ कांवड़ का स्वागत करने की तैयारी चल रही थी। मुख्य रास्ते से होते हुए प्राचीन हाथी खाना मंदिर जाना था। उससे पहले ही परिजनों को भनक लगी कि कांवड़ लगने पर दो झुलस गए। सभी खुशियां गम में बदल गई।
180 किलोमीटर से कांवड़ लाने के बाद जली
18 जुलाई की रात से कांवड़ को दिन-रात कंधों पर उठाकर अंबाला पहुंचे। यहां हाईटेंशन तारों की चपेट में आने से झुलसने पर कांवड़ियों की आंखें नम हो गई। एक तरफ दो साथियों के झुलसने का तो दूसरी तरफ पिछले 10 साल से लगातार ला रहे कांवड़ के खंडित होने का गम था। कांवड़िए यतिन का कहना है कि पुजारी से बातचीत कर सुबह निर्णय लिया जाएगा कि आखिर कांवड़ का क्या करना है।