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थारुओं ने प्राकृतिक आपदा से बचने के लिए यहां स्थापित की थी 'देवी की पिंडी', आज मां दुबौली के नाम से है प्रसिद्ध
Wed, 17 Jun 2020 04:09 PM IST
vivek shukla
अमर उजाला ब्यूरो, कुशीनगर।
अमर उजाला ब्यूरो, कुशीनगर।
Published by: vivek shukla
Updated Wed, 17 Jun 2020 04:09 PM IST
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मां दुर्गा।
- फोटो : अमर उजाला।
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उत्तर प्रदेश कुशीनगर के कप्तानगंज कस्बा के आसपास घना जंगल था। थारुओं का एक समूह कहीं से भटकता हुआ यहां पहुंचा और घने जंगल में स्थित टीले पर विश्राम करने लगा। रात में तीव्र गर्जने की आवाज के साथ घनघोर बारिश होने लगी जो कई दिनों तक चली।
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मौसम की भयावहता इस कदर थी कि भयभीत थारूओं के समूह ने प्राकृतिक आपदा से बचने के लिए मिट्टी की तीन पिंडी बना महाकाली, महासरस्वती और महालक्ष्मी की उपासना प्रारंभी कर दी। आपदा रुक गई। थारूओं ने यहां रुककर काफी दिनों तक पूजा अर्चना की।
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आगे चलकर यह स्थान मां दुबौली स्थान के नाम से प्रसिद्ध हुआ। अब यहां मां दुर्गा, मां काली, भोलेनाथ सहित हनुमान जी का भव्य मंदिर और धर्मशाला का भी निर्माण हो चुका है। शारदीय और बासांतिक नवरात्र में यहां मेले जैसा दृश्य रहता है। श्रद्धालुओं का यहां दिन भर आना जाना लगा रहता है।
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मंदिर की विशेषता
धीरे-धीरे जंगल कटता गया और आसपास के श्रद्धालुओं ने पिंडी के स्थान की जगह शेर पर सवार मां दुर्गा की मूर्ति स्थापित कराई। परिसर के पूरब तरफ भगवान शंकर का शिवलिंग, हनुमान जी का मंदिर तथा ब्रह्मा स्थान स्थापित है। परिसर में महाकाली, मां सरस्वती, महालक्ष्मी काली मंदिर है, मां को चुनरी नारियल सिंदूर व हलवा पूड़ी चढ़ाया जाता है।।
यहां तय होती हैं शादियां
पुजारी शैलेंद्र मिश्र बताते हैं कि वर्षभर यहां वैवाहिक कार्यक्रम होते रहते हैं। लोग शादी का रिश्ता तय करने के साथ भावी वर-वधु को एक दूसरे को देखने की रस्म पूरी करते हैं। मंदिर निर्माण एवं देखभाल कार्य मे लगे पटखौली निवासी 70 वर्षीय सूर्यभान सिंह, बृजनाथ मिश्र, पौहारी सिंह, बचाई मिश्र, रामजी विश्वकर्मा आदि बताते हैं कि क्षेत्र के लोगों की आस्था का यह प्रमुख केंद्र है।
यहां तय होती हैं शादियां
पुजारी शैलेंद्र मिश्र बताते हैं कि वर्षभर यहां वैवाहिक कार्यक्रम होते रहते हैं। लोग शादी का रिश्ता तय करने के साथ भावी वर-वधु को एक दूसरे को देखने की रस्म पूरी करते हैं। मंदिर निर्माण एवं देखभाल कार्य मे लगे पटखौली निवासी 70 वर्षीय सूर्यभान सिंह, बृजनाथ मिश्र, पौहारी सिंह, बचाई मिश्र, रामजी विश्वकर्मा आदि बताते हैं कि क्षेत्र के लोगों की आस्था का यह प्रमुख केंद्र है।