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यादें: फांसी चढ़ने से पहले शहीद ने कही थी ये बात, 'गर्व की बात है, देश के लिए जा रहा हूं, फिर जन्म लूंगा...'
Sat, 18 Dec 2021 03:06 PM IST
vivek shukla
अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।
अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।
Published by: vivek shukla
Updated Sat, 18 Dec 2021 03:06 PM IST
सार
शहीद स्वतंत्रता संग्राम सेनानी राजेंद्र नाथ लाहिड़ी की भतीजी गीता लाहिड़ी ने अमर उजाला से अपनी यादें साझा की।
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पं. राम प्रसाद बिस्मिल बलिदानी मेला का शुभारंभ करते अतिथि।
- फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी राजेंद्र नाथ लाहिड़ी ने छोटे भाई वीरेंद्र नाथ लाहिड़ी से हंसते हुए कहा था कि गर्व की बात है कि देश के लिए जा रहा हूं, फिर जन्म लूंगा...देश को आजाद कराने के लिए। वीरेंद्र लाहिड़ी, फांसी दिए जाने की पूर्व संध्या पर राजेंद्र नाथ से मिलने गए थे। शहीद राजेंद्र नाथ लाहिड़ी की भतीजी गीता लाहड़ी ने शुक्रवार को अमर उजाला से ये बेशकीमती स्मृतियां साझा की। वह पंडित रामप्रसाद बिस्मिल बलिदानी दिवस एवं मेला महोत्सव में विशिष्ट अतिथि के रूप में शामिल होने आईं हैं।
पुणे से गोरखपुर आई 72 वर्षीय गीता लाहिड़ी ने बड़े चाचा राजेंद्र नाथ लाहिड़ी की गिरफ्तारी की घटना के बारे में बताया कि बाबा क्षिति मोहन सपरिवार बनारस में रहते थे। काकोरी घटना के बाद से चाचा राजेंद्र अज्ञातवास में रह रहे थे। एक रात छिपते-छिपाते वह घर पहुंचे। उस समय वह बहुत भूखे थे। रात होने के कारण बचा भोजन नौकरों को दे दिया गया था। घर में कुछ नहीं था। उस समय केवल नारियल के लड्डू बचे थे। बड़ी दीदी प्रफुल्ल चक्रवर्ती ने उन्हें लड्डू खिलाया और एक गिलास पानी पिलाया। वह रात में ही चले गए। उसके बाद कभी नहीं लौटे। घर से निकलते समय उनका पेन गिर गया था, जो कि सुबह घर के पारिवारिक चिकित्सक के कंपाउंडर को मिला। मना करने के बावजूद कंपाउंडर ने ब्रिटिश पुलिस को सूचना दे दी। इसके बाद चाचा गिरफ्तार कर लिए गए थे। गीता गर्व से कहती हैं कि 17 दिसंबर 1927 की सुबह चाचा को फांसी दी जानी थी। एक शाम पहले वह अपनी बैरक में दंड बैठक लगा रहे थे।
राजेंद्र नाथ लाहिड़ी की शहादत के 22 वर्ष बाद गीता का जन्म हुआ। वह बताती हैं कि पिता वीरेंद्र नाथ लाहिड़ी, बड़े चाचा मनमथनाथ लाहिड़ी, डॉ. जीतेंद्र नाथ लाहिड़ी, मनींद्र नाथ लाहिड़ी और बुआ नीला चक्रवती, प्रफुल्ल चक्रवर्ती से क्रांतिकारी चाचा राजेंद्र लाहिणी की वीरता और शहादत की बातें सुनते हुए बड़ी हुई। वह कहती हैं कि बुआ नीला चक्रवर्ती ने ही उन्हें शहीद चाचा राजेंद्र नाथ लाहिड़ी के आदर्श, देशभक्ति और वीरता से दुनिया को अवगत कराने की जिम्मेदारी सौंपी है।
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पुणे से गोरखपुर आई 72 वर्षीय गीता लाहिड़ी ने बड़े चाचा राजेंद्र नाथ लाहिड़ी की गिरफ्तारी की घटना के बारे में बताया कि बाबा क्षिति मोहन सपरिवार बनारस में रहते थे। काकोरी घटना के बाद से चाचा राजेंद्र अज्ञातवास में रह रहे थे। एक रात छिपते-छिपाते वह घर पहुंचे। उस समय वह बहुत भूखे थे। रात होने के कारण बचा भोजन नौकरों को दे दिया गया था। घर में कुछ नहीं था। उस समय केवल नारियल के लड्डू बचे थे। बड़ी दीदी प्रफुल्ल चक्रवर्ती ने उन्हें लड्डू खिलाया और एक गिलास पानी पिलाया। वह रात में ही चले गए। उसके बाद कभी नहीं लौटे। घर से निकलते समय उनका पेन गिर गया था, जो कि सुबह घर के पारिवारिक चिकित्सक के कंपाउंडर को मिला। मना करने के बावजूद कंपाउंडर ने ब्रिटिश पुलिस को सूचना दे दी। इसके बाद चाचा गिरफ्तार कर लिए गए थे। गीता गर्व से कहती हैं कि 17 दिसंबर 1927 की सुबह चाचा को फांसी दी जानी थी। एक शाम पहले वह अपनी बैरक में दंड बैठक लगा रहे थे।
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राजेंद्र नाथ लाहिड़ी की शहादत के 22 वर्ष बाद गीता का जन्म हुआ। वह बताती हैं कि पिता वीरेंद्र नाथ लाहिड़ी, बड़े चाचा मनमथनाथ लाहिड़ी, डॉ. जीतेंद्र नाथ लाहिड़ी, मनींद्र नाथ लाहिड़ी और बुआ नीला चक्रवती, प्रफुल्ल चक्रवर्ती से क्रांतिकारी चाचा राजेंद्र लाहिणी की वीरता और शहादत की बातें सुनते हुए बड़ी हुई। वह कहती हैं कि बुआ नीला चक्रवर्ती ने ही उन्हें शहीद चाचा राजेंद्र नाथ लाहिड़ी के आदर्श, देशभक्ति और वीरता से दुनिया को अवगत कराने की जिम्मेदारी सौंपी है।
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