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Ambala News: इतिहास पिरोने के लिए लंदन के पुस्तकालय तक पहुंचे थे इतिहासकार
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लंदन की ब्रिटिश लाइब्रेरी के बाहर खड़े इतिहासकार डॉ. यूवी सिंह। स्वयं
- शहीद स्मारक के निर्माण के लिए जुटाए तथ्य, सात साल तक चला बैठकों का दौर
वैभव शर्मा
अंबाला। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम को समर्पित अंबाला के शहीद स्मारक को धरातल पर उतारना आसान नहीं था। इसे बनाने के लिए इतिहास के पन्नों से कई कड़ियों को निकालकर जोड़ना था। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि देश के जिन बड़े इतिहासकारों को यह जिम्मेदारी दी गई, उन्होंने भारत ही नहीं बल्कि लंदन के पुस्तकालय तक को खंगालने जाना पड़ा था। इसके बाद जो चौंकाने वाले तथ्य सामने आए तब जाकर 1857 की क्रांति का प्रमाणिक इतिहास बनाया जा सका।
शहीद स्मारक के निदेशक डॉ. कुलदीप सैनी बताते हैं कि हमें सबसे पहले पता चला था कि 1857 की क्रांति मेरठ से भी 9 घंटे पहले अंबाला से शुरू हुई थी। यही इस स्मारक के निर्माण का आधार बना। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के पूर्व प्रमुख डॉ. केसी यादव द्वारा अपने शोध और पुस्तक में यह तथ्य दिए थे। उनके शोध के अनुसार, 1857 की क्रांति, जिसे अंग्रेजों ने म्यूटिनी यानी सैनिक विद्रोह कहा था, मेरठ से लगभग नौ घंटे पहले अंबाला छावनी में विद्रोह की शुरूआत हुई थी।
इस विषय पर उन्होंने स्वयं भी गहन शोध किया है और कई महत्वपूर्ण दस्तावेज जुटाए। उनके अनुसार, 10 मई, 1857 को अंबाला छावनी की 5वीं और 60वीं नेटिव इन्फैंट्री के सैनिक मेरठ से लगभग नौ घंटे पहले सुबह हथियार लेकर अपनी बैरकों से बाहर आ गए थे। ये तथ्य इस बात की ओर संकेत करते हैं कि 1857 के विद्रोह के इतिहास में अंबाला छावनी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है।
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इतिहास की कड़ियों को जोड़ना बना चुनौती
डॉ. सैनी बताते हैं कि क्रांति की शुरुआत अंबाला से हुई थी कि यह जानकारी और तथ्य तो मिल गए मगर इतिहास को स्मारक तक पहुंचाने के लिए कई कड़ियां जोड़नी पड़ती हैं। हमें यह पता होना चाहिए कि उससे पहले क्या हुआ था और इसके बाद क्या-क्या हुआ, तभी कहानी प्रमाणिक लगेगी। इसके साथ ही कई पुस्तकों में इतिहासकार अपनी-अपनी रिसर्च से तथ्य देते हैं मगर सही तथ्य क्या हैं इसकी भी खोज परक करनी थी। इसके लिए देश के बड़े छह इतिहासकारों की कमेटी बनाई गई। शोध करने वाली टीम जो भी तथ्य लाती उसे यह इतिहासकार सत्यापित करते। सात साल तक कई बैठकों का दौर चला तब जाकर 1857 से जुड़ा ऐसा इतिहास सामने आया।
छह इतिहासकार
इतिहासकारों की इस कमेटी में शामिल अंबाला के डॉ. यूवी सिंह बताते हैं कि इस इतिहास की नींव डाॅ. केसी यादव ने रखी थी। जो हरियाणा के इतिहास के मर्मज्ञ थे। हालांकि कोविड काल में उनका देहांत हो गया था। इसके बाद यह जिम्मेदारी इतिहासकार डॉ. यूवी सिंह, डॉ. रघुविंद्र तंवर, डॉ. कुलदीप अग्निहोत्री, प्रो. अनूपा पांडे, कर्नल योगेंद्र सिंह, डॉ. कपिल कुमार ने संभाली। डॉ. यूवी सिंह ने बताया कि हमने हरियाणा आर्काइव और राष्ट्रीय आर्काइव के वास्तविक दस्तावेजों को कई साल तक खंगाला। इसमें अंबाला, हरियाणा और राष्ट्रीय स्तर के 1857 की क्रांति से जुड़े तथ्यों को खोजा गया।
