{"_id":"6a8e072bed5427b022054e3a","slug":"the-fundamental-basis-of-the-indian-knowledge-tradition-questioning-doubt-and-dialogue-gorakhpur-news-c-7-gkp1038-1429986-2026-08-26","type":"story","status":"publish","title_hn":"Gorakhpur News: भारतीय ज्ञान परंपरा का मूल आधार प्रश्न, संदेह और संवाद","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Gorakhpur News: भारतीय ज्ञान परंपरा का मूल आधार प्रश्न, संदेह और संवाद
Wed, 26 Aug 2026 02:50 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, गोरखपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, गोरखपुर
Updated Wed, 26 Aug 2026 02:50 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
गोरखपुर। दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग में मंगलवार को भारतीय ज्ञान परंपरा विषय पर विशेष व्याख्यान हुआ। मुख्य वक्ता महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय मोतिहारी के पूर्व कुलपति प्रो. संजीव कुमार शर्मा ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा का मूल आधार प्रश्न, जिज्ञासा, संदेह और संवाद है।
उन्होंने कहा कि किसी विचार का खंडन भी उसके मंडन जितना ही महत्वपूर्ण है क्योंकि असहमति विचार को गहराई से समझने का अवसर देती है। भारतीय ज्ञान परंपरा कला, विज्ञान और वाणिज्य को अलग-अलग खांचे में सीमित नहीं करती बल्कि मानव जीवन को समग्रता में देखती है।
लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय नई दिल्ली के कुलपति प्रो. मुरली मनोहर पाठक ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा का स्रोत केवल ग्रंथ नहीं, बल्कि लोक, परिवार, आचार्य और पीढ़ियों से चली आ रही परंपराएं भी हैं। अध्यक्षता विभागाध्यक्ष प्रो. रजनीकांत पांडेय ने की। इस दौरान प्रो. चितरंजन मिश्र और प्रो. गोपाल प्रसाद आदि मौजूद रहे।
विज्ञापन
विज्ञापन
उन्होंने कहा कि किसी विचार का खंडन भी उसके मंडन जितना ही महत्वपूर्ण है क्योंकि असहमति विचार को गहराई से समझने का अवसर देती है। भारतीय ज्ञान परंपरा कला, विज्ञान और वाणिज्य को अलग-अलग खांचे में सीमित नहीं करती बल्कि मानव जीवन को समग्रता में देखती है।
विज्ञापन
लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय नई दिल्ली के कुलपति प्रो. मुरली मनोहर पाठक ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा का स्रोत केवल ग्रंथ नहीं, बल्कि लोक, परिवार, आचार्य और पीढ़ियों से चली आ रही परंपराएं भी हैं। अध्यक्षता विभागाध्यक्ष प्रो. रजनीकांत पांडेय ने की। इस दौरान प्रो. चितरंजन मिश्र और प्रो. गोपाल प्रसाद आदि मौजूद रहे।
विज्ञापन