कोरोना से जंग में 'देवदूत' बने हैं ये लोग, ऐसे लोगों को खोजकर करवा रहे हैं क्वारंटीन
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कोरोना महामारी के जंग में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत संचालित राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम से जुड़े आयुष चिकित्सक देवदूत बन उभरे हैं। ये गांवों में मरीजों की पहचान कर क्वारंटीन कराते हैं ताकि कोविड संक्रमण पर अंकुश लग जाए।
जिले में आरबीएसके चिकित्सकों की संख्या 52 है। इधर कोरोना का कहर बढ़ा तो सरकार ने आयुष चिकित्सकों को जमीनी स्तर पर जिम्मेदार सौंपी तभी से आरबीएस डॉक्टर गांव-गांव जाकर बाहर से आने वालों को खोज कर रहे हैं।
राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (आरबीएसके) के तहत प्रत्येक सीएचसी पर दो टीमें हैं। प्रत्येक टीम में एक महिला और एक पुरुष चिकित्सक तथा दो पैरा मेडिकल स्टाफ होते हैं। वर्तमान में बच्चों के स्वास्थ्य परीक्षण के अलावा टीबी, लेप्रोसी, कुपोषण, बर्थ डिफेक्ट, एनीमिया सहित चालीस बीमारियों को चिह्नित कर मुख्यालय पर उपचार कराने की जिम्मेदारी भी इन्हीं की है। कोरोना महामारी के जंग में भी इनकी टीम मैदान में है।
अपनी नहीं देश की परवाह सर्वोपरि
सीएचसी हर्रैया में तैनात डॉ. विभा सिंह का कहना है कि कोरोना माहमारी के चलते देश संकट से गुजर रहा है। ऐसे में चिकित्सक अपनी परवाह छोड़ अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभा रहे हैं।
पूरे मनोयोग से देंगे कोरोना को चुनौती
डॉ. मेघा सिंह कहती हैं कि आरबीएस संवर्ग ने कोविड-19 को हराने के लिए अपना योगदान देना सुनिश्चित किया है। जन सहयोग से कोरोना शीघ्र हारेगा।
सामाजिक दूरी से लगेगा कोरोना संक्रमण पर अंकुश
सीएचसी बहादुरपुर में तैनात डॉ. शिवा श्रीवास्तव कहती हैं कि सामाजिक दूरी और सफाई से कोरोना संक्रमण के प्रसार पर शीघ्र अंकुश लग जाएगा। सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र गौर में तैनात डॉ. उत्तम सिंह कहते हैं कि कोरोना संक्रमित मरीजों के बीच बिना सुरक्षा ड्रेस के जाना खतरों से खाली नहीं है। आम व्यक्ति को वगैर मास्क के बाहर नहीं निकलना चाहिए।
सेवा तो ठीक, सुरक्षा के लिए सुविधा भी जरूरी
सीएचसी कुदरहा में तैनात डॉ. मनोज पांडेय ने कहा कि आरबीएस के चिकित्सकों की जिम्मेदारी कोरोना माहमारी में सबसे ज्यादा है। क्योंकि क्वारंटीन लोगों के बीच इन्हीं चिकित्सकों को जाना पड़ता है। इसलिए इन्हें और बेहतर सुविधा देने की आवश्यकता है।