#हिंदीहैंहम: 'दुनिया की भाषा है हिंदी, पहचान की मोहताज नहीं'
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हिंदी सिर्फ भारत की ही नहीं, दुनिया की भाषा है। दुनिया के 40 देशों में हिंदी की पढ़ाई होती है। 50 देश ऐसे हैं, जहां हिंदी फिल्में देखी जाती हैं। यह कहना है गोरखपुर विश्वविद्यालय व संबद्ध महाविद्यालयों में हिंदी के शोध छात्रों का। ये छात्र-छात्रा अमर उजाला के ‘हिंदी हैं हम’ मुहिम के तहत आयोजित वेबिनार से जुड़े और अपनी बेबाक राय रखी। सबने कहा कि हिंदी किसी पहचान की मोहताज नहीं है।
हिंदी साहित्यकारों की भाषा नहीं, संस्कृति और विचार है
गोरखपुर विश्वविद्यालय की हिंदी शोध छात्रा हर्षिता कुमारी ने बताया कि भारत की 65 करोड़ जनता हिंदी बोलती है। यह बड़ी उपलब्धि है। दुनिया के 40 देशों में हिंदी पढ़ाई जाती है। 50 देश ऐसे हैं, जहां हिंदी फिल्में खूब देखी जाती हैं। अमेरिका में भी हिंदी में बात करने का चलन बढ़ा है। थाईलैंड, जापान, मलेशिया सहित तमाम देशों के लोग हिंदी सीखने भारत आते हैं। हिंदी सिर्फ साहित्यकारों की भाषा नहीं है, यह संस्कृति और विचार भी है। मां-बाप अपने बच्चों को हिंदी बोलने व सीखने के लिए प्रेरित करें तो नतीजा और अच्छा रहेगा।
नई शिक्षा नीति से बढ़ेगा हिंदी का सम्मान
गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिंदी शोध छात्र हिमांशु त्रिपाठी ने बताया कि नई शिक्षा नीति से हिंदी का मान-सम्मान और बढ़ेगा। चिकित्सा और तकनीकी संस्थानों के पाठ्यक्रमों में भी हिंदी पर जोर दिया गया है। हिंदी किसी पहचान की मोहताज नहीं है। हालीवुड में भी हिंदी की धमक देखने को मिली है। आस्कर में फिल्मी गीत ... जय हो की धूम थी। फिल्म अवतार को सराहना मिली थी। आने वाले समय में हिंदी दुनिया की सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं में शुमार होगी।
नौकरी की भाषा बनाएं तो महत्व और बढ़ेगा
सेंट एंड्रयूज पीजी कॉलेज गोरखपुर की शोध छात्रा ज्योति यादव ने बताया कि हिंदी हमारी मातृभाषा है। यह आपस में जोड़ने का काम करती है। जरूरत हिंदी को रोजगार की भाषा बनाने की है। जिस दिन हिंदी नौकरी पाने की भाषा बन गई, उस दिन से किसी को कुछ नहीं कहना पड़ेगा। सब हिंदी के पीछे भागेंगे। हां, हिंदी के व्याकरण पर ध्यान देना होगा। इससे हिंदी की गुणवत्ता बढ़ेगी। व्याकरण की अच्छी जानकारी रहेगी तो रोजगार की संभावना बढ़ जाएगी।
दूसरी व तीसरी पीढ़ी की भाषा बनाने की जरूरत
विश्व की भाषा बनने की ओर अग्रसर है हिंदी
गोरखपुर विश्वविद्यालय के शोध छात्र सत्येंद्र कुमार ने बताया कि हिंदी भाषा नहीं, समाज है। यह विश्व की भाषा बनने की ओर अग्रसर है। अगले 50 वर्षों में ऐसा हो सकता है। हिंदी तीज, त्योहार व परंपरा को आगे बढ़ाती है। होली मिलन समारोह में गीत गाए जाते हैं। इसमें लोक साहित्य का बड़ा योगदान रहता है। लोक साहित्य के बगैर हिंदी पूर्ण नहीं होती है। अंग्रेजी सहित अन्य भाषाओं की तुलना में भारत में हिंदी ज्यादा बोली, पढ़ी जाती है।
बच्चे को सुप्रभात बोलना सिखाएं
कुशीनगर की बीटीसी प्रशिक्षु निर्मला कुशवाहा ने बताया कि बच्चे को गुड मार्निंग की जगह सुप्रभात की शिक्षा दें तो हिंदी माथे की बिंदी बनी रहेगी। हिंदी सरल, सहज और समझने वाली भाषा है। भारत के किसी भी हिस्से में जाइए, हिंदी भाषी मिल जाएंगे। ग्रामीण क्षेत्रों में हिंदी ज्यादा समृद्ध है। हिंदी बोलने में किसी तरह की झिझक नहीं होनी चाहिए। बड़े-छोटे हिंदी बोलें, इसकी कोशिश लगातार करनी होगी, तभी हिंदी को दुनिया की पहली भाषा बनाई जा सकेगी।