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Exclusive: खुद की जेब ढीली कर पुलिस लापता बेटियों को पहुंचाती है उनके घर, जानिए क्या है वजह

Mon, 07 Feb 2022 01:28 PM IST
vivek shukla शिवम सिंह, गोरखपुर।
शिवम सिंह, गोरखपुर। Published by: vivek shukla Updated Mon, 07 Feb 2022 01:28 PM IST
सार

उत्तर प्रदेश से बाहर गई किशोरियों की लोकेशन मिलने पर भी पुलिस नहीं जाना चाहती है। बाहर जाने पर पांच सौ रुपये रोज के हिसाब से मिलते हैं। कागजी खानापूरी की वजह से कोई आवेदन ही नहीं करता है।

 

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By loosening own pockets police missing daughters to their homes
सांकेतिक तस्वीर। - फोटो : iStock

विस्तार

खुद की जेब ढीली कर के पुलिस, लापता बेटियों को उनके घर तक पहुंचा पाती है। लोकेशन यूपी से बाहर मिलने पर लड़की को वापस लाने में कम से कम 20 से 25 हजार रुपये का खर्च आता है।

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वहीं, इसके एवज में मिलता कुछ नहीं है। पुलिस को भत्ते के तौर पर जो रकम मिल सकती है, उसके लिए कोई आवेदन नहीं करता है। इसकी भी अपनी कानूनी मजबूरी है। असल जगह पर बरामदगी दिखाने पर ट्रांजिट रिमांड की प्रक्रिया और तमाम कागजी खानापूरी से गुजरना होता है।
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जिले में दर्ज केसों पर नजर दौड़ाई जाए तो करीब 337 लड़कियां गोरखपुर जिले से लापता हुई हैं। 313 को पुलिस ने घर पहुंचा दिया तो 89 को दोबारा खोजना पड़ा। अब भी 27 लड़कियां लापता हैं, जिसके खर्च के जुगाड़ में पुलिस खामोश बैठी है। पुलिस के इस दर्द को अफसर भी जानते हैं, लेकिन क्राइम कंट्रोल के नाम पर वह मॉनीटरिंग कर दबाव बनाए रखते हैं। पुलिस की मजबूरी पर किसी ने कभी ध्यान नहीं दिया। बीच में एडीजी ने इस संबंध में पहल की थी, लेकिन चुनाव आ जाने की वजह से मामला आगे नहीं बढ़ पाया।

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बरामदगी को जाती है टीम

लड़की को बरामद करने के लिए विवेचक के अलावा एक महिला सिपाही और सिपाही की टीम बनानी पड़ती है। कभी-कभी अपहर्ता की संख्या एक से ज्यादा हुई तो सिपाहियों की संख्या बढ़ानी पड़ती है। इनके आने-जाने के खर्च के साथ ही रहने और खानपान का खर्च विवेचक को ही उठाना पड़ता है।

 

20 से 25 हजार रुपये आता है खर्च

गोरखपुर से गायब ज्यादातर लड़कियां हैदराबाद और मुंबई में मिली हैं। इन्हें वापस लाने वाले पुलिसकर्मी बताते हैं कि इनको बरामद कर, वापस लाने में कम से कम 20 से 25 हजार रुपये का खर्च आता है। जिस लड़की के माता-पिता सक्षम हैं, वे तो अपनी इज्जत बचाने और बेटी को जल्द बरामद करने के लिए पुलिस टीम के आने-जाने का खर्च और गाड़ी का इंतजाम कर देते हैं। नहीं तो विवेचक इसके लिए गलत-सही रास्तों से खर्चों का इंतजाम करता है। लोकेशन ट्रेस होने के बाद जब टीम उसे बरामद करने के लिए जाती है तो पहली बार में अगर लड़की मिल गई तो ठीक, नहीं तो यह खर्च और बढ़ता जाता है।

केस मिलते ही सकते में आ जाते हैं पुलिसकर्मी

यही एक ऐसा केस है, जिसकी विवेचना कोई पुलिसकर्मी नहीं करना चाहता। केस मिलते ही विवेचक सकते में आ जाते हैं और उनकी कोशिश होती है कि किसी तरह से केस से छुटकारा मिल जाए। अगर उन्हें लाइन हाजिर करने को कोई अफसर बोल दे तो बचाव की भी कोशिश नहीं करते हैं। लेकिन, ऐसा कितने दिन हो सकता है, इस वजह से पुराने हो चुके दरोगा इस काम को कैसे करना है, सीख चुके हैं।

 

 

सुप्रीम कोर्ट ने जाहिर की थी नाराजगी

बेलीपार इलाके से एक किशोरी लापता हो गई थी। केस दर्ज होने के बाद उसकी लोकेशन दिल्ली में मिली थी, मगर इसी बीच पीड़िता के परिजन सुप्रीम कोर्ट चले गए। सुप्रीम कोर्ट ने गोरखपुर पुलिस को फटकार लगाते हुए मामले की विवेचना दिल्ली पुलिस के सुपुर्द कर दी। इसके बाद किशोरी मिल गई थी। मामले में विवेचक पर कार्रवाई एसएसपी ने की थी। इसके बाद से पुलिस, जहां-तहां से पैसों का इंतजाम करके बरामदगी करने में अपना भला समझती है।

इस वजह से ट्रांजिट रिमांड से बचती है पुलिस

अगर पुलिस किशोरी को बरामद करने पर गैर जनपद में गिरफ्तारी दिखा देगी तो उसे, वहीं की कोर्ट में पेश करना होगा। इसके लिए केस डायरी और अन्य कागजात की औपचारिकता करनी होती है। कोर्ट में पेश करने पर मजिस्ट्रेट एक निर्धारित समय देते हैं। उसी समय पर किशोरी को फिर घटना वाली जगह की स्थानीय कोर्ट में पेश करना होता है। कागजी कार्रवाई और औपचारिकता से बचने के लिए पुलिस इस चक्कर में नहीं पड़ना चाहती है। सबसे बड़ी दिक्कत यह होती है कि कागजी कार्रवाई में थोड़ी भी कमी मिली तो आरोपित को वहीं पर दाखिल करना पड़ता है और प्रक्रिया जटिल हो जाती है।

एसएसपी डॉ. विपिन ताड़ा ने कहा कि निर्धारित भत्ते के हिसाब के नियमानुसार भुगतान किया जाता है। विवेचना फंड भी उपलब्ध कराया जाता है। कहीं कोई दिक्कत है तो इसकी जानकारी कर नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।
 

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