डेढ़ महीने रहे लंदन की लाइब्रेरी में
इतिहासकार डॉ. यूवी सिंह ने बताया कि वह खुद लंदन स्थित ब्रिटिश लाइब्रेरी में भी गए थे। वहां पर कई ब्रिटिश सेना से जुड़े अधिकारियों के लिखे दस्तावेज मिले, जिन्होंने इस क्रांति के संबंध में अपने परिजनों व जानकारों को पत्र व संस्मरण लिखे थे। लंदन में डेढ़ महीने का समय लगाकर यह सभी दस्तावेज जोड़े। इन दस्तावेजों की प्रतियां अपने साथ लेकर आ गए थे। इसके बाद इन सभी पन्नों में मौजूद कहानियों को आपस में जोड़ा गया। इसके साथ ही अंबाला में 1857 की क्रांति से जुड़े दस्तावेज डॉ. यूवी सिंह के पास ही थी। ऐसे में उन्होंने यह जानकारी भी साझा की।
शहीद स्मारक में दिखाए दृष्टांत जीवंत हैं। यहां पर एक पुस्तकालय भी प्रस्तावित है। जहां पर वास्तविक दस्तावेज और शोध से जुड़े संस्मरणों का संग्रह भी होगा। ऐसे में यहां आने वाले शोधार्थी या विद्यार्थी इसका लाभ उठा सकेंगे।
अंबाला में 135 सैनिकों की मौत का उल्लेख
ऊर्जा मंत्री अनिल विज ने बताया कि राष्ट्रीय अभिलेखागार से उन्हें एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेज मिला है, जिसकी प्रति भी उपलब्ध कराई जाएगी। इस दस्तावेज के अनुसार, सितंबर 1857 के दौरान अंबाला छावनी में 5वीं और 60वीं नेटिव इन्फैंट्री के सैनिकों को परेड ग्राउंड में बुलाया गया था। इसी दौरान कथित तौर पर किसी सैनिक ने फ्लाई यानी भागने का नारा लगाया, जिसके बाद यूरोपीय सैनिकों ने उन पर गोलियां चला दीं। उन्होंने बताया कि इस घटना में महज 10 मिनट के भीतर 135 सैनिक मारे गए, 33 को बंदी बना लिया गया और लगभग 40 सैनिक भागने में सफल रहे। उन्होंने कहा कि दस्तावेज में दर्ज इस घटना का विवरण आज तक व्यापक रूप से लोगों के सामने नहीं आया।
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वैभव शर्मा
अंबाला। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम को समर्पित अंबाला के शहीद स्मारक को धरातल पर उतारना आसान नहीं था। इसे बनाने के लिए इतिहास के पन्नों से कई कड़ियों को निकालकर जोड़ना था। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि देश के जिन बड़े इतिहासकारों को यह जिम्मेदारी दी गई, उन्होंने भारत ही नहीं बल्कि लंदन के पुस्तकालय तक को खंगालने जाना पड़ा था। इसके बाद जो चौंकाने वाले तथ्य सामने आए तब जाकर 1857 की क्रांति का प्रमाणिक इतिहास बनाया जा सका।
शहीद स्मारक के निदेशक डॉ. कुलदीप सैनी बताते हैं कि हमें सबसे पहले पता चला था कि 1857 की क्रांति मेरठ से भी 9 घंटे पहले अंबाला से शुरू हुई थी। यही इस स्मारक के निर्माण का आधार बना। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के पूर्व प्रमुख डॉ. केसी यादव द्वारा अपने शोध और पुस्तक में यह तथ्य दिए थे। उनके शोध के अनुसार, 1857 की क्रांति, जिसे अंग्रेजों ने म्यूटिनी यानी सैनिक विद्रोह कहा था, मेरठ से लगभग नौ घंटे पहले अंबाला छावनी में विद्रोह की शुरूआत हुई थी।
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इस विषय पर उन्होंने स्वयं भी गहन शोध किया है और कई महत्वपूर्ण दस्तावेज जुटाए। उनके अनुसार, 10 मई, 1857 को अंबाला छावनी की 5वीं और 60वीं नेटिव इन्फैंट्री के सैनिक मेरठ से लगभग नौ घंटे पहले सुबह हथियार लेकर अपनी बैरकों से बाहर आ गए थे। ये तथ्य इस बात की ओर संकेत करते हैं कि 1857 के विद्रोह के इतिहास में अंबाला छावनी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है।
