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Gorakhpur News: आंखों की नस बचाने में कारगर होगी नई लेजर मशीन, तुरंत मिलेगी राहत
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- एनडी-याग लेजर तकनीक से काला मोतियाबिंद, झिल्ली जमने और बढ़ते आंखों के प्रेशर से पीड़ित मरीजों को मिलेगी राहत
- बीआरडी मेडिकल कॉलेज में प्रतिदिन इस बीमारी के आते हैं 10 से 15 मरीज
गोरखपुर। बाबा राघव दास मेडिकल कॉलेज में आंखों के गंभीर रोगों से पीड़ित मरीजों के लिए जल्द ही एनडी-याग लेजर मशीन की सुविधा शुरू होने जा रही है। इस मशीन से उन मरीजों का इलाज संभव होगा, जिनकी आंखों में मोतियाबिंद ऑपरेशन के दो से तीन वर्ष बाद दोबारा मोटी परत या झिल्ली जम जाती है, जिससे दिखाई देना कम हो जाता है या धुंधलापन बढ़ने लगता है।
इस मशीन से ऑपरेशन करते समय मरीज को दर्द नही होता है। कई मरीजों में मोतियाबिंद ऑपरेशन के बाद आंख के अंदर झिल्ली बनने लगती है, जिसे आम भाषा में दोबारा मोतियाबिंद जैसा माना जाता है। इसके अलावा कुछ मरीजों में आंखों का ड्रेनेज सिस्टम कमजोर होने से प्रेशर बढ़ने लगता है। यह स्थिति धीरे-धीरे आंख की नसों को नुकसान पहुंचाती है, जिसे सामान्यतः काला मोतियाबिंद या ग्लूकोमा कहा जाता है। यदि समय पर इलाज न मिले तो मरीज अंधेपन का शिकार भी हो सकता है।
मेडिकल कॉलेज प्रशासन ने इस समस्या को देखते हुए शासन को एनडी-याग लेजर मशीन के लिए प्रस्ताव भेजा था। विभागीय स्तर पर मशीन की स्वीकृति मिल चुकी है और एक सप्ताह के भीतर मशीन अस्पताल में स्थापित होने की संभावना है। इसके लिए ऑर्डर भी जारी कर दिया गया है।
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प्रतिदिन 10 से 15 ऐसे मरीज ओपीडी में पहुंचते हैं, जिन्हें मोतियाबिंद के बाद झिल्ली जमने, कम दिखाई देने या आंखों में बढ़ते प्रेशर की शिकायत रहती है। नई मशीन लगने के बाद हजारों मरीजों को स्थानीय स्तर पर ही बेहतर इलाज मिल सकेगा और बाहर जाने की आवश्यकता कम होगी।
- डॉ. रामकुमार जायसवाल, प्राचार्य, बीआरडी मेडिकल कॉलेज
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- बीआरडी मेडिकल कॉलेज में प्रतिदिन इस बीमारी के आते हैं 10 से 15 मरीज
गोरखपुर। बाबा राघव दास मेडिकल कॉलेज में आंखों के गंभीर रोगों से पीड़ित मरीजों के लिए जल्द ही एनडी-याग लेजर मशीन की सुविधा शुरू होने जा रही है। इस मशीन से उन मरीजों का इलाज संभव होगा, जिनकी आंखों में मोतियाबिंद ऑपरेशन के दो से तीन वर्ष बाद दोबारा मोटी परत या झिल्ली जम जाती है, जिससे दिखाई देना कम हो जाता है या धुंधलापन बढ़ने लगता है।
इस मशीन से ऑपरेशन करते समय मरीज को दर्द नही होता है। कई मरीजों में मोतियाबिंद ऑपरेशन के बाद आंख के अंदर झिल्ली बनने लगती है, जिसे आम भाषा में दोबारा मोतियाबिंद जैसा माना जाता है। इसके अलावा कुछ मरीजों में आंखों का ड्रेनेज सिस्टम कमजोर होने से प्रेशर बढ़ने लगता है। यह स्थिति धीरे-धीरे आंख की नसों को नुकसान पहुंचाती है, जिसे सामान्यतः काला मोतियाबिंद या ग्लूकोमा कहा जाता है। यदि समय पर इलाज न मिले तो मरीज अंधेपन का शिकार भी हो सकता है।
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मेडिकल कॉलेज प्रशासन ने इस समस्या को देखते हुए शासन को एनडी-याग लेजर मशीन के लिए प्रस्ताव भेजा था। विभागीय स्तर पर मशीन की स्वीकृति मिल चुकी है और एक सप्ताह के भीतर मशीन अस्पताल में स्थापित होने की संभावना है। इसके लिए ऑर्डर भी जारी कर दिया गया है।
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प्रतिदिन 10 से 15 ऐसे मरीज ओपीडी में पहुंचते हैं, जिन्हें मोतियाबिंद के बाद झिल्ली जमने, कम दिखाई देने या आंखों में बढ़ते प्रेशर की शिकायत रहती है। नई मशीन लगने के बाद हजारों मरीजों को स्थानीय स्तर पर ही बेहतर इलाज मिल सकेगा और बाहर जाने की आवश्यकता कम होगी।
- डॉ. रामकुमार जायसवाल, प्राचार्य, बीआरडी मेडिकल कॉलेज