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वनटांगिया समुदाय: गोरखपुर के जंगलों में कैसे बसे ये परिवार? 1998 में योगी ने शुरू की थी इनके हक की लड़ाई

Sun, 08 Nov 2026 11:44 AM IST
अनुराग रंजन अमर उजाला, गोरखपुर
अमर उजाला, गोरखपुर Published by: अनुराग रंजन Updated Sun, 08 Nov 2026 11:44 AM IST
सार

योगी आदित्यनाथ वर्ष 2009 से वनटांगिया परिवारों के साथ दिवाली मनाते आ रहे हैं। मुख्यमंत्री बनने के बाद भी उन्होंने यह परंपरा जारी रखी। दिवाली पर वह बच्चों को मिठाई, टॉफी, कॉपी-किताब और आतिशबाजी उपहार में देते हैं। साथ ही गांवों में विकास और बुनियादी सुविधाओं से जुड़ी योजनाओं की सौगात भी देते हैं।

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Vantangia Community How Did These Families Settle in Gorakhpurs Forests Yogi Adityanath Began Fighting for The
सीएम योगी आदित्यनाथ - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी

विस्तार

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हर साल वनटांगिया परिवारों के साथ दिवाली मनाते हैं। इस साल भी वे इन परिवारों के साथ दिवाली मनाने आ रहे हैं, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि ये परिवार गोरखपुर के जंगलों में कैसे बसे और किन परिस्थितियों में उन्हें यहां अपना आशियाना बनाना पड़ा। वनटांगिया समुदाय का इतिहास ब्रिटिश शासनकाल से जुड़ा है। उस दौर में साखू के जंगल तैयार करने के लिए भूमिहीन मजदूरों को जंगलों में बसाया गया था। बाद में इन्हीं परिवारों को अपने अधिकारों और पहचान के लिए लंबा संघर्ष करना पड़ा।

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रेल पटरियों के लिए पेड़ों की कटाई के बाद बसाए गए मजदूर

ब्रिटिश शासनकाल में रेलवे की पटरियां बिछाने के लिए बड़े पैमाने पर जंगलों से साखू के पेड़ों की कटाई की गई। इसकी भरपाई के लिए अंग्रेज सरकार ने जंगलों में साखू के पौधे लगाने और उनकी देखरेख करने की योजना बनाई। इसके लिए गरीब, भूमिहीन मजदूरों को जंगलों में बसाया गया। ये ऐसे परिवार थे, जिनके पास आजीविका का कोई स्थायी साधन नहीं था।

साखू के जंगल तैयार करने के लिए म्यांमार (तत्कालीन बर्मा) की टांगिया पद्धति अपनाई गई। इस पद्धति के तहत जंगल में रहकर पौधों की देखभाल करने वाले परिवार वनटांगिया कहलाए। गोरखपुर के कुसम्ही जंगल में वर्ष 1918 में इनकी पांच बस्तियां बसाई गईं। इनमें जंगल तिनकोनिया नंबर तीन, रजही खाले टोला, रजही नर्सरी, आमबाग नर्सरी और चिलबिलवा शामिल हैं।

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जंगल से बेदखली के विरोध में दो लोगों की गई थी जान

जानकारी के अनुसार, जब साखू के पेड़ों से जंगल भर गया तो वन विभाग ने 1980 के दशक में वनटांगिया परिवारों को वहां से हटाने की कार्रवाई शुरू कर दी। छह जुलाई 1985 को वन विभाग की टीम जंगल तिनकोनिया नंबर तीन पहुंची। परिवारों के पास न दूसरी जगह घर था और न ही जमीन। ऐसे में उन्होंने जंगल छोड़ने से इनकार कर दिया।

विरोध के दौरान स्थिति तनावपूर्ण हो गई और फायरिंग हुई। इस घटना में परदेशी और पांचू नाम के दो वनटांगियों की मौत हो गई, जबकि 28 लोग घायल हुए थे। इसके बाद भी वन विभाग की सख्ती जारी रही। वर्ष 1998 में सांसद बनने के बाद योगी आदित्यनाथ ने वनटांगिया परिवारों के अधिकारों की लड़ाई शुरू की।

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2009 से वनटांगियों के साथ दिवाली मना रहे योगी

योगी आदित्यनाथ वर्ष 2009 से वनटांगिया परिवारों के साथ दिवाली मनाते आ रहे हैं। मुख्यमंत्री बनने के बाद भी उन्होंने यह परंपरा जारी रखी। दिवाली पर वह बच्चों को मिठाई, टॉफी, कॉपी-किताब और आतिशबाजी उपहार में देते हैं। साथ ही गांवों में विकास और बुनियादी सुविधाओं से जुड़ी योजनाओं की सौगात भी देते हैं। बच्चे उन्हें प्यार से 'टॉफी वाले बाबा' कहकर बुलाते हैं।

2017 में मिला राजस्व ग्राम का दर्जा

वनटांगिया परिवारों को अधिकार दिलाने के लिए योगी आदित्यनाथ ने सांसद रहते हुए भी प्रयास किए। वन अधिकार कानून में संशोधन के बाद भी इन परिवारों को जमीनी स्तर पर सुविधाएं मिलने में समय लगा। मुख्यमंत्री बनने के बाद अक्तूबर 2017 में उन्होंने वनटांगिया गांवों को राजस्व ग्राम का दर्जा दिलाया। इसका लाभ गोरखपुर के पांच वनटांगिया गांवों के साथ महराजगंज के 18 गांवों समेत प्रदेश के अन्य वनटांगिया गांवों को भी मिला।

राजस्व ग्राम का दर्जा मिलने के बाद इन गांवों के लोग सरकारी योजनाओं और बुनियादी सुविधाओं के हकदार बने। गांवों में पक्के आवास, सड़क, बिजली, पेयजल, स्कूल, आंगनबाड़ी केंद्र और आरओ वाटर मशीन जैसी सुविधाएं पहुंचीं। परिवारों को कृषि योग्य भूमि, आधार कार्ड, राशन कार्ड और रसोई गैस जैसी सुविधाओं का लाभ मिला। बच्चों की पढ़ाई शुरू हुई और पात्र लोगों को वृद्धावस्था, विधवा तथा दिव्यांग पेंशन जैसी योजनाओं से जोड़ा गया।

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