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इतिहास की कड़ियों को जोड़ना बना चुनौती
डॉ. सैनी बताते हैं कि क्रांति की शुरुआत अंबाला से हुई थी कि यह जानकारी और तथ्य तो मिल गए मगर इतिहास को स्मारक तक पहुंचाने के लिए कई कड़ियां जोड़नी पड़ती हैं। हमें यह पता होना चाहिए कि उससे पहले क्या हुआ था और इसके बाद क्या-क्या हुआ, तभी कहानी प्रमाणिक लगेगी। इसके साथ ही कई पुस्तकों में इतिहासकार अपनी-अपनी रिसर्च से तथ्य देते हैं मगर सही तथ्य क्या हैं इसकी भी खोज परक करनी थी। इसके लिए देश के बड़े छह इतिहासकारों की कमेटी बनाई गई। शोध करने वाली टीम जो भी तथ्य लाती उसे यह इतिहासकार सत्यापित करते। सात साल तक कई बैठकों का दौर चला तब जाकर 1857 से जुड़ा ऐसा इतिहास सामने आया।
छह इतिहासकार
इतिहासकारों की इस कमेटी में शामिल अंबाला के डॉ. यूवी सिंह बताते हैं कि इस इतिहास की नींव डाॅ. केसी यादव ने रखी थी। जो हरियाणा के इतिहास के मर्मज्ञ थे। हालांकि कोविड काल में उनका देहांत हो गया था। इसके बाद यह जिम्मेदारी इतिहासकार डॉ. यूवी सिंह, डॉ. रघुविंद्र तंवर, डॉ. कुलदीप अग्निहोत्री, प्रो. अनूपा पांडे, कर्नल योगेंद्र सिंह, डॉ. कपिल कुमार ने संभाली। डॉ. यूवी सिंह ने बताया कि हमने हरियाणा आर्काइव और राष्ट्रीय आर्काइव के वास्तविक दस्तावेजों को कई साल तक खंगाला। इसमें अंबाला, हरियाणा और राष्ट्रीय स्तर के 1857 की क्रांति से जुड़े तथ्यों को खोजा गया।
डेढ़ महीने रहे लंदन की लाइब्रेरी में
इतिहासकार डॉ. यूवी सिंह ने बताया कि वह खुद लंदन स्थित ब्रिटिश लाइब्रेरी में भी गए थे। वहां पर कई ब्रिटिश सेना से जुड़े अधिकारियों के लिखे दस्तावेज मिले, जिन्होंने इस क्रांति के संबंध में अपने परिजनों व जानकारों को पत्र व संस्मरण लिखे थे। लंदन में डेढ़ महीने का समय लगाकर यह सभी दस्तावेज जोड़े। इन दस्तावेजों की प्रतियां अपने साथ लेकर आ गए थे। इसके बाद इन सभी पन्नों में मौजूद कहानियों को आपस में जोड़ा गया। इसके साथ ही अंबाला में 1857 की क्रांति से जुड़े दस्तावेज डॉ. यूवी सिंह के पास ही थी। ऐसे में उन्होंने यह जानकारी भी साझा की।
शहीद स्मारक में दिखाए दृष्टांत जीवंत हैं। यहां पर एक पुस्तकालय भी प्रस्तावित है। जहां पर वास्तविक दस्तावेज और शोध से जुड़े संस्मरणों का संग्रह भी होगा। ऐसे में यहां आने वाले शोधार्थी या विद्यार्थी इसका लाभ उठा सकेंगे।
अंबाला में 135 सैनिकों की मौत का उल्लेख
ऊर्जा मंत्री अनिल विज ने बताया कि राष्ट्रीय अभिलेखागार से उन्हें एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेज मिला है, जिसकी प्रति भी उपलब्ध कराई जाएगी। इस दस्तावेज के अनुसार, सितंबर 1857 के दौरान अंबाला छावनी में 5वीं और 60वीं नेटिव इन्फैंट्री के सैनिकों को परेड ग्राउंड में बुलाया गया था। इसी दौरान कथित तौर पर किसी सैनिक ने फ्लाई यानी भागने का नारा लगाया, जिसके बाद यूरोपीय सैनिकों ने उन पर गोलियां चला दीं। उन्होंने बताया कि इस घटना में महज 10 मिनट के भीतर 135 सैनिक मारे गए, 33 को बंदी बना लिया गया और लगभग 40 सैनिक भागने में सफल रहे। उन्होंने कहा कि दस्तावेज में दर्ज इस घटना का विवरण आज तक व्यापक रूप से लोगों के सामने नहीं आया।

लंदन की ब्रिटिश लाइब्रेरी के बाहर खड़े इतिहासकार डॉ. यूवी सिंह। स्वयं