Exclusive: खेती-किसानी ही नहीं सामाजिक आर्थिक बदलाव का भी वाहक बन रहा खाद कारखाना, तेजी से घूम रहा विकास का पहिया
कारखाने के दस किलोमीटर के दायरे में तेजी से घूम रहा विकास का पहिया, जीडीए भी ला रहा कई परियोजनाएं, उप नगरीय संस्कृति को मिला बल, असुरन से लेकर गुलरिहा तक विकसित हो रहा नया शहर, 2016 तक कारखाने के आसपास किसानों की जो जमीन धेले के भाव थी अब सोना उगल रही।
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हिंदुस्तान उर्वरक एवं रसायन लिमिटेड (एचयूआरएल) का नया खाद कारखाना जल्द ही पूर्वांचल की खेती-किसानी में नई क्रांति का वाहक बनेगा। यह तो सभी को अनुमान था, मगर इससे पहले ही कारखाने के आसपास के क्षेत्र में विकास का पहिया घूमने लगा है। नींव पड़ने के साथ ही कारखाने का निर्माण, जैसे-जैसे आखिरी पड़ाव पर पहुंचने लगा, आसपास के 10 किलोमीटर के क्षेत्र का चेहरा भी बदलने लगा। अब इस इलाके में हो रहे व्यापक आर्थिक-सामजिक बदलाव को देखा जा सकता है।
सड़कें और चौराहे चौड़े होने के साथ क्षेत्र में ऊंची-ऊंची इमारतों का जाल फैल रहा है। कारखाने के आसपास वाली जमीनों की कीमतों में कई गुना बढ़ोतरी हुई है। कल तक मानबेला, पोखरभिंडा, गुलरिहा समेत आसपास के इलाकों की जो जमीन, किसानों के लिए धेले के बराबर थी आज वह सोना उगल रहीं हैं। जीडीए ने कारखाने के पास मानबेला में पत्रकारपुरम और पीएम आवास जैसी आवास परियोजनाएं पूरी करने के साथ ही करीब आधा दर्जन परियोजनाओं को लांच करने की तैयारी शुरू की है।
जल्द ही प्राधिकरण इस क्षेत्र में शहर का सबसे बड़ा शॉपिंग मॉल बनाने जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैदान भी प्रस्तावित है। कारखाने के पास ही मुख्यमंत्री के ड्रीम प्रोजेक्ट सैनिक स्कूल का निर्माण हो रहा है, जो कि दो साल में बनकर तैयार हो जाएगा।
मेडिकल कॉलेज रोड और बरगदवां-नकहां से खाद कारखाने की तरफ जाने वाली सड़क पर ठेले-खोंमचे वाले कई लोगों को रोजगार मिलने लगा है। असुरन से लेकर गुलरिहा तक उप नगरीय संस्कृति विकसित हो गई है। यानी शहर के बीच नया शहर जहां स्कूल, दफ्तर, बाजार, मल्टीप्लेक्स, होटल, रेस्त्रां, गाड़ियों के शोरूम से लेकर अस्पताल तक बन गए हैं।
...और रात में भी लौटने लगी रौनक
ढाई दशक पहले तक यह खाद कारखाना गोरखपुर की संपन्नता और विकास की निशानी हुआ करता था। प्रत्यक्षदर्शी बताते हैं कि कारखाने के आसपास कभी रात नहीं होती थी। इलाका 24 घंटे रोशनी से जगमगाता रहता था। शिफ्टवार ड्यूटी चलती थी तो बाहर चाय-पानी और पान की दुकानों पर मजमा लगा रहता था। खाद कारखाने में सीनियर टेक्नीशियन रह चुके कोदई सिंह कहते हैं कि 70-80 के दशक में गोरखपुर एवं आसपास इतनी पगार देने वाला न तो कोई दफ्तर था, न कल-कारखाना। अब वही रौनक लौटने लगी है। मंगलवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसका लोकार्पण करेंगे। इसके बाद तो इलाके में विकास का पहिया भागने लगेगा।
1968 में हुई थी पुराने कारखाने की स्थापना
पुराना खाद कारखाना, भारतीय उर्वरक निगम लिमिटेड (एफसीआईएल) की देश की पांच यूनिटों में से एक था। इसकी स्थापना 20 अप्रैल 1968 को हुई थी। तब से 1990 तक यह निर्बाध रूप से चला। 10 जून 1990 को एक दुर्घटना के बाद मजदूरों ने आंदोलन शुरू कर दिया। इसके बाद खाद कारखाना अस्थायी रूप से बंद हो गया। इसी के साथ बंद हो गई दूर-दूर तक लोगों के कानों में पहुंचनी वाली कारखाने के सायरन की आवाज। कारखाना बंद होने के बाद इसका मामला औद्योगिक और वित्तीय पुनर्निर्माण बोर्ड (बीआईएफआर) में चला गया। 2002 में सरकार ने गोरखपुर खाद कारखाने को अंतिम रूप से बंद करने का निर्णय लिया। यहां कार्य करने वाले 2400 स्थायी कर्मचारियों को वॉलेंट्री सेपेरेशन स्कीम के तहत हटा दिया। अब उससे ज्यादा क्षमता वाला नया खाद कारखाना तैयार है।
पूर्वोत्तर रेलवे कारखाना की पूर्व उत्पादन इंजीनियर आरएन सक्सेना ने कहा कि खाद कारखाने के फिर से चालू हो जाने से गोरखपुर के औद्योगिक, सामाजिक और आर्थिक विकास में प्रगति होगी। खेती प्रधान क्षेत्रों में खाद कारखाना एवं यूरिया का उत्पादन किसानों के लिए वरदान से कम नहीं है। रोजगार की संभावनाएं बढ़ेंगी। असुरन से लेकर गुलरिहा और उसके आगे तक तेजी से हो रहे विकास में भी खाद कारखाने की महत्वपूर्ण भूमिका है।
जेल रोड के संत अंथोनी कान्वेंट स्कूल की शिक्षिका नंदिता श्रीवास्तव ने कहा कि खाद कारखाना शहर के विकास की भी नई इबारत लिखेगा। इससे परोक्ष-अपरोक्ष रुप से हजारों की संख्या में लोगों को रोजगार मिलेगा। कारखाने की नींव पड़ते ही क्षेत्र का विकास तेजी से होने लगा है। सड़क- चौराहों की सूरत बदल गईं हैं। सरकारी से लेकर गैर सरकारी संस्थाओं तक की तरफ से कई बड़े आवासीय एवं व्यावसायिक प्रोजेक्ट लांच किए जा रहे हैं।