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मोहल्लागाथा: सत्तासी राजवंश से ताल्लुक रखता है बसंतपुर, जानिए क्या है इतिहास
Fri, 24 Feb 2023 01:48 PM IST
vivek shukla
राजीव रंजन, गोरखपुर।
राजीव रंजन, गोरखपुर।
Published by: vivek shukla
Updated Fri, 24 Feb 2023 01:48 PM IST
सार
डॉ. दानपाल सिंह की पुस्तक सत्तासी राजवंश में लिखा है कि बसंत किले और अन्य भवनों पर मुगल क्रूर शासक औरंगजेब के तीसरे बेटे मुअज्जम शाह ने 1608 ई. में कब्जा कर लिया था। इसके आसपास के भवनों में उसने अपनी पलटन को रखा था। इसका नाम बसंत सराय रखा गया था।
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गोरखपुर बसंत सराय।
- फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
धरोहरों की समृद्धि से ही किसी स्थान की ऐतिहासिक समृद्धि की पहचान होती है। इस लिहाज से देखा जाए तो गोरखपुर अपनी ऐतिहासिक धरोहरों की विरासत संजोए हुए है। इसी समृद्ध विरासत में एक है बसंत किला जो आज बसंत सराय के नाम से मशहूर है। इसे सत्तासी राजवंश के राजा बसंत ने स्थापित किया था। गोरखपुर का यह मोहल्ला आज बसंतपुर के नाम से जाना जाता है।
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बसंत किले को सत्तासी के राजा बसंत सिंह के पुत्र मान सिंह ने करीब 600 साल पहले 1417 से 1458 के बीच बनवाया था। इस किले में 67 कमरे थे और इन कमरों को सुरक्षा को ध्यान में रखकर बनवाया गया था। इस किले के चारों कोनों पर सैनिकों के बैठकर निगरानी करने की व्यवस्था बनाई गई थी। यदि किसी तरह कोई किले की छत पर चढ़ गया तो उसे ढेर करने के लिए किले की छत के नीचे बने सभी 68 कमरों में एक ऐसा झरोखा था, जिससे रोशनी तो आती ही थी, साथ ही बंदूक से गोली भी दागी जा सकती थी।
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डॉ. दानपाल सिंह की पुस्तक सत्तासी राजवंश में लिखा है कि बसंत किले और अन्य भवनों पर मुगल क्रूर शासक औरंगजेब के तीसरे बेटे मुअज्जम शाह ने 1608 ई. में कब्जा कर लिया था। इसके आसपास के भवनों में उसने अपनी पलटन को रखा था। इसका नाम बसंत सराय रखा गया था। उसने इसके अंदर एक मस्जिद का निर्माण करवा दिया जो कि आज भी मौजूद है।
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किले के अन्य हिस्सों में भी छेड़छाड़ किए जाने के प्रमाण मिलते हैं। अंग्रेजों के समय में यह किला रेड एरिया में तब्दील हो गया और यहां घुंघरुओं की आवाज गूंजने लगी थी। 80 के दशक तक यह सिलसिला चलता रहा। इसके बाद इस इलाके का रंग रूप बदलता चला गया। आज हर्बर्ट बंधे से सटा हुआ क्षेत्र अत्यंत ही घनी आबादी वाले क्षेत्र में तब्दील हो चुका है।