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आतंकियों से लोहा लेने वाले को भूल गई सरकार!
प्रवीण कुमार, प्रेमचंद/गुड़गांव, पटौदी
Updated Wed, 27 Nov 2013 01:03 AM IST
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जिसके दिल में देशभक्ति का जज्बा हो, वह हर वक्त जान की बाजी लगाने को तैयार होता है।
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ऐसे ही एक नायक हैं पटौदी खंड के गांव सफेदानगर के सुनील कुमार। 26/11 को मुंबई के आतंकी हमले के दौरान गोलियां खाईं। घायल हुए तो खाना-खुराक और इलाज का खर्च खुद उठाया। पर, उनके हौसले पस्त नहीं हुए। ठीक होते ही वे फिर से देश की सुरक्षा में जुट गए।
मुंबई आतंकी हमले में एनएसजी के सर्च ऑपरेशन दल में सुनील कुमार भी शामिल थे। ताज होटल में दूसरे जवानों की तरह उन्होंने भी अपनी जांबाजी दिखाई थी। जान पर खेलकर न सिर्फ विदेशियों को होटल से निकाला था, बल्कि कई आतंकियों को भी ढेर किया था।
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ऑपरेशन के दौरान उनके कूल्हे और पैर में गोलियां लगी थीं। इसके बाद मेडिकल खर्च से लेकर आर्थिक सहायता देने की खूब घोषणाएं की गईं पर बाद में मदद को कोई आगे नहीं आया।
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महाराष्ट्र सरकार ने भी उनका ख्याल मुंबई में इलाज के दौरान तक ही रखा। प्रदेश सरकार ने उनकी बहादुरी के बदले 26 जनवरी को एक शॉल और प्रशंसा पत्र पकड़ा दिया। केंद्र सरकार के प्रधानमंत्री राहत कोष से मिले एक लाख रुपए लंबे इलाज में नाकाफी साबित हुए।
सुनील फिलहाल कुमाऊं रेजिमेंट में हैं और शिलांग में तैनात हैं। 15 दिनों की छुट्टियों पर अपने पैतृक घर आए सुनील ने अमर उजाला से दर्द साझा करते हुए कहा कि मुंबई घटना के बाद पता चला कि सैनिकों को सम्मानित करने में भी भेदभाव किया जाता है। इससे वे काफी आहत नजर आए।
सर्च ऑपरेशन में उनके साथ शामिल झज्जर के सुरेंद्र और राजेश को प्रदेश सरकार ने एक-एक लाख रुपए देकर सम्मानित किया, पर उन्हें नजरंदाज कर दिया गया।
कसाब की फांसी से संतुष्ट नहीं परिजन
सुनील के परिजन मुंबई हमले के दोषी अजमल कसाब की फांसी से संतुष्ट नहीं हैं। वे कहते हैं कि जब तक इस हमले के एक-एक आरोपी को सजा नहीं मिलती तब तक हमले में शहीद हुए सैनिकों को सच्ची श्रद्धांजलि नहीं मिल सकती। सुनील की मां राजेश यादव कहती हैं कि सरकार को पाकिस्तान और अमेरिका पर मुंबई हमले से जुड़े आरोपियों को सौंपने के लिए दबाव बनाना चाहिए।