गोरखपुर: खटारा वाहन से ढोते हैं स्कूली बच्चों को...अपने बच्चों का खुद रखें ख्याल
स्कूली बच्चों को ढोने के लिए ऑटो और ई-रिक्शा को परमिट नहीं मिलता है। बावजूद, इसके जिम्मेदारों की आंखों के सामने स्कूलों के बाहर ऑटो और ई-रिक्शा की लंबी कतार लगी रहती है। चालक मनमाने तरीके से बच्चों इनमें बैठाते हैं, लेकिन उन्हें रोकने-टोकने वाला तक कोई नहीं होता है।
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गोरखपुर शहर में स्कूली बच्चों को ले जाने वाले ज्यादातर वाहन बिना परमिट के ही चल रहे हैं। वैन, ऑटो और ई-रिक्शा में स्कूली बच्चे ठूंसकर चालक ले जाते हैं। इन्हें न तो नियम-कायदू का डर है और न ही आरटीओ व ट्रैफिक पुलिस की धरपकड़ का। ऑटो व ई-रिक्शा में तो 12 स 15 बच्चों को बैठाते हैं। ऐसे वाहनों की संख्या करीब दो हजार है। इनमें बैठे बच्चे कभी भी हादसे का शिकार हो सकते हैं। अगर जिम्मेदार नहीं चेते तो यहां भी बदायूं जैसा हादसा कभी भी हो सकता है।
मंगलवार की दोपहर करीब एक बजे सिविल लाइंस क्षेत्र के कार्मल स्कूल के बाहर वैन, ऑटो, और ई-रिक्शा की लंबी कतार लगी हुई थी। 1:10 बजे जैसे ही स्कूल की छुट्टी हुई, बच्चों को लेकर चालक अपने वाहनों की ओर चल दिए। इस बीच एक निजी वाहन जो करीब 20 वर्ष पुरानी थी, उसमें बारी-बारी से करीब 15 बच्चे बैठ गए। वहीं, जिस ऑटो में 10 बच्चों को ठूंसकर बैठाया था। इसमें चालक ने अपने बगल में भी तीन बच्चों को बैठा लिया। जबकि, स्कूल के गेट के पास ही यातायात पुलिस भी थी।
इसी तरह सिविल लाइंस के एचपी स्कूल के बाहर दोपहर के 1:35 बजे स्कूली वाहनें खड़ीं थीं। एक निजी वैन पूरी तरह से जर्जर हालत में थी, गाड़ियों की बैक लाइट, इंडिकेटर तक टूटा हुआ था। उसमें चालक ने 13 बच्चों को बैठा लिया और ट्रैफिक पुलिस के सामने ही निकल गया। इन गाड़ियों के नंबर को जब चेक किया गया तो किसी ने परमिट नहीं लिया था।
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ऑटो व ई-रिक्शा को नहीं मिलता परमिट
स्कूली बच्चों को ढोने के लिए ऑटो और ई-रिक्शा को परमिट नहीं मिलता है। बावजूद, इसके जिम्मेदारों की आंखों के सामने स्कूलों के बाहर ऑटो और ई-रिक्शा की लंबी कतार लगी रहती है। चालक मनमाने तरीके से बच्चों इनमें बैठाते हैं, लेकिन उन्हें रोकने-टोकने वाला तक कोई नहीं होता है।
हर साल करना होता है फिटनेस
पंजीकृत स्कूल वाहनों की हर साल फिटनेस की जांच करानी होती है। जांच में 20 से 30 फीसदी वाहन फिटनेस जांच में फेल हो जाते हैं। स्कूल बस संचालन में वाहनों में कैमरा, फायर सेफ्टी उपकरण, वाहन में मेडिकल किट, बस परमिट, प्रदूषण वैधता प्रमाणपत्र, वाहन में सीट बेल्ट, साइड की तीन पाइप, जिससे बच्चा सिर बाहर नहीं निकाल पाए की व्यवस्था जरूरी है। इसके अलावा बस के पीछे स्कूल के नाम और नंबर लिखे होने चाहिए।
एआरटीओ प्रशासन अरुण कुमार ने कहा कि स्कूली वाहनों का फिटनेस हर साल कराना अनिवार्य होता है। फिटनेस नहीं कराने वाले वाहनों के खिलाफ अभियान चलाकर कार्रवाई की जाती है।
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पांच साल पहले दुदही में हुआ था बड़ा हादसा
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पांच साल पहले हुए इस हादसे ने प्रदेश व केंद्र सरकार को भी झकझोर दिया था। मुख्यमंत्री ने मौके पर पहुंचकर मामले की जानकारी ली थी। उसी दिन प्रदेश में बिना मान्यता वाले स्कूलों व बिना परमिट वाले बसों पर सख्ती के आदेश दिए गए। अगले सप्ताह तक प्रदेश भर में खूब धरपकड़ हुई। लेकिन उसके बाद सब भूल गए। अब हर दिन टैंपो से स्कूली बच्चे ढोए जा रहे हैं। बिना परमिट की बसें दौड़ रही हैं। लेकिन, इसकी जांच व कार्रवाई के लिए न तो आरटीओ और न ही बीएसए की तरफ से कोई कार्रवाई हो रही है।