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Ambala News: गणपति बप्पा महोत्सव के बाद अब दुर्गा पूजा की तैयारी
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अंबाला। श्री गणेश महोत्सव संपन्न होते ही कारीगर मां दुर्गा की पूजा में जुट जाएंगे और मूर्तियों के निर्माण का सिलसिला जारी हो जाएगा। अंबाला छावनी में जयपुर से आकर बसे कारीगरों का कहना है कि मां दुर्गा की मूर्तियों के निर्माण के लिए पहले से ही ऑर्डर आने शुरु हो गए हैं, इसलिए जल्द ही पूजा-अर्चना करने के बाद मां दुर्गा का आशीर्वाद लेकर वह पहली मूर्ति तैयार करेंगे जोकि मां को समर्पित होगी।
कारीगर ने बताया कि कोलकाता से विशेष मिट्टी को मंगवाया जाता है ताकि विधि-विधान के बाद मां दुर्गा की मूर्ति का निर्माण हो और इस दौरान कोई विघ्न न आए। मूर्ति निर्माण से पहले मिट्टी के ढांचे पर कई परतें चढ़ाई जाती हैं और फिर रंगाई-पुताई और सजावट के साथ मूर्ति को अंतिम रूप दिया जाता है। यह सब कार्य पूरी निष्ठा व लग्न से होता है ताकि गलती की कोई गुंजाइश न रहे।
ऐसे तैयार होती है मूर्ति
मूर्ति निर्माण से पहले ढांचा तैयार किया जाता है, इसमें सबसे पहले बांस और सूखे भूसे से प्रतिमा का ढांचा बनाया जाता है ताकि मूर्ति को शुरुआती आकार मिल सके। फिर इस ढांचे पर नरम मिट्टी की कई परतें लगाई जाती हैं, इसके लिए विशेष प्रकार की काली और गंगा की मिट्टी का उपयोग की जाती है आर इसमें गोंद का इस्तेमाल किया जाता है। मिट्टी सूखने के बाद, मूर्ति को एक सफेद रंग की पहली लेयर लगाई जाती है और फिर इसे फिर से सुखाया जाता है। सूखने पर मूर्ति को प्राकृतिक रंगों से रंगा जाता है, इसके बाद कपड़े, मुकुट, माला और अन्य सजावट सामग्री पहनाकर मूर्ति को पूरा किया जाता है।
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पांच दिवसीय उत्सव
दुर्गा पूजा का उत्सव अश्विन शुक्ल षष्ठी तिथि से प्रारंभ होता है, जो विजयादशमी तक चलता है। दुर्गा पूजा में महाषष्ठी, महासप्तमी, महाअष्टमी, महा नवमी और महा दशमी महत्वपूर्ण हैं। पंचांग के अनुसार अश्विन शुक्ल षष्ठी तिथि का प्रारंभ 27 सितंबर से होगा और उदयातिथि के आधार पर 28 सितंबर को महाषष्ठी से दुर्गा पूजा का शुभारंभ होगा। दुर्गा पूजा का समापन 2 अक्तूबर को होगा।
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कारीगर ने बताया कि कोलकाता से विशेष मिट्टी को मंगवाया जाता है ताकि विधि-विधान के बाद मां दुर्गा की मूर्ति का निर्माण हो और इस दौरान कोई विघ्न न आए। मूर्ति निर्माण से पहले मिट्टी के ढांचे पर कई परतें चढ़ाई जाती हैं और फिर रंगाई-पुताई और सजावट के साथ मूर्ति को अंतिम रूप दिया जाता है। यह सब कार्य पूरी निष्ठा व लग्न से होता है ताकि गलती की कोई गुंजाइश न रहे।
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ऐसे तैयार होती है मूर्ति
मूर्ति निर्माण से पहले ढांचा तैयार किया जाता है, इसमें सबसे पहले बांस और सूखे भूसे से प्रतिमा का ढांचा बनाया जाता है ताकि मूर्ति को शुरुआती आकार मिल सके। फिर इस ढांचे पर नरम मिट्टी की कई परतें लगाई जाती हैं, इसके लिए विशेष प्रकार की काली और गंगा की मिट्टी का उपयोग की जाती है आर इसमें गोंद का इस्तेमाल किया जाता है। मिट्टी सूखने के बाद, मूर्ति को एक सफेद रंग की पहली लेयर लगाई जाती है और फिर इसे फिर से सुखाया जाता है। सूखने पर मूर्ति को प्राकृतिक रंगों से रंगा जाता है, इसके बाद कपड़े, मुकुट, माला और अन्य सजावट सामग्री पहनाकर मूर्ति को पूरा किया जाता है।
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पांच दिवसीय उत्सव
दुर्गा पूजा का उत्सव अश्विन शुक्ल षष्ठी तिथि से प्रारंभ होता है, जो विजयादशमी तक चलता है। दुर्गा पूजा में महाषष्ठी, महासप्तमी, महाअष्टमी, महा नवमी और महा दशमी महत्वपूर्ण हैं। पंचांग के अनुसार अश्विन शुक्ल षष्ठी तिथि का प्रारंभ 27 सितंबर से होगा और उदयातिथि के आधार पर 28 सितंबर को महाषष्ठी से दुर्गा पूजा का शुभारंभ होगा। दुर्गा पूजा का समापन 2 अक्तूबर को होगा।