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शिक्षक एमएलसी चुनाव : छोटा चुनाव, बड़ा संदेश

Thu, 29 Oct 2026 02:55 AM IST
Gorakhpur Bureau गोरखपुर ब्यूरो
Updated Thu, 29 Oct 2026 02:55 AM IST
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भाजपा के लिए अलर्ट, सपा का पीडीए समीकरण भी नहीं चला, शिक्षकों के मुद्दों की अनदेखी भारी पड़ा
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गोरखपुर। गोरखपुर-फैजाबाद खंड शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र का चुनाव भले ही सीमित मतदाताओं का था, लेकिन इसके संदेश बड़े हैं। आठ महीने से तैयारी कर रहे कमलेश यादव का सपा से टिकट कटना, भाजपा से टिकट न मिलने पर डॉ संजयन का सपा में जाना, भाजपा एमएलसी देवेंद्र प्रताप सिंह के बागी तेवर ने इस चुनाव का रुख बदलने में बड़ी भूमिका निभाई। विधानसभा चुनाव से पहले इन घटनाक्रम ने भाजपा व सपा के साथ शिक्षक संगठनों के लिए बड़े संदेश दिए हैं।
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देवेंद्र का बागी तेवर, शिक्षकों के मुद्दों पर ध्यान न देना भारी पड़ा
भाजपा के लिए चूक व संदेश
भाजपा एमएलसी देवेंद्र प्रताप सिंह चुनाव के बीच ही बागी हो गए। सरकार को कटघरे में खड़ा करके संकेतों में ही संदेश देकर शिक्षक मतदाताओं से मतदान की अपील करने लगे। पार्टी इस पर कड़ा रुख नहीं अपना पाई और नेतृत्व मौन रहा। भाजपा के शिक्षक संवाद सम्मेलन में गोरखपुर क्षेत्र से एमपी-एमएलए को आमंत्रित किया गया था लेकिन कई जिलों से लोगों ने शिरकत नहीं की।
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पिछले शिक्षक एमएलसी चुनाव में भाजपा ने शर्मा गुट के प्रत्याशी ध्रुव त्रिपाठी को समर्थन दिया था। इस चुनाव में पार्टी ने उन्हें प्रत्याशी बना दिया। दिग्विजयनाथ पीजी कॉलेज के प्राचार्य एवं राजनीतिक विश्लेषक डॉ. ओपी सिंह कहते हैं, शर्मा गुट का अपना वर्चस्व रहता था और ध्रुव इसी गुट से तीन बार चुनाव जीते थे। ऐसे में ध्रुव का भाजपा में जाने का शिक्षकों में सकारात्मक संदेश नहीं गया। इसके अलावा भाजपा में रहते हुए डॉ. संजयन त्रिपाठी ने मतदाता बनवाए थे। सपा में उनके जाने का भी मतों पर असर पड़ा। शिक्षकों के मुद्दों पर कहीं न कहीं चूक हुई जिसका सकारात्मक असर चुनाव पर नहीं गया। इसके चलते भाजपा को कड़ी चुनौती झेलनी पड़ी। सरकार को अब शिक्षकों के मुद्दों पर गौर करने की जरूरत है।
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सपा को प्रत्याशी बदलना भारी पड़ा, पीडीए फाॅर्मूला नाकाम
सपा ने पीडीए ( पिछड़ा, दलित व अल्पसंख्यक) को नया राजनीतिक हथियार बनाया है। इस वोट बैंक के ध्रुवीकरण ने भी नए सियासी संदेश दिए हैं। राजनीतिक विश्लेषक एवं गोरखपुर विश्वविद्यालय के सहायक आचार्य महेंद्र सिंह कहते हैं, सपा ने कमलेश यादव को आठ महीने पहले प्रत्याशी बना दिया। वे लगातार सक्रिय रहे और चुनाव के ठीक पहले उन्हें बैठा दिया गया और भाजपा छोड़कर आए डॉ. संजयन त्रिपाठी को टिकट दे दिया गया। पार्टी को उम्मीद थी कि ब्राह्मण चेहरे को प्रत्याशी बनाने से उनके साथ पीडीए वोट बैंक जुड़ेगा तो चुनाव में पलड़ा भारी रहेगा लेकिन हुआ इसका उल्टा। इस बदलाव को सपा का एक बड़ा वोट बैंक स्वीकार नहीं कर पाया। वह निर्दलीय राजीव यादव के साथ खड़ा हो गया।
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मुद्दों को उठाकर शिक्षकों के बीच राजीव ने बनाई पैठ
भाजपा प्रत्याशी को कड़ी टक्कर देने वाले निर्दलीय राजीव यादव ने ऑल टीचर्स एंड एम्प्लॉय वेलफेयर एसोसिएशन (अटेवा) के माध्यम से शिक्षकों के मुद्दों को लेकर लगातार जमीन पर संघर्ष करते रहे। वहीं, चुनाव के ठीक पहले सपा ने अपने प्रत्याशी कमलेश यादव का टिकट काटकर डॉ. संजयन त्रिपाठी को दे दिया। सपा का कैडर वोट बैंक खिसक गया। इसका सीधा लाभ राजीव यादव को मिला।
गोरखपुर विश्वविद्यालय के सहायक आचार्य एवं राजनीतिक विश्लेषक अमित उपाध्याय कहते हैं, दल से ज्यादा प्रत्याशी पर मतदाता ने भरोसा जताया है। शिक्षकों ने स्पष्ट संकेत दिया है कि मुद्दों पर अगर सरकार ने ध्यान नहीं दिया तो नुकसान उठाना पड़ेगा। जहां तक राजीव यादव को ज्यादा मत मिलने की बात है तो उन्होंने हमेशा शिक्षकों के मुद्दों की लड़ाई लड़ी। इसका फायदा उन्हें चुनाव में मिला। शिक्षक समुदाय का बड़ा वर्ग उनके साथ खड़ा नजर आया। शिक्षकों ने यह संदेश भी देने की कोशिश की है कि भले ही वे किसी राजनीतिक दल से जुड़े हों, मुद्दे उनके लिए अहम हैं।


देवेंद्र सिंह, चितरंजन मिश्र की बात का भी नहीं दिखा असर
चुनाव में चार बार के एमएलसी देवेंद्र प्रताप सिंह और आवासीय विश्वविद्यालय महासंघ के अध्यक्ष चितरंजन मिश्र जैसे चर्चित चेहरों ने सपा प्रत्याशी का खुलकर पैरवी की। मगर इसका कोई ठोस असर नजर नहीं आया। शिक्षकों ने बड़ी खामोशी से अपनी पसंद पर वोट किया।